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पाल और सेन वंश से लेकर मुगलों तक, आखिर कैसा रहा है बंगाल का इतिहास?

पाल और सेन वंश से लेकर मुगलों तक, आखिर कैसा रहा है बंगाल का इतिहास?

बंगाल के इतिहास से जुड़ी कहानियों का पहला सिरा खुलता है साल 1204 के एक दिन से। कल्पना कीजिए घड़ी में दोपहर का वक्त हो रहा है। बंगाल की राजधानी नदिया के महल में रसोइए ने शाही खाना परोस दिया है।

यह गंगारिडाई और कुछ नहीं, प्राचीन बंगाल ही था। ग्रीक लेखकों के मुताबिक, वहां के राजा के पास 4,000 खूंखार जंगी हाथी थे। सिकंदर के सैनिक पोरस के कुछ हाथियों से ही घबरा गए थे तो जब उन्हें पता चला कि आगे 4,000 हाथियों की दीवार खड़ी है, तो उनकी हिम्मत जवाब दे गई। यानी जिस बंगाल की हस्ति-सेना के डर से सिकंदर जैसा योद्धा वापस लौट गया, उस जमीन की ताकत का आप अंदाजा लगा सकते हैं।

सदियां बीतती गईं। मौर्य आए, गुप्त आए और चले गए। बंगाल छोटे-छोटे सामंतों में बंटा रहा। फिर सातवीं सदी में गुप्त साम्राज्य की राख से एक नया सूरज निकला। नाम था- शशांक। इतिहासकार आर.सी. मजूमदार उसे बंगाल का पहला संप्रभु राजा मानते हैं। यानी वह पहला आदमी जिसने कहा कि मैं किसी को टैक्स नहीं दूंगा, मैं खुद राजा हूं। शशांक ने गौड़ को अपनी ताकत बनाया और कर्णसुवर्ण (आज का मुर्शिदाबाद) को अपनी राजधानी। वह इतना महत्वाकांक्षी था कि उसने बंगाल से निकलकर उड़ीसा और फिर उत्तर भारत की तरफ कूच किया लेकिन उसकी यह महत्वाकांक्षा उसे ले आई उस दौर के सबसे बड़े राजा हर्षवर्धन के सामने। शशांक और हर्षवर्धन की दुश्मनी इतिहास के पन्नों में दर्ज है। बाणभट्ट ने तो शशांक को गौड़-धम यानी नीच तक कह दिया। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने आरोप लगाया कि शशांक ने वह बोधि वृक्ष कटवा दिया था जिसके नीचे बुद्ध को ज्ञान मिला था। हालांकि, यह बात पूरी तरह सच नहीं लगती क्योंकि शशांक के ही राज में उसकी राजधानी के पास रक्तमृत्तिका महाविहार फल-फूल रहा था। खैर, जब तक शशांक जिंदा रहा, उसने बंगाल को एक लोहे की दीवार बनाकर रखा। लेकिन 637 AD के आसपास उसकी मौत हो गई और बंगाल की किस्मत फूट गई।

शशांक की मौत और मात्स्य न्याय

शशांक के मरने के बाद बंगाल में जो हुआ, उसे राजनीति विज्ञान में मात्स्यन्याय कहते हैं। संस्कृत में मत्स्य मतलब मछली और न्याय मतलब कानून। तालाब का नियम क्या होता है? बड़ी मछली, छोटी मछली को खा जाती है। बंगाल का हाल बिल्कुल वैसा ही हो गया था। खालिमपुर कॉपर प्लेट बताती है कि उस दौर में हर वह आदमी जिसके हाथ में लाठी थी, वह राजा था। यह अराजकता एक-दो साल नहीं, बल्कि पूरे सौ साल चली।

जब पानी सिर से ऊपर चला गया, तो बंगाल के लोगों ने वह किया जो उस समय पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल थी। वहां के सरदारों और आम जनता ने मिलकर एक मीटिंग बुलाई। उन्होंने तय किया कि हम आपस में लड़ना बंद करेंगे और हम में से ही किसी एक काबिल आदमी को राजा चुनेंगे। उन्होंने किसी राजा के बेटे को नहीं चुना, बल्कि एक आम सेनापति के बेटे गोपाल को चुना। यह भारत के इतिहास का शायद पहला डेमोक्रेटिक इलेक्शन था। इस तरह 750 AD में बंगाल में पाल वंश की नींव पड़ी। गोपाल ने अराजकता खत्म की और उसके बेटे धर्मपाल ने बंगाल को इतना पावरफुल बना दिया कि वह उत्तरपथस्वामी कहलाया। नालंदा और विक्रमशिला जैसी यूनिवर्सिटीज इसी दौर में बनीं लेकिन, जैसा कि हर साम्राज्य के साथ होता है, पाल वंश भी धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगा। राजा निरंकुश होने लगे।

बात 11वीं सदी की है। राजा था महिपाल द्वितीय। वह एक घमंडी शासक था जिसने अपने ही भाइयों को जेल में डाल दिया था। उसे लगा कि प्रजा तो गुलाम है, क्या ही कर लेगी लेकिन उत्तरी बंगाल के कैवर्त समुदाय (जो मछली पकड़ने और खेती का काम करते थे) ने उसे गलत साबित कर दिया। उनके नेता दिव्य ने बगावत का झंडा उठा लिया। यह भारत का पहला सफल किसान विद्रोह था। एक मछुआरे ने राजा की विशाल सेना को हरा दिया और महिपाल मारा गया।

दिव्य के बाद उसका भतीजा भीम राजा बना। भीम को जनता ने बहुत प्यार दिया। आज भी बंगाल के दिनाजपुर में पुराने खंडहरों को लोग भीम का बांध कहते हैं लेकिन यह जनता का राज ज्यादा दिन नहीं चला। महिपाल का भाई रामपाल, जो जेल से भाग गया था, वह दक्षिण के राजाओं से मदद मांग लाया। एक भयानक युद्ध हुआ। भीम बहादुरी से लड़ा लेकिन हार गया। रामपाल ने उसे और उसके परिवार को बहुत बेरहमी से मार डाला।

रामपाल ने पाल वंश को फिर से खड़ा तो किया, एक नया शहर रामावती भी बसाया लेकिन साम्राज्य की बुनियाद हिल चुकी थी। पाल वंश अब गिर रहा था और उस गिरते हुए मकान पर कब्जा करने के लिए दक्षिण भारत से कुछ नए लोग आ रहे थे। वे लोग जो खुद को ब्रह्म-क्षत्रिय कहते थे। हम बात कर रहे हैं सेन राजवंश की। इन्हीं के राज में बंगाल का समाज जाति में बंटेगा, कुलीन प्रथा आएगी और फिर वही 1204 का दिन आएगा जब 18 घुड़सवारों के डर से राजा अपना खाना छोड़कर भाग जाएगा।
लेकिन यहां एक नज़र ये देख लेते हैं कि कैसे पाल वंश के शासनकाल में बौद्ध धर्म फला-फुला। कैसे लगभग हर पाल राजा ने बौद्ध धर्म को आगे बढ़ाने में अपने हिस्से का योगदान दिया।

पाल राजाओं ने अपने शासनकाल में ऐसी जगहें विकसित कीं जो बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में कारगर हुए। बोगरा में महास्थानग्रह त्रिकुटक वासु विहार बना। जो अब बांग्लादेश में है। नौगांव में सोमपुरा महाविहार का निर्माण हुआ। चटगांव में पंडित विहार और दिनाजपुर में सीताकोट विहार स्थापित हुआ। पूरे बंगाल में बौद्ध संस्कृति में दोबारा ज़िंदा करने के लिए हर तरह से पाल वंश ने साधन मुहैया कराए। विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना भी पाल वंश के राजा धर्मपाल ने की। जो क़रीब 400 सालों तक शिक्षा का केंद्र बना रहा। धर्मपाल की यह चाह थी कि विक्रमशिला विश्वविद्यालय के जरिए बौद्ध धर्म को भारत के बाहर भी पहुंचाया जाए। इस रिजीम के जो भी कॉपर प्लेट्स खुदाई के दौरान मिलते हैं उन पर गौतम बुद्ध के नाम का आह्वान मिलता है।

इतिहासकार RC Majumdar पाल वंश के दौरान बौद्ध धर्म के फैलाव पर लिखते हैं, 'लगभग चार सौ साल तक उनका दरबार भारत में उस खत्म होते धर्म का आखिरी गढ़ बना रहा। इसी वजह से पाल राजाओं की इंटरनेशनल बौद्ध दुनिया में एक अहम जगह थी। उन्होंने बाद के बौद्ध धर्म के स्रोत को बनाए रखा, जिससे उत्तर में तिब्बत और दक्षिण-पूर्व में भारतीय द्वीपों तक धाराएं बहती थीं।' अब चलते हैं सेन राजवंश की ओर।

18 घुड़सवार, कुलीनवाद और वह लंच जो कभी पूरा नहीं हुआ

पाल वंश की ढलती शाम के साथ बंगाल के आसमान पर एक नया सितारा चमक रहा था। यह सितारा पूरब से नहीं, बल्कि दक्षिण से आया था। दक्षिण भारत के कर्नाटक से कुछ लोग बंगाल आए थे। शायद नौकरी की तलाश में या फिर किसी राजा की फौज के साथ। ये लोग खुद को ब्रह्म-क्षत्रिय कहते थे। यानी वे जो ब्राह्मण भी थे और योद्धा भी। इन्हीं में से एक परिवार ने बंगाल की गद्दी पर कब्जा किया और इतिहास में सेन राजवंश के नाम से मशहूर हुआ। सेन राजाओं ने बंगाल को सिर्फ तलवार के जोर पर नहीं बदला, बल्कि समाज के ढांचे को ही बदलकर रख दिया।

कहानी शुरू होती है विजयसेन से, जिन्होंने पाल राजाओं की कमजोरी का फायदा उठाया और बंगाल में अपनी जड़ें जमाईं लेकिन इस वंश का सबसे चर्चित चेहरा बने उनके बेटे- बल्लाल सेन। वह सिर्फ एक राजा नहीं थे, वह एक विद्वान भी थे। उन्होंने दानसागर और अद्भुतसागर जैसी किताबें लिखीं लेकिन इतिहास उन्हें उनकी किताबों के लिए कम और एक खास सिस्टम के लिए ज्यादा याद रखता है। वह सिस्टम जिसने बंगाल के समाज को आज तक प्रभावित किया है। उस सिस्टम का नाम था- कुलीन प्रथा।

बल्लाल सेन ने तय किया कि समाज में ऊंच-नीच का एक सख्त पैमाना होना चाहिए। उन्होंने ब्राह्मणों, वैद्यों और कायस्थों के गोत्र और वंश की जांच करवाई। जो लोग आचार-विचार में सबसे शुद्ध पाए गए, उन्हें कुलीन (High Born) का दर्जा दिया गया। कहा गया कि एक कुलीन व्यक्ति को अपनी बेटी की शादी कुलीन घर में ही करनी चाहिए। सुनने में यह नियम साधारण लगता है लेकिन इसका असर बहुत भयानक हुआ।

नितीश सेनगुप्ता अपनी किताब में लिखते हैं कि इस प्रथा ने बंगाल को एक बंद समाज बना दिया। कुलीन दूल्हे की मांग इतनी बढ़ गई कि एक-एक कुलीन ब्राह्मण 50, 60 और कभी-कभी 100 शादियां करने लगा। कई लड़कियों की शादी तो बूढ़े कुलीन पुरुषों से कर दी जाती थी ताकि परिवार की नाक बची रहे। समाज जातियों में बंट गया। बंगाल, जो कभी दुनिया से जुड़ा हुआ था, अब अपने ही नियमों में उलझकर कुएं का मेंढक बनने लगा था। कुलीन प्रथा इस कदर हावी हुई कि अलग-अलग दंतकथाएं चलने लगीं। ऐसी ही एक अप्रमाणित कथा है कि एक बार किसी शख्स ने बल्लाल सेन को सोना भेंट किया लेकिन बल्लाल सेन ने वह सोना फेंक दिया। उन्हें वह सोना अपवित्र लगा क्योंकि उपहार देने वाला शख्स सोनार जाति का था। जो बल्लाल सेन के सख्त किए पैमाने में निचले दर्ज़े पर था। कहानी का दूसरा हिस्सा यह है कि सेन के सोना फेंकने के बाद सोनार जाति की स्थिति शूद्र जैसी हो गई लेकिन जब समाज अंदर से बंट रहा था, तब सेन दरबार में संस्कृति का जश्न चल रहा था। बल्लाल सेन के बेटे लक्ष्मण सेन गद्दी पर बैठे। यह वही राजा हैं जिनका जिक्र हमने इंट्रो में किया था। लक्ष्मण सेन अपने जमाने के बहुत ताकतवर राजा थे। उन्होंने पुरी, काशी और इलाहाबाद तक अपनी विजय पताका फहराई। उनके दरबार में जयदेव जैसे महाकवि थे, जिन्होंने गीत गोविंद की रचना की। वह दौर संस्कृत साहित्य का गोल्डन पीरियड था लेकिन चिराग बुझने से पहले ही सबसे ज्यादा फड़फड़ाता है। लक्ष्मण सेन बूढ़े हो चले थे। उनकी राजधानी नदिया गंगा किनारे बसी एक शांत नगरी थी। राजा को लगा कि वह सुरक्षित हैं। मगर उन्हें नहीं पता था कि बिहार के जंगलों में एक तूफान उनका इंतजार कर रहा है।

वह तूफान था- इख्तियार-उद-दिन मुहम्मद बख्तियार खिलजी। बख्तियार खिलजी कोई राजकुमार नहीं था। वह अफगानिस्तान के गर्मसीर इलाके का एक आम आदमी था। चार्ल्स स्टीवर्ट ने अपनी किताब History of Bengal में उसका बड़ा दिलचस्प हुलिया बताया है। बख्तियार का कद छोटा था लेकिन हाथ बहुत लंबे थे- इतने लंबे कि सीधे खड़े होने पर घुटनों से नीचे तक जाते थे। उसकी शक्ल-सूरत ऐसी थी कि गजनी और दिल्ली के सुल्तानों ने उसे अपनी फौज में भर्ती करने से मना कर दिया था।

थक-हारकर वह बदायूं के सूबेदार के पास नौकरी करने लगा। उसे मिर्जापुर के पास एक छोटी सी जागीर मिली लेकिन बख्तियार के सपने बड़े थे। उसने कुछ लड़ाकों को इकट्ठा किया और बिहार के आसपास लूटपाट शुरू कर दी। उसने बिहार के एक किले पर हमला किया। वहां हजारों लोग सिर मुंडाए हुए रहते थे। बख्तियार ने उन सबको मार डाला और जब वहां की लाइब्रेरी देखी, तब उसे पता चला कि जिसे वह किला समझकर जीत रहा था, वह दरअसल एक बौद्ध विहार (Odantapuri) था। इसी विहार शब्द से उस जगह का नाम बिहार पड़ा।

बिहार जीतने के बाद बख्तियार की नजर बंगाल पर थी लेकिन बंगाल जीतना आसान नहीं था। बंगाल की नदियां और वहां की नौसेना किसी भी विदेशी फौज को रोक सकती थी। लक्ष्मण सेन के दरबारियों और ज्योतिषियों ने राजा को चेताया भी था। उन्होंने कहा था, पुराने ग्रंथों में लिखा है कि एक तुर्क आएगा जो बंगाल को जीत लेगा। लक्ष्मण सेन ने पूछा, उसकी पहचान क्या है? ज्योतिषियों ने कहा, वह लंबी बांहों वाला होगा।

बख्तियार के लंबे हाथ मशहूर हो चुके थे। डर के मारे कई दरबारी और व्यापारी अपना सामान समेटकर भाग गए लेकिन लक्ष्मण सेन ने भागने से इनकार कर दिया। उन्होंने अपनी सुरक्षा कड़ी कर दी। खास तौर पर तेलियागढ़ी के रास्ते पर, जो बंगाल में घुसने का मुख्य रास्ता था लेकिन बख्तियार खिलजी चालाक था। साल था 1204 (कुछ इतिहासकार इसे 1202 या 1203 भी मानते हैं)। बख्तियार ने वह किया, जिसकी उम्मीद किसी को नहीं थी। वह अपनी फौज लेकर सीधे रास्ते से नहीं आया। उसने झारखंड के घने जंगलों और पहाड़ों का एक बेहद मुश्किल रास्ता चुना। यह रास्ता इतना कठिन था कि उसकी पूरी फौज पीछे छूट गई। जब बख्तियार नदिया शहर के गेट पर पहुंचा, तो उसके साथ सिर्फ 17 या 18 घुड़सवार थे।

उसने अपने सैनिकों से कहा, 'हथियार मत निकालना। शांत रहना।' महल के पहरेदारों ने उन्हें देखा। उन्हें लगा कि ये घोड़ों के व्यापारी हैं जो दरबार में घोड़े बेचने आए हैं। उन्होंने दरवाजा खोल दिया। बख्तियार और उसके 18 साथी बेरोकटोक महल के अंदर दाखिल हो गए। और फिर, वही हुआ जिसका जिक्र हमने शुरू में किया था। दोपहर का वक्त। लक्ष्मण सेन खाना खा रहे थे। अचानक हर-हर महादेव की जगह विदेशी नारों की आवाजें आने लगीं। बख्तियार के सिपाहियों ने तलवारें निकाल लीं और गार्ड्स को काट डाला।

दिल्ली सल्तनत के इतिहासकार मिनहाज-उस-सिराज अपनी किताब तबाकत-ए-नासिरी में लिखते हैं कि जब तक लक्ष्मण सेन को समझ आता कि क्या हो रहा है, हमलावर अंदर घुस चुके थे। राजा नंगे पांव पिछले दरवाजे से भागे और नाव में बैठकर पूर्वी बंगाल की तरफ निकल गए।

थोड़ी ही देर में बख्तियार की बाकी फौज भी वहां पहुंच गई। नदिया पर कब्जा हो गया। लक्ष्मण सेन ने अपनी बाकी जिंदगी पूर्वी बंगाल में एक छोटे राजा की तरह बिताई। पश्चिम बंगाल और राढ़ का इलाका हमेशा के लिए उनके हाथ से निकल गया। इतिहासकार आज भी इस पर बहस करते हैं। क्या वाकई सिर्फ 18 लोगों ने बंगाल जीत लिया था? जवाब है- नहीं। वह 18 लोग Shock Troops थे। उनका काम था अफरातफरी मचाना और राजा के नेतृत्व को खत्म करना। वे इसमें कामयाब रहे। जैसे ही राजा भागा, सेना के हौसले पस्त हो गए। यह जीत हथियारों की नहीं, बल्कि सरप्राइज और मनोवैज्ञानिक दबाव की थी।

बख्तियार ने नदिया को लूटने के बाद उसे छोड़ दिया और लखनौती (गौड़) को अपनी राजधानी बनाया। उसने वहां मस्जिदें बनवाईं, मदरसे खोले और बंगाल में इस्लामी शासन की नींव रखी लेकिन इस कहानी का अंत यहीं नहीं होता। बख्तियार खिलजी की महत्वाकांक्षा उसे ले डूबी। उसे लगा कि जब 18 लोगों के साथ बंगाल जीत लिया तो अब दुनिया भी जीत सकता हूं। उसने तिब्बत पर हमला करने का पागलपन भरा फैसला लिया। उसने 10,000 की फौज लेकर हिमालय की चढ़ाई शुरू की लेकिन वहां के पहाड़ी रास्तों, ठंड और स्थानीय लोगों के गुरिल्ला हमलों ने उसकी हालत खराब कर दी। पुल तोड़ दिए गए। रसद काट दी गई। बख्तियार को अपनी फौज के घोड़े मारकर खाने पड़े। वह जान बचाकर वापस बंगाल लौटा लेकिन इस हार ने उसे तोड़ दिया। वह बीमार पड़ गया और आखिर में, उसके अपने ही एक सेनापति अली मरदान ने उसकी हत्या कर दी। कहते हैं कि अली मरदान ने चादर ओढ़े बीमार बख्तियार के पेट में खंजर घोंप दिया था। जिस तलवार से बख्तियार ने बंगाल जीता था, उसी तलवार ने उसका अंत कर दिया लेकिन उसकी मौत के बाद भी बंगाल में जो बदलाव आया, वह कभी नहीं मिटा। अब बंगाल दिल्ली सल्तनत और उसके बागी गवर्नरों का अखाड़ा बनने वाला था।

बागी सुल्तान, राजा गणेश का प्रयोग और एक नया धर्म

बख्तियार खिलजी के मरने के बाद बंगाल और दिल्ली के बीच दूरी और बढ़ गई। दिल्ली में बैठा सुल्तान जब तक अपनी फौज लेकर बंगाल पहुंचता, तब तक यहां का गवर्नर बागी हो जाता। बरसात आते ही रास्ते बंद हो जाते और दिल्ली की फौज को कीचड़ और मच्छरों से हारकर वापस जाना पड़ता। दिल्ली के इतिहासकार ज़ियाउद्दीन बरनी ने तो झुंझलाकर बंगाल का नाम ही बुलगाकपुर रख दिया था, जिसका मतलब होता है- विद्रोहियों का शहर। करीब 100-150 साल तक यही लुका-छिपी चलती रही। कभी दिल्ली जीतती, कभी बंगाल लेकिन फिर एक आदमी आया जिसने इन बिखरे हुए टुकड़ों को जोड़कर एक देश बनाया।

साल 1342 में जब दिल्ली में मोहम्मद बिन तुगलक अपनी ही मुसीबतों में फंसा था, तब बंगाल में हाजी इलियास नाम के एक महत्वाकांक्षी गवर्नर ने मौके का फायदा उठाया। उस वक्त बंगाल तीन हिस्सों में बंटा था- लखनौती, सतगांव और सोनारगांव। इलियास ने तलवार और कूटनीति के दम पर एक-एक करके तीनों को जीता और 1352 में खुद को शाह-ए-बांग्ला घोषित किया। इतिहासकार नितीश सेनगुप्ता बताते हैं कि यह एक बहुत बड़ी घटना थी क्योंकि इलियास ने पहली बार इस पूरे इलाके को एक भाषाई और भौगोलिक पहचान दी। यहीं से बंगाली शब्द का जन्म हुआ और बंगाल के लोगों ने खुद को एक कौम समझना शुरू किया।

दिल्ली को यह बर्दाश्त नहीं हुआ। नया सुल्तान फिरोज शाह तुगलक एक विशाल सेना लेकर बंगाल पहुंचा लेकिन इलियास शाह चालाक था। उसने मैदानी जंग लड़ने के बजाय खुद को एकदाला के किले में बंद कर लिया। यह किला एक द्वीप जैसा था जिसके चारों तरफ पानी था। फिरोज शाह ने महीनों घेरा डाला लेकिन बंगाल की बारिश और मच्छरों ने उसकी सेना को बीमार कर दिया। आखिर में तुगलक को संधि करनी पड़ी और वह वापस दिल्ली लौट गया। इस तरह बंगाल दिल्ली से आजाद हो गया।

इलियास शाही वंश अच्छा चल रहा था लेकिन 15वीं सदी की शुरुआत में दरबार में एक अजीब गेम ऑफ थ्रोन्स शुरू हुआ। वहां राजा गणेश नाम के एक हिंदू जमींदार की ताकत बहुत बढ़ गई थी। गणेश भातुरिया का एक अमीर जमींदार था जिसने सुल्तानों की कमजोरी भांप ली थी। उसने पहले दरबार की राजनीति में सेंध लगाई, सुल्तान गयासुद्दीन आज़म शाह को मरवाने में साज़िश रची और फिर खुद गद्दी के पीछे की असली ताकत बन गया। हद तो तब हो गई जब उसने मुखौटा उतार दिया और एक इस्लामिक सल्तनत में चक्रवर्ती की उपाधि लेकर तख्त पर बैठ गया। 200 साल की मुस्लिम हुकूमत के बाद एक हिंदू राजा का गद्दी पर बैठना बंगाल के कट्टरपंथी मुल्लाओं और सूफी संतों को हजम नहीं हुआ।

उस समय के एक बड़े सूफी संत नूर कुतुब आलम ने जौनपुर के सुल्तान इब्राहिम शर्की को चिट्ठी लिखी कि इस्लाम खतरे में है, बंगाल आओ। इब्राहिम शर्की अपनी फौज लेकर बंगाल आ धमका। राजा गणेश बुरी तरह फंस गए। एक तरफ बाहरी हमला, दूसरी तरफ अंदरूनी विद्रोह। तब गणेश ने एक ऐतिहासिक समझौता किया। वह संत नूर कुतुब आलम के पैरों में गिर गया और कहा कि मैं गद्दी छोड़ने को तैयार हूं लेकिन शर्त यह है कि मेरा बेटा राजा बनेगा। संत ने कहा कि तुम्हारा बेटा तो हिंदू है, तो गणेश ने जवाब दिया कि वह मुसलमान बन जाएगा।

डील पक्की हो गई। गणेश का बेटा जदु रातों-रात मुसलमान बना और उसका नाम रखा गया- जलालुद्दीन मुहम्मद शाह। इब्राहिम शर्की वापस लौट गया लेकिन जैसे ही खतरा टला, राजा गणेश ने अपने बेटे को वापस शुद्धि करवाकर हिंदू बना लिया और खुद फिर से गद्दी पर बैठ गया। हालांकि, गणेश की मौत के बाद, उसका बेटा जलालुद्दीन वापस मुसलमान बन गया और इस बार अपनी मर्जी से। जलालुद्दीन एक बहुत ही दिलचस्प राजा साबित हुआ। हिंदू मां-बाप का बेटा लेकिन शासक मुस्लिम। फिर भी उसने अपने दरबार में हिंदुओं को ऊंचे पद दिए और उसी के राज में बांग्ला भाषा में रामायण लिखी गई। यह बंगाल की मिली-जुली संस्कृति की शुरुआत थी।

समय का पहिया घूमा और 1493 में बंगाल की गद्दी पर हुसैन शाही वंश आया, जिसे बंगाल का गोल्डन पीरियड कहा जाता है। सुल्तान अलाउद्दीन हुसैन शाह अरब मूल का था लेकिन दिल से पूरा बंगाली था। उसने समझा कि राज करना है तो धर्म से ऊपर उठना होगा। उसका वजीर, उसका सेनापति, उसके अंगरक्षक-सब हिंदू थे। उसने बंगाली साहित्य को दिल खोलकर बढ़ावा दिया। लोग उसे इतना प्यार करते थे कि उसे नृपति-तिलक और जगत-भूषण कहते थे लेकिन इसी शांति और समृद्धि के बीच, नदिया की गलियों से एक ऐसी आवाज़ उठी जिसने बंगाल की रूह को जगा दिया। उस दौर में हिंदू समाज में छुआछूत चरम पर था। तभी निमई नाम का एक गोरा-चिट्टा नौजवान सामने आया, जिसे दुनिया ने श्री चैतन्य महाप्रभु के नाम से जाना। चैतन्य ने कोई तलवार नहीं उठाई, बस एक मृदंग उठाया और सड़क पर निकल गए। उन्होंने कहा कि ईश्वर को पाने के लिए संस्कृत श्लोकों की जरूरत नहीं है, बस उसका नाम लो और नाचो।

इसे संकीर्तन कहा गया। यह एक क्रांति थी। उनके कीर्तन में ब्राह्मण, शूद्र, हिंदू और यहां तक कि मुसलमान भी शामिल हुए। उन्होंने जात-पात की दीवारें गिरा दीं और बांग्ला भाषा को एक नई मिठास दी। आज हम जो बंगाली कल्चर देखते हैं, उसकी नींव चैतन्य महाप्रभु और हुसैन शाह के उसी दौर में पड़ी थी। सब कुछ अच्छा चल रहा था, बंगाल अमीर था और संस्कृति फल-फूल रही थी लेकिन पश्चिम में, दिल्ली की गद्दी पर एक बड़ा बदलाव हो रहा था। काबुल से बाबर नाम का एक हमलावर भारत आ चुका था। मुगलों की नजर बंगाल के खजाने पर थी। और सिर्फ मुगल ही नहीं, बंगाल की नदियों में एक और खतरा मंडरा रहा था- पुर्तगाली लुटेरे। आखिर कैसे मुगलों ने बंगाल को जीतने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाया और कैसे बंगाल के जमींदारों ने अकबर जैसे बादशाह को सालों तक पानी पिलाया? यह हम अगले हिस्से में जानेंगे।

बारह भुइयां, मगरमच्छ और मुगलों के पसीने

हुसैन शाही वंश के बाद बंगाल में फिर से सत्ता का खेल शुरू हुआ लेकिन इस बार खिलाड़ी पुराने नहीं थे। पश्चिम से एक नया तूफान आ रहा था जिसे दुनिया मुगल के नाम से जानती थी लेकिन मुगलों के आने से पहले बंगाल ने एक ऐसे शेर को देखा, जिसने कुछ समय के लिए ही सही, लेकिन मुगलों को भारत से खदेड़ दिया था। वह था- शेर शाह सूरी।

शेर शाह सूरी एक अद्भुत इंसान था। बिहार की जागीरदारी से उठकर उसने दिल्ली के तख्त पर कब्जा किया। उसने मुगल बादशाह हुमायूं को चौसा और कन्नौज की लड़ाई में ऐसा धोया कि हुमायूं को जान बचाने के लिए ईरान भागना पड़ा। शेर शाह को बंगाल से बहुत लगाव था। उसने बंगाल के सोनारगांव से लेकर पेशावर तक वह मशहूर सड़क बनवाई जिसे आज हम ग्रैंड ट्रंक रोड कहते हैं। उसने बंगाल की प्रशासनिक व्यवस्था को इतना कस दिया कि कहा जाता था कि अगर कोई बूढ़ी औरत भी सोने से भरी टोकरी लेकर सड़क पर चले, तो किसी चोर की हिम्मत नहीं थी कि उसे हाथ लगा सके लेकिन शेर शाह की मौत के बाद अफगानों की पकड़ ढीली पड़ गई। 1576 में राजमहल की लड़ाई हुई। अकबर की मुगल फौज ने बंगाल के आखिरी अफगान सुल्तान दाऊद खान कर्रानी को हरा दिया। अकबर को लगा कि चलो, बंगाल जीत लिया। उसने टोडरमल और मान सिंह जैसे अपने सबसे काबिल जनरलों को बंगाल भेजा। मुगल दस्तावेजों में बंगाल को सूब-ए-बांग्ला लिख दिया गया लेकिन कागज पर जीतना और जमीन पर जीतने में बहुत फर्क होता है। मुगलों को बहुत जल्द समझ आ गया कि बंगाल उनकी बाकी जीतों जैसा नहीं है। अबुल फजल ने अकबरनामा में लिखा है कि मुगल सिपाहियों के लिए बंगाल एक दुस्वप्न था। वहां की हवा में नमी थी, जमीन दलदली थी और नदियां हर दूसरे मील पर रास्ता रोक लेती थीं। मुगलों के भारी-भरकम घोड़े और तोपें उत्तरी भारत के पक्के मैदानों के लिए बनी थीं, बंगाल की मुलायम मिट्टी के लिए नहीं, जो ज़रा सा पानी परसते ही कीचड़ बन जाती थी और इसी कीचड़ और नदियों के जाल में छिपे थे मुगलों के सबसे बड़े दुश्मन- बारह भुइयां (Baro-Bhuyans)।

यह कोई एक राजा नहीं था। यह पूर्वी बंगाल (भाटी क्षेत्र) के बारह बड़े जमींदारों और सरदारों का एक संघ था। इनमें हिंदू भी थे और मुसलमान भी लेकिन इनका मकसद एक था- हम दिल्ली के गुलाम नहीं बनेंगे। इन बारह भुइयां का लीडर था- ईसा खान। ईसा खान का नाम बंगाल के लोकगीतों में आज भी गूंजता है। सोनारगांव उसकी राजधानी थी। वह गजब का कूटनीतिज्ञ था। जब मुगल सेना भारी पड़ती, तो वह उनसे संधि कर लेता, उन्हें गिफ्ट भेजता और कहता कि मैं तो आपका वफादार हूं और जैसे ही मुगल सेना वापस मुड़ती या बरसात का मौसम आता, वह फिर से आजाद हो जाता और मुगलों की चौकियों पर हमला कर देता। अकबर ने एक के बाद एक कई गवर्नर बदले। मुनीम खान आए, खान-ए-जहां आए, शाहबाज खान आए। सबने एड़ी-चोटी का जोर लगाया लेकिन ईसा खान को झुका नहीं पाए।

कहानी तो यहां तक मशहूर है कि एक बार अकबर के सबसे बड़े सिपहसालार राजा मान सिंह और ईसा खान का आमना-सामना हुआ। दोनों के बीच तलवारबाजी हुई। मान सिंह की तलवार टूट गई। ईसा खान चाहता तो मान सिंह को मार सकता था लेकिन उसने अपनी तलवार मान सिंह को दे दी। इस वीरता से मान सिंह इतना प्रभावित हुआ कि दोनों के बीच एक अनकही इज्जत बन गई। हालांकि, इतिहासकार इस द्वंद्व युद्ध को एक किस्सा मानते हैं लेकिन यह बताता है कि ईसा खान का कद क्या था। उसने और उसके साथियों ने-जैसे केदार राय और प्रतापादित्य-करीब 30 साल तक अकबर जैसे शक्तिशाली बादशाह को बंगाल पर पूर्ण नियंत्रण नहीं करने दिया।

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