बंगाल के इतिहास से जुड़ी कहानियों का पहला सिरा खुलता है साल 1204 के एक दिन से। कल्पना कीजिए घड़ी में दोपहर का वक्त हो रहा है। बंगाल की राजधानी नदिया के महल में रसोइए ने शाही खाना परोस दिया है।
यह गंगारिडाई और कुछ नहीं, प्राचीन बंगाल ही था। ग्रीक लेखकों के मुताबिक, वहां के राजा के पास 4,000 खूंखार जंगी हाथी थे। सिकंदर के सैनिक पोरस के कुछ हाथियों से ही घबरा गए थे तो जब उन्हें पता चला कि आगे 4,000 हाथियों की दीवार खड़ी है, तो उनकी हिम्मत जवाब दे गई। यानी जिस बंगाल की हस्ति-सेना के डर से सिकंदर जैसा योद्धा वापस लौट गया, उस जमीन की ताकत का आप अंदाजा लगा सकते हैं।
सदियां बीतती गईं। मौर्य आए, गुप्त आए और चले गए। बंगाल छोटे-छोटे सामंतों में बंटा रहा। फिर सातवीं सदी में गुप्त साम्राज्य की राख से एक नया सूरज निकला। नाम था- शशांक। इतिहासकार आर.सी. मजूमदार उसे बंगाल का पहला संप्रभु राजा मानते हैं। यानी वह पहला आदमी जिसने कहा कि मैं किसी को टैक्स नहीं दूंगा, मैं खुद राजा हूं। शशांक ने गौड़ को अपनी ताकत बनाया और कर्णसुवर्ण (आज का मुर्शिदाबाद) को अपनी राजधानी। वह इतना महत्वाकांक्षी था कि उसने बंगाल से निकलकर उड़ीसा और फिर उत्तर भारत की तरफ कूच किया लेकिन उसकी यह महत्वाकांक्षा उसे ले आई उस दौर के सबसे बड़े राजा हर्षवर्धन के सामने। शशांक और हर्षवर्धन की दुश्मनी इतिहास के पन्नों में दर्ज है। बाणभट्ट ने तो शशांक को गौड़-धम यानी नीच तक कह दिया। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने आरोप लगाया कि शशांक ने वह बोधि वृक्ष कटवा दिया था जिसके नीचे बुद्ध को ज्ञान मिला था। हालांकि, यह बात पूरी तरह सच नहीं लगती क्योंकि शशांक के ही राज में उसकी राजधानी के पास रक्तमृत्तिका महाविहार फल-फूल रहा था। खैर, जब तक शशांक जिंदा रहा, उसने बंगाल को एक लोहे की दीवार बनाकर रखा। लेकिन 637 AD के आसपास उसकी मौत हो गई और बंगाल की किस्मत फूट गई।
शशांक की मौत और मात्स्य न्याय
शशांक के मरने के बाद बंगाल में जो हुआ, उसे राजनीति विज्ञान में मात्स्यन्याय कहते हैं। संस्कृत में मत्स्य मतलब मछली और न्याय मतलब कानून। तालाब का नियम क्या होता है? बड़ी मछली, छोटी मछली को खा जाती है। बंगाल का हाल बिल्कुल वैसा ही हो गया था। खालिमपुर कॉपर प्लेट बताती है कि उस दौर में हर वह आदमी जिसके हाथ में लाठी थी, वह राजा था। यह अराजकता एक-दो साल नहीं, बल्कि पूरे सौ साल चली।
जब पानी सिर से ऊपर चला गया, तो बंगाल के लोगों ने वह किया जो उस समय पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल थी। वहां के सरदारों और आम जनता ने मिलकर एक मीटिंग बुलाई। उन्होंने तय किया कि हम आपस में लड़ना बंद करेंगे और हम में से ही किसी एक काबिल आदमी को राजा चुनेंगे। उन्होंने किसी राजा के बेटे को नहीं चुना, बल्कि एक आम सेनापति के बेटे गोपाल को चुना। यह भारत के इतिहास का शायद पहला डेमोक्रेटिक इलेक्शन था। इस तरह 750 AD में बंगाल में पाल वंश की नींव पड़ी। गोपाल ने अराजकता खत्म की और उसके बेटे धर्मपाल ने बंगाल को इतना पावरफुल बना दिया कि वह उत्तरपथस्वामी कहलाया। नालंदा और विक्रमशिला जैसी यूनिवर्सिटीज इसी दौर में बनीं लेकिन, जैसा कि हर साम्राज्य के साथ होता है, पाल वंश भी धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगा। राजा निरंकुश होने लगे।
बात 11वीं सदी की है। राजा था महिपाल द्वितीय। वह एक घमंडी शासक था जिसने अपने ही भाइयों को जेल में डाल दिया था। उसे लगा कि प्रजा तो गुलाम है, क्या ही कर लेगी लेकिन उत्तरी बंगाल के कैवर्त समुदाय (जो मछली पकड़ने और खेती का काम करते थे) ने उसे गलत साबित कर दिया। उनके नेता दिव्य ने बगावत का झंडा उठा लिया। यह भारत का पहला सफल किसान विद्रोह था। एक मछुआरे ने राजा की विशाल सेना को हरा दिया और महिपाल मारा गया।
दिव्य के बाद उसका भतीजा भीम राजा बना। भीम को जनता ने बहुत प्यार दिया। आज भी बंगाल के दिनाजपुर में पुराने खंडहरों को लोग भीम का बांध कहते हैं लेकिन यह जनता का राज ज्यादा दिन नहीं चला। महिपाल का भाई रामपाल, जो जेल से भाग गया था, वह दक्षिण के राजाओं से मदद मांग लाया। एक भयानक युद्ध हुआ। भीम बहादुरी से लड़ा लेकिन हार गया। रामपाल ने उसे और उसके परिवार को बहुत बेरहमी से मार डाला।
रामपाल ने पाल वंश को फिर से खड़ा तो किया, एक नया शहर रामावती भी बसाया लेकिन साम्राज्य की बुनियाद हिल चुकी थी। पाल वंश अब गिर रहा था और उस गिरते हुए मकान पर कब्जा करने के लिए दक्षिण भारत से कुछ नए लोग आ रहे थे। वे लोग जो खुद को ब्रह्म-क्षत्रिय कहते थे। हम बात कर रहे हैं सेन राजवंश की। इन्हीं के राज में बंगाल का समाज जाति में बंटेगा, कुलीन प्रथा आएगी और फिर वही 1204 का दिन आएगा जब 18 घुड़सवारों के डर से राजा अपना खाना छोड़कर भाग जाएगा।
लेकिन यहां एक नज़र ये देख लेते हैं कि कैसे पाल वंश के शासनकाल में बौद्ध धर्म फला-फुला। कैसे लगभग हर पाल राजा ने बौद्ध धर्म को आगे बढ़ाने में अपने हिस्से का योगदान दिया।
पाल राजाओं ने अपने शासनकाल में ऐसी जगहें विकसित कीं जो बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में कारगर हुए। बोगरा में महास्थानग्रह त्रिकुटक वासु विहार बना। जो अब बांग्लादेश में है। नौगांव में सोमपुरा महाविहार का निर्माण हुआ। चटगांव में पंडित विहार और दिनाजपुर में सीताकोट विहार स्थापित हुआ। पूरे बंगाल में बौद्ध संस्कृति में दोबारा ज़िंदा करने के लिए हर तरह से पाल वंश ने साधन मुहैया कराए। विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना भी पाल वंश के राजा धर्मपाल ने की। जो क़रीब 400 सालों तक शिक्षा का केंद्र बना रहा। धर्मपाल की यह चाह थी कि विक्रमशिला विश्वविद्यालय के जरिए बौद्ध धर्म को भारत के बाहर भी पहुंचाया जाए। इस रिजीम के जो भी कॉपर प्लेट्स खुदाई के दौरान मिलते हैं उन पर गौतम बुद्ध के नाम का आह्वान मिलता है।
इतिहासकार RC Majumdar पाल वंश के दौरान बौद्ध धर्म के फैलाव पर लिखते हैं, 'लगभग चार सौ साल तक उनका दरबार भारत में उस खत्म होते धर्म का आखिरी गढ़ बना रहा। इसी वजह से पाल राजाओं की इंटरनेशनल बौद्ध दुनिया में एक अहम जगह थी। उन्होंने बाद के बौद्ध धर्म के स्रोत को बनाए रखा, जिससे उत्तर में तिब्बत और दक्षिण-पूर्व में भारतीय द्वीपों तक धाराएं बहती थीं।' अब चलते हैं सेन राजवंश की ओर।
18 घुड़सवार, कुलीनवाद और वह लंच जो कभी पूरा नहीं हुआ
पाल वंश की ढलती शाम के साथ बंगाल के आसमान पर एक नया सितारा चमक रहा था। यह सितारा पूरब से नहीं, बल्कि दक्षिण से आया था। दक्षिण भारत के कर्नाटक से कुछ लोग बंगाल आए थे। शायद नौकरी की तलाश में या फिर किसी राजा की फौज के साथ। ये लोग खुद को ब्रह्म-क्षत्रिय कहते थे। यानी वे जो ब्राह्मण भी थे और योद्धा भी। इन्हीं में से एक परिवार ने बंगाल की गद्दी पर कब्जा किया और इतिहास में सेन राजवंश के नाम से मशहूर हुआ। सेन राजाओं ने बंगाल को सिर्फ तलवार के जोर पर नहीं बदला, बल्कि समाज के ढांचे को ही बदलकर रख दिया।
कहानी शुरू होती है विजयसेन से, जिन्होंने पाल राजाओं की कमजोरी का फायदा उठाया और बंगाल में अपनी जड़ें जमाईं लेकिन इस वंश का सबसे चर्चित चेहरा बने उनके बेटे- बल्लाल सेन। वह सिर्फ एक राजा नहीं थे, वह एक विद्वान भी थे। उन्होंने दानसागर और अद्भुतसागर जैसी किताबें लिखीं लेकिन इतिहास उन्हें उनकी किताबों के लिए कम और एक खास सिस्टम के लिए ज्यादा याद रखता है। वह सिस्टम जिसने बंगाल के समाज को आज तक प्रभावित किया है। उस सिस्टम का नाम था- कुलीन प्रथा।
बल्लाल सेन ने तय किया कि समाज में ऊंच-नीच का एक सख्त पैमाना होना चाहिए। उन्होंने ब्राह्मणों, वैद्यों और कायस्थों के गोत्र और वंश की जांच करवाई। जो लोग आचार-विचार में सबसे शुद्ध पाए गए, उन्हें कुलीन (High Born) का दर्जा दिया गया। कहा गया कि एक कुलीन व्यक्ति को अपनी बेटी की शादी कुलीन घर में ही करनी चाहिए। सुनने में यह नियम साधारण लगता है लेकिन इसका असर बहुत भयानक हुआ।
नितीश सेनगुप्ता अपनी किताब में लिखते हैं कि इस प्रथा ने बंगाल को एक बंद समाज बना दिया। कुलीन दूल्हे की मांग इतनी बढ़ गई कि एक-एक कुलीन ब्राह्मण 50, 60 और कभी-कभी 100 शादियां करने लगा। कई लड़कियों की शादी तो बूढ़े कुलीन पुरुषों से कर दी जाती थी ताकि परिवार की नाक बची रहे। समाज जातियों में बंट गया। बंगाल, जो कभी दुनिया से जुड़ा हुआ था, अब अपने ही नियमों में उलझकर कुएं का मेंढक बनने लगा था। कुलीन प्रथा इस कदर हावी हुई कि अलग-अलग दंतकथाएं चलने लगीं। ऐसी ही एक अप्रमाणित कथा है कि एक बार किसी शख्स ने बल्लाल सेन को सोना भेंट किया लेकिन बल्लाल सेन ने वह सोना फेंक दिया। उन्हें वह सोना अपवित्र लगा क्योंकि उपहार देने वाला शख्स सोनार जाति का था। जो बल्लाल सेन के सख्त किए पैमाने में निचले दर्ज़े पर था। कहानी का दूसरा हिस्सा यह है कि सेन के सोना फेंकने के बाद सोनार जाति की स्थिति शूद्र जैसी हो गई लेकिन जब समाज अंदर से बंट रहा था, तब सेन दरबार में संस्कृति का जश्न चल रहा था। बल्लाल सेन के बेटे लक्ष्मण सेन गद्दी पर बैठे। यह वही राजा हैं जिनका जिक्र हमने इंट्रो में किया था। लक्ष्मण सेन अपने जमाने के बहुत ताकतवर राजा थे। उन्होंने पुरी, काशी और इलाहाबाद तक अपनी विजय पताका फहराई। उनके दरबार में जयदेव जैसे महाकवि थे, जिन्होंने गीत गोविंद की रचना की। वह दौर संस्कृत साहित्य का गोल्डन पीरियड था लेकिन चिराग बुझने से पहले ही सबसे ज्यादा फड़फड़ाता है। लक्ष्मण सेन बूढ़े हो चले थे। उनकी राजधानी नदिया गंगा किनारे बसी एक शांत नगरी थी। राजा को लगा कि वह सुरक्षित हैं। मगर उन्हें नहीं पता था कि बिहार के जंगलों में एक तूफान उनका इंतजार कर रहा है।
वह तूफान था- इख्तियार-उद-दिन मुहम्मद बख्तियार खिलजी। बख्तियार खिलजी कोई राजकुमार नहीं था। वह अफगानिस्तान के गर्मसीर इलाके का एक आम आदमी था। चार्ल्स स्टीवर्ट ने अपनी किताब History of Bengal में उसका बड़ा दिलचस्प हुलिया बताया है। बख्तियार का कद छोटा था लेकिन हाथ बहुत लंबे थे- इतने लंबे कि सीधे खड़े होने पर घुटनों से नीचे तक जाते थे। उसकी शक्ल-सूरत ऐसी थी कि गजनी और दिल्ली के सुल्तानों ने उसे अपनी फौज में भर्ती करने से मना कर दिया था।

