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Kerala Election 2026: क्या लौटेगी सत्ता परिवर्तन की परंपरा या बनेगा नया इतिहास? BJP के बढ़ते प्रभाव ने बदला चुनावी गणित

Kerala Election 2026: क्या लौटेगी सत्ता परिवर्तन की परंपरा या बनेगा नया इतिहास? BJP के बढ़ते प्रभाव ने बदला चुनावी गणित

Khabar Monkey 1 week ago

Kerala Election 2026: केरल में आगामी विधानसभा चुनाव 2026 को लेकर राजनीतिक माहौल काफी गर्म हो गया है. इस बार सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या राज्य एक बार फिर अपनी सत्ता परिवर्तन की प्रवृत्ति को अपनाएगा या फिर मतदाता मौजूदा सरकार को लगातार तीसरी बार चुनकर नया इतिहास रचेंगा.

राज्य की राजनीति लंबे समय से दो प्रमुख गठबंधनों लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) और यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) के बीच केंद्रित रही है, जो आमतौर पर हर 5 साल में बारी-बारी से सत्ता में आते रहे हैं. हालांकि, 2021 के चुनाव में पिनाराई विजयन के नेतृत्व में एलडीएफ की लगातार दूसरी जीत ने इस चक्र को तोड़ दिया था. इससे पहले केरल में कोई भी मुख्यमंत्री लगातार दो कार्यकाल से आगे नहीं बढ़ पाया था. अब 2026 का चुनाव इस परंपरा की अगली परीक्षा बन गया है.

क्या इस बार बदलेगा सत्ता का समीकरण?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार यूडीएफ को बढ़त मिल सकती है. एलडीएफ एक दशक की सत्ता के बाद एंटी-इंकंबेंसी (सत्ता विरोधी लहर) का सामना कर रहा है. 2024 के लोकसभा चुनावों में यूडीएफ ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 20 में से 18 सीटों पर जीत हासिल की थी. इसके अलावा 2025 के स्थानीय निकाय चुनावों में भी यूडीएफ की मजबूत उपस्थिति ने उसके आत्मविश्वास को बढ़ाया है. हालांकि, इन आंकड़ों को सीधे विधानसभा चुनावों का संकेत मानना आसान नहीं है. केरल में मतदाता अक्सर लोकसभा और विधानसभा चुनावों में अलग-अलग प्राथमिकताएं रखते हैं.

कांग्रेस के लिए चुनौती
यूडीएफ का नेतृत्व करने वाली कांग्रेस के लिए यह स्थिति पूरी तरह सहज नहीं है. पिछले तीन दशकों में (2004 को छोड़कर) लोकसभा चुनावों में यूडीएफ का प्रदर्शन एलडीएफ से बेहतर रहा है, लेकिन यह बढ़त विधानसभा चुनावों में हमेशा जीत में नहीं बदली. हाल के वर्षों में कांग्रेस को उन राज्यों में हार का सामना करना पड़ा है, जहां उसने लोकसभा में अच्छा प्रदर्शन किया था. यह प्रवृत्ति केरल में भी दोहराई जा सकती है, जिससे यूडीएफ के सामने रणनीतिक चुनौती खड़ी होती है.

होगा कड़ा मुकाबला
केरल की 140 सदस्यीय विधानसभा के आंकड़े मुकाबले की जटिलता को दर्शाते हैं. एलडीएफ ने 2021 में 99 सीटें, 2016 में 91 सीटें और 2006 में 98 सीटें जीती थीं, जबकि 2011 में वह मामूली अंतर से हार गया था. एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि 89 सीटों पर पिछले तीन चुनावों से एक ही गठबंधन का कब्जा बना हुआ है. इनमें एलडीएफ के पास 50 और यूडीएफ के पास 39 सीटें हैं. इससे स्पष्ट होता है कि जमीनी स्तर पर चुनावी लड़ाई काफी गहराई और स्थायित्व के साथ लड़ी जाती है.

पिनाराई विजयन की लोकप्रियता अब भी मजबूत
मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के नेतृत्व में एलडीएफ ने प्रशासनिक विश्वसनीयता की मजबूत छवि बनाई है. बाढ़ और कोविड-19 महामारी जैसी आपदाओं के दौरान सरकार की प्रतिक्रिया और कल्याणकारी योजनाओं ने 2021 की जीत में अहम भूमिका निभाई थी. हालांकि, दूसरे कार्यकाल में आर्थिक चुनौतियों और प्रशासनिक सुस्ती को लेकर कुछ असंतोष भी उभर रहा है. इसके बावजूद व्यक्तिगत लोकप्रियता के मामले में विजयन अभी भी विपक्ष के किसी भी नेता से आगे माने जाते हैं.

बीजेपी ने बदला चुनावी गणित?
इस बार चुनाव को रोचक बनाने वाला एक और बड़ा कारक है भारतीय जनता पार्टी का बढ़ता प्रभाव. परंपरागत रूप से तीसरे स्थान पर रहने वाली बीजेपी ने पिछले कुछ वर्षों में अपने वोट शेयर में लगातार वृद्धि की है. 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने त्रिशूर सीट पर जीत दर्ज की और तिरुवनंतपुरम में दूसरे स्थान पर रही. इसके अलावा 2025 के स्थानीय निकाय चुनावों में पार्टी ने पहली बार तिरुवनंतपुरम मेयर पद जीतकर अपनी मौजूदगी मजबूत की. बीजेपी अब केवल पारंपरिक हिंदू वोट बैंक तक सीमित नहीं रहना चाहती. वह ईसाई समुदाय सहित अन्य वर्गों तक पहुंच बनाने की रणनीति पर काम कर रही है. सुरक्षा, पहचान और विकास जैसे मुद्दों को प्रमुखता देकर वह राज्य की राजनीति में अपनी भूमिका को निर्णायक बनाने की कोशिश कर रही है.

केरल विधानसभा चुनाव 2026 केवल सत्ता परिवर्तन का चुनाव नहीं है, बल्कि यह राज्य की राजनीतिक परंपरा और बदलते सामाजिक समीकरणों के बीच सीधी टक्कर है. एक ओर एलडीएफ है, जो स्थिरता और नेतृत्व की निरंतरता के आधार पर तीसरी बार सत्ता में लौटने की कोशिश कर रहा है, वहीं दूसरी ओर यूडीएफ सत्ता विरोधी लहर का लाभ उठाने की उम्मीद में है. इसी के साथ बीजेपी इस चुनाव को त्रिकोणीय बना सकता है, जिससे परिणाम और भी अप्रत्याशित हो सकते हैं.

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