Dailyhunt
किसानों और खेत मजदूरों की आत्महत्या में आई हल्की कमी, रिपोर्ट में सामने आए आंकड़े

किसानों और खेत मजदूरों की आत्महत्या में आई हल्की कमी, रिपोर्ट में सामने आए आंकड़े

Kisan India 1 week ago

Farmer suicides: देश में किसानों और खेत मजदूरों की आत्महत्या के मामलों में साल 2024 के दौरान थोड़ी कमी दर्ज की गई है. हालांकि यह गिरावट राहत की खबर जरूर मानी जा रही है, लेकिन खेती-किसानी से जुड़ी आर्थिक परेशानियां अब भी गंभीर बनी हुई हैं.

बुधवार को जारी हुई "एक्सीडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड्स इन इंडिया (ADSI) 2024" रिपोर्ट के अनुसार, खेती से जुड़े लोगों की आत्महत्या के मामलों में पिछले साल की तुलना में कमी आई है. लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि ग्रामीण परिवारों की आय में खेती की हिस्सेदारी लगातार घट रही है, जो भविष्य के लिए चिंता का विषय है.

2024 में कितने किसानों और मजदूरों ने की आत्महत्या?

रिपोर्ट के मुताबिक साल 2024 में खेती से जुड़े कुल 10,546 लोगों ने आत्महत्या की. साल 2023 में यह संख्या 10,786 थी. यानी एक साल में कुल मामलों में करीब 2.2 प्रतिशत की कमी दर्ज हुई. इनमें किसानों की संख्या 4,633 रही, जबकि खेत मजदूरों की संख्या 5,913 दर्ज की गई.

किसानों के मामलों में 1.2 प्रतिशत की कमी

बिजनेस स्टैंडर्ड की खबर के अनुसार, 2023 में 4,690 किसानों ने आत्महत्या की थी, जबकि 2024 में यह संख्या घटकर 4,633 रह गई. यानी किसानों की आत्महत्या के मामलों में करीब 1.2 प्रतिशत की कमी आई है.

खेत मजदूरों के मामलों में भी गिरावट

खेत मजदूरों की स्थिति भी कुछ हद तक बेहतर दिखाई दी. 2023 में 6,096 खेत मजदूरों ने आत्महत्या की थी, जबकि 2024 में यह आंकड़ा घटकर 5,913 हो गया. इस तरह खेत मजदूरों के मामलों में लगभग 3 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई.

आखिर क्यों बढ़ती है किसानों की परेशानी?

सरकारी रिपोर्ट में बताया गया है कि किसानों और खेत मजदूरों की आत्महत्या के पीछे कई कारण होते हैं. इनमें पारिवारिक समस्याएं, कर्ज का बोझ, आय की कमी और आर्थिक तनाव जैसे कारण प्रमुख हैं. दरअसल, खेती से होने वाली आमदनी लगातार घट रही है, जबकि खर्च बढ़ता जा रहा है.

खेती से कम हो रही आय

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय यानी NSO के "सिचुएशनल असेसमेंट सर्वे" (2018-19) के अनुसार कृषि परिवारों की आय में खेती की हिस्सेदारी लगातार कम हो रही है.

2012-13 में जहां फसल उत्पादन से होने वाली आय कुल आय का 47.9 प्रतिशत थी, वहीं 2018-19 में यह घटकर 37.7 प्रतिशत रह गई. इसके उलट मजदूरी से होने वाली आय बढ़ी है. 2012-13 में मजदूरी की हिस्सेदारी 32.2 प्रतिशत थी, जो बढ़कर 40.3 प्रतिशत पहुंच गई.

ग्रामीण परिवार अब मजदूरी पर ज्यादा निर्भर

NABARD की "ऑल इंडिया रूरल फाइनेंशियल इंक्लूजन सर्वे (NAFIS) 2021-22" ने भी इसी स्थिति की पुष्टि की है. रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीण परिवारों की मासिक आय में खेती की हिस्सेदारी 35 प्रतिशत से घटकर 20 प्रतिशत रह गई है. वहीं मजदूरी और वेतन से होने वाली आय लगातार बढ़ी है.

एक लाख से ज्यादा परिवारों पर हुआ सर्वे

NAFIS सर्वे के तहत देशभर में एक लाख से ज्यादा ग्रामीण परिवारों से जानकारी जुटाई गई थी. इसमें लगभग 56.7 प्रतिशत परिवार कृषि से जुड़े थे, जबकि बाकी गैर-कृषि परिवार थे.

विशेषज्ञों का कहना है कि देश के अधिकांश किसान परिवार अब खेती के बजाय मजदूरी पर ज्यादा निर्भर होते जा रहे हैं. अगर मजदूरी से होने वाली आय भी संतोषजनक नहीं बढ़ती, तो आर्थिक संकट और तनाव तेजी से बढ़ता है. ऐसी स्थिति में किसानों और खेत मजदूरों पर मानसिक दबाव बढ़ सकता है.

मौसम और लागत भी बढ़ा रहे परेशानी

किसानों की मुश्किलें केवल आय तक सीमित नहीं हैं. अनियमित बारिश, सूखा, बाढ़ और मौसम में तेजी से बदलाव भी खेती को प्रभावित कर रहे हैं. इसके अलावा खाद, डीजल, बीज और मजदूरी की बढ़ती लागत ने खेती को और महंगा बना दिया है.

कर्ज का बोझ बना बड़ी वजह

कई छोटे और सीमांत किसान खेती के लिए कर्ज लेते हैं. जब फसल खराब हो जाती है या बाजार में सही दाम नहीं मिलता, तो कर्ज चुकाना मुश्किल हो जाता है. यही आर्थिक दबाव कई बार किसानों और मजदूरों को मानसिक रूप से कमजोर कर देता है.

Dailyhunt
Disclaimer: This content has not been generated, created or edited by Dailyhunt. Publisher: Kisan India