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आईसीएआर ने विकसित किया अफ्रीकी स्वाइन फीवर का टीका

आईसीएआर ने विकसित किया अफ्रीकी स्वाइन फीवर का टीका

05 अगस्त 2026, नई दिल्ली: आईसीएआर ने विकसित किया अफ्रीकी स्वाइन फीवर का टीका - भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने अफ्रीकी स्वाइन फीवर (African Swine Fever-ASF) के नियंत्रण की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल करते हुए सूअरों के लिए भारत का पहला स्वदेशी एमए-104 सेल लाइन आधारित लाइव एटेन्यूएटेड टीका विकसित किया है।

यह टीका आईसीएआर-राष्ट्रीय उच्च सुरक्षा पशु रोग संस्थान (ICAR-NIHSAD), भोपाल के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित किया गया है।

अफ्रीकी स्वाइन फीवर एक अत्यंत संक्रामक ट्रांस-बाउंड्री पशु रोग है, जो घरेलू और जंगली दोनों प्रकार के सूअरों को प्रभावित करता है। इस बीमारी में तेज बुखार, आंतरिक रक्तस्राव और मृत्यु दर लगभग 100 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। वर्तमान में इस रोग का कोई प्रभावी उपचार उपलब्ध नहीं है, इसलिए संक्रमण की स्थिति में संक्रमित पशुओं को नष्ट करना और कड़े जैव सुरक्षा उपाय अपनाना ही मुख्य नियंत्रण उपाय रहे हैं।

भारत में इस बीमारी का पहला मामला वर्ष 2020 में सामने आया था। इसके बाद यह कई राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों तक फैल गई। विशेष रूप से पूर्वोत्तर भारत में सूअर पालन करने वाले किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। सरकार के अनुसार, असम में वर्ष 2020 और 2021 के दौरान हुए प्रकोप से सूअरों की मृत्यु और उन्हें नष्ट किए जाने के कारण लगभग 276 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। वहीं मिजोरम में वर्ष 2025 तक इस बीमारी से 11,382 से अधिक परिवार प्रभावित हुए और लगभग 982 करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान होने का अनुमान है।

आईसीएआर-एनआईएचएसएडी द्वारा विकसित यह टीका एमए-104 सेल लाइन में तैयार किए गए विशेष रूप से कमजोर (Attenuated) किए गए एएसएफ वायरस जीनोटाइप-II पर आधारित है। संस्थान के अनुसार, यह तकनीक बड़े पैमाने पर टीका उत्पादन के लिए उपयुक्त है।

टीके का प्रयोगशाला स्तर पर स्टेरिलिटी, शुद्धता, सुरक्षा, आनुवंशिक स्थिरता, प्रतिरक्षा क्षमता, रोग से सुरक्षा तथा वायरस के पुनः उग्र बनने की संभावना सहित विभिन्न मानकों पर परीक्षण किया गया है। इसके अलावा पशुपालन एवं डेयरी विभाग (DAHD) के सहयोग से फील्ड परीक्षण भी किए गए, जिनमें इसकी सुरक्षा और प्रभावशीलता का मूल्यांकन किया गया।

यह टीका आठ सप्ताह से अधिक आयु के स्वस्थ सूअरों के लिए अनुशंसित है। इसे 1 मिलीलीटर इंट्रामस्क्युलर इंजेक्शन के रूप में दिया जाता है तथा पहली खुराक के 14 दिन बाद बूस्टर डोज दी जाती है।

आईसीएआर के अनुसार, यह स्वदेशी टीका सूअरों की मृत्यु दर कम करने, किसानों के आर्थिक नुकसान को घटाने तथा देश में सूअर पालन क्षेत्र की जैव सुरक्षा को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (DARE) के सचिव तथा आईसीएआर के महानिदेशक डॉ. एम.एल. जाट ने कहा कि यह उपलब्धि भारत की पशु स्वास्थ्य अनुसंधान क्षमता को दर्शाती है और भविष्य में स्वदेशी पशु टीकों एवं अन्य नवाचारों के विकास का मार्ग प्रशस्त करेगी।

आईसीएआर के अनुसार, वर्तमान में विश्व स्तर पर व्यावसायिक रूप से लाइसेंस प्राप्त अफ्रीकी स्वाइन फीवर के टीके सीमित संख्या में उपलब्ध हैं और वियतनाम उन देशों में शामिल है जहां ऐसे टीकों का व्यावसायिक उपयोग हो रहा है। आईसीएआर-एनआईएचएसएडी का टीका व्यापक रूप से उपलब्ध एमए-104 सेल लाइन पर आधारित है, जिससे स्वामित्व वाली (प्रोप्राइटरी) उत्पादन तकनीक पर निर्भरता कम होगी, बड़े पैमाने पर उत्पादन संभव होगा तथा विनिर्माण लागत घटाने में भी मदद मिल सकती है।



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