13 अप्रैल 2026, रायपुर: हरी खाद बनी किसानों के लिए वरदान, कम लागत में बढ़ेगी मिट्टी की उर्वरता और उत्पादन - खेती की बढ़ती लागत और मिट्टी की घटती उर्वरता से जूझ रहे किसानों के लिए हरी खाद एक प्रभावी और किफायती विकल्प के रूप में उभर रही है।
कृषि विभाग ने किसानों को सलाह दी है कि वे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम कर हरी खाद का उपयोग करें, जिससे न केवल खेती की लागत घटेगी बल्कि उत्पादन में भी वृद्धि होगी।
विशेषज्ञों के अनुसार हरी खाद के उपयोग से मिट्टी में जैविक पदार्थ, नमी, आर्गेनिक कार्बन और नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ती है। इसके साथ ही सूक्ष्मजीवों की सक्रियता बढ़ने से मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार होता है। इससे फास्फोरस, पोटाश, जस्ता, तांबा, मैंगनीज और लोहा जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की उपलब्धता भी बढ़ती है, जिससे भूमि की उर्वरा शक्ति लंबे समय तक बनी रहती है।
कृषि विभाग का कहना है कि रासायनिक उर्वरकों के अधिक उपयोग से जहां मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है, वहीं मानव स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक असर पड़ सकता है। ऐसे में हरी खाद जैसे जैविक विकल्पों को अपनाना समय की जरूरत है। हरी खाद मिट्टी की भौतिक, रासायनिक और जैविक संरचना को सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
हरी खाद उन तेजी से बढ़ने वाली पत्तीदार फसलों को कहा जाता है, जिन्हें फूल आने से पहले ही खेत में जोतकर मिट्टी में मिला दिया जाता है। यह प्रक्रिया मिट्टी में जैविक पदार्थों और नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ाने में सहायक होती है।
किसानों को सनई (सनहेम्प), ढैंचा, लोबिया, उड़द, मूंग और ग्वार जैसी फसलों को हरी खाद के रूप में अपनाने की सलाह दी जा रही है। सनई अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है, जबकि ढैंचा सूखे और क्षारीय भूमि में उपयोगी माना जाता है। ग्वार रेतीली और कम वर्षा वाली भूमि के लिए बेहतर है, वहीं लोबिया अच्छे जल निकास वाली भूमि में उपयुक्त होती है। मूंग और उड़द खरीफ एवं ग्रीष्मकालीन दोनों मौसम में उपयोगी हैं।
इन फसलों की जड़ों में पाए जाने वाले जीवाणु वायुमंडलीय नाइट्रोजन को मिट्टी में स्थिर करते हैं, जिससे प्रति हेक्टेयर लगभग 40 से 50 किलोग्राम नाइट्रोजन, 10 किलोग्राम फास्फोरस और 20 किलोग्राम पोटाश की आपूर्ति होती है।
हरी खाद के उपयोग से मिट्टी भुरभुरी होती है, जलधारण क्षमता बढ़ती है और वायु संचार बेहतर होता है। इससे मृदा क्षरण कम होता है और मिट्टी में अम्लीयता व क्षारीयता का संतुलन बना रहता है। साथ ही मृदाजनित रोगों का प्रभाव भी घटता है।
कृषि विभाग ने किसानों से अपील की है कि वे हरी खाद को अपनाकर टिकाऊ खेती की दिशा में कदम बढ़ाएं। इसके लिए किसान अपने विकासखंड के वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी कार्यालय से संपर्क कर तकनीकी मार्गदर्शन प्राप्त कर सकते हैं।
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