लेखक: डॉ.निर्भय भावसार1, डॉ.सोनू कुमार यादव2, 1एम.वी. एससी. - प्रसार शिक्षा विभाग, भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान, बरेली, 2पीएच.डी. शोधकर्ता, पशुधन उत्पादन एवं प्रबंधन विभाग, पशुचिकित्सा विज्ञान एवं पशुपालन महाविद्यालय, रीवा
25 मई2026, भोपाल: खुरपका-मुँहपका रोग - लक्षण और बचाव - भारत विश्व के प्रमुख पशुधन संपन्न देशों में से एक है। बेसिक एनिमल हसबेंड्री स्टैटिस्टिक्स के अनुसार देश में लगभग 53 करोड़ से अधिक पशुधन है, जिनमें गाय, भैंस, बकरी, भेड़, सूअर तथा अन्य पालतू पशु शामिल हैं। ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था, दुग्ध उत्पादन तथा किसानों की आय में पशुपालन का महत्वपूर्ण योगदान है। ऐसे में पशुओं में होने वाले संक्रामक रोग किसानों और देश दोनों के लिए बड़ी चुनौती बन जाते हैं।
इन्हीं रोगों में खुरपका-मुँहपका रोग एक अत्यधिक संक्रामक विषाणुजनित रोग है, जो गाय, भैंस, बकरी, भेड़, सूअर तथा अन्य दो खुर वाले पशुओं में पाया जाता है। यह रोग बहुत तेजी से फैलता है और संक्रमित पशु की लार, दूध, सांस, चारा तथा संपर्क से पूरे झुंड में फैल सकता है। इससे पशुओं में बुखार, मुँह में छाले, खुरों में घाव, लंगड़ापन, भूख में कमी तथा दूध उत्पादन में भारी गिरावट आती है। भारत में इस रोग से प्रतिवर्ष हजारों करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान होता है। इसलिए समय पर टीकाकरण, स्वच्छता तथा उचित पशु प्रबंधन द्वारा इस रोग की रोकथाम अत्यंत आवश्यक है।
रोगजनन- खुरपका-मुँहपका (FMD) रोग एक विषाणु के कारण होता है, जो संक्रमित पशु की लार, सांस, चारा-पानी या सीधे संपर्क से स्वस्थ पशु के शरीर में प्रवेश करता है। यह वायरस मुँह, नाक या श्वसन मार्ग की कोमल झिल्लियों से प्रवेश करके सबसे पहले गले में बढ़ता है (प्राथमिक वृद्धि) और फिर रक्त में पहुँचकर पूरे शरीर में फैल जाता है, जिसे वायरिमिया कहते हैं। इसके बाद यह मुँह, जीभ, मसूड़े, थन और खुरों के बीच जैसे संवेदनशील भागों में जाकर त्वचा की कोशिकाओं को नष्ट करता है। कोशिकाओं के टूटने से वहाँ तरल भर जाता है और पानी भरे छाले बनते हैं, जो बाद में फटकर घाव का रूप ले लेते हैं।
मुख्य लक्षण- खुरपका-मुँहपका रोग से प्रभावित पशुओं में प्रारंभिक अवस्था में तेज बुखार, सुस्ती तथा भूख में कमी देखी जाती है। इसके बाद मुँह से अत्यधिक लार गिरने लगती है, जो रस्सी जैसी दिखाई देती है। जीभ, मसूड़ों, तालू तथा होठों पर पानी भरे छाले उभर आते हैं, जो कुछ समय बाद फटकर घाव का रूप ले लेते हैं। इन घावों के कारण पशु को दर्द होता है, जिससे वह चारा खाना, पानी पीना तथा जुगाली करना कम या बंद कर देता है और धीरे-धीरे कमजोर होने लगता है। कई बार जीभ की ऊपरी सतह छिलकर बाहर निकलती हुई दिखाई देती है। खुरों के बीच तथा खुरों के किनारों पर भी घाव बन जाते हैं, जिसके कारण पशु लंगड़ाकर चलता है, बैठा रहता है या चलना बंद कर देता है। दूध देने वाले पशुओं में दूध उत्पादन लगभग 60 से 80 प्रतिशत तक घट सकता है। गर्भवती पशुओं में गर्भपात की संभावना बढ़ जाती है तथा कभी-कभी मृत बछड़े का जन्म भी हो सकता है। छोटे बछड़ों में यह रोग अधिक गंभीर होता है, जिनमें तेज बुखार आने के बाद बिना स्पष्ट लक्षणों के अचानक मृत्यु भी हो सकती है।
खुरपका-मुँहपका रोग से बचाव के लिए सही प्रबंधन, समय पर टीकाकरण और स्वच्छता बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। पशुपालकों को अपने सभी चार माह से अधिक उम्र के पशुओं का नियमित टीकाकरण कराना चाहिए, जिसमें पहला टीका लगाने के 4 सप्ताह बाद बूस्टर डोज देना तथा उसके बाद हर 6 माह में टीकाकरण कराते रहना जरूरी होता है। साथ ही, पशुओं को हर 6 माह में कृमिनाशक दवाएँ जैसे फेनबेंडाजोल या आइवरमेक्टिन देना चाहिए, जिससे उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत बनी रहती है। नए खरीदे गए पशुओं को सीधे झुंड में शामिल न करके पहले उनकी जाँच कराकर कुछ समय तक अलग रखना चाहिए। यदि कोई पशु बीमार हो जाए तो उसे तुरंत अन्य पशुओं से अलग कर देना चाहिए और उसके खाने-पीने के बर्तन भी अलग रखने चाहिए, ताकि संक्रमण न फैले। पशुओं को संतुलित और पौष्टिक आहार देना चाहिए, जिसमें पर्याप्त खनिज और विटामिन हों, तथा पशुशाला की नियमित सफाई और स्वच्छता बनाए रखना जरूरी है। यदि किसी पशु में बीमारी के लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए, ताकि समय पर नियंत्रण और उपचार किया जा सके।
जब किसी गाँव में खुरपका-मुँहपका रोग का प्रकोप फैल जाए, तो उसे नियंत्रित करने के लिए तुरंत और सही कदम उठाना बहुत जरूरी होता है। सबसे पहले नजदीकी सरकारी पशु चिकित्सक अधिकारी को तुरंत सूचना दें, ताकि समय पर नियंत्रण कार्य शुरू हो सके। जैसे ही किसी पशु में रोग के लक्षण दिखें, उसे तुरंत अन्य पशुओं से अलग कर दें और स्वस्थ तथा बीमार पशुओं को अलग-अलग रखें। दूध निकालने या पशु को छूने से पहले और बाद में हाथ साबुन से धोना तथा कपड़े बदलना जरूरी है, क्योंकि यह रोग इंसानों के माध्यम से भी एक पशु से दूसरे पशु में फैल सकता है।
रोग के फैलाव को रोकने के लिए पशुशाला, बर्तन, फर्श और आसपास के क्षेत्र की नियमित सफाई करनी चाहिए। संक्रमित स्थानों पर उपयुक्त कीटाणुनाशक घोल से दिन में दो बार सफाई करना लाभदायक होता है। बीमार पशु को छूने के बाद हाथ, पैर, जूते और कपड़ों को अच्छी तरह साफ करना चाहिए। दूध दुहने वाले बर्तन और अन्य उपकरणों को भी नियमित रूप से धोकर स्वच्छ रखना चाहिए। संक्रमित गाँव के बाहर की सीमा पर भी कीटाणुनाशक का छिड़काव करना चाहिए, ताकि रोग बाहर न फैल सके। पशु चिकित्सक की सलाह से आसपास के स्वस्थ पशुओं का तुरंत टीकाकरण कराना चाहिए और टीकाकरण के बाद कुछ समय तक पशुओं को गाँव से बाहर न ले जाएँ।
साथ ही कुछ सावधानियाँ भी जरूरी हैं। इस दौरान पशुओं को सामूहिक चराई के लिए नहीं भेजना चाहिए, क्योंकि इससे रोग तेजी से फैल सकता है। पशुओं को तालाब, नदी या नहर के खुले पानी से सीधे नहीं पिलाना चाहिए। बीमार पशुओं को अन्य पशुओं के संपर्क में बिल्कुल न आने दें और गाँव के अंदर-बाहर पशुओं का आना-जाना रोक दें। लोगों की अनावश्यक आवाजाही भी सीमित करनी चाहिए, ताकि संक्रमण का खतरा कम हो। स्वस्थ पशुओं को बीमार पशुओं के पास नहीं बाँधना चाहिए और प्रभावित क्षेत्र से नए पशु खरीदने से भी बचना चाहिए।
खुरपका-मुँहपका रोग एक अत्यधिक संक्रामक और आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बीमारी है, जो पशुधन की उत्पादकता और किसानों की आय पर गंभीर प्रभाव डालती है। यदि समय पर सही कदम न उठाए जाएँ, तो यह रोग तेजी से फैलकर पूरे गाँव या क्षेत्र को प्रभावित कर सकता है। इसलिए इस रोग की रोकथाम के लिए जागरूकता, नियमित टीकाकरण, स्वच्छता और सही पशु प्रबंधन अत्यंत आवश्यक है। रोग के लक्षण दिखाई देते ही तुरंत पशु को अलग करना, पशु चिकित्सक से संपर्क करना और संक्रमण को फैलने से रोकना सबसे जरूरी कदम हैं।
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