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क्या खेती बनती जा रही घाटे का सौदा?: मेहनत के बाद भी किसानों की जेब खाली, क्या है इसके  कारण?

क्या खेती बनती जा रही घाटे का सौदा?: मेहनत के बाद भी किसानों की जेब खाली, क्या है इसके कारण?

28 अप्रैल 2026, नई दिल्ली: क्या खेती बनती जा रही घाटे का सौदा?: मेहनत के बाद भी किसानों की जेब खाली, क्या है इसके कारण? - भारत में खेती सिर्फ पेशा नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की जीवनरेखा है।

लेकिन बदलते कृषि परिदृश्य में सबसे ज्यादा दबाव छोटे किसानों पर ही पड़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि आज का छोटा किसान कई मामलों में एक मजदूर से भी ज्यादा असुरक्षित स्थिति में जी रहा है, जहां मेहनत ज्यादा है, लेकिन आमदनी अनिश्चित और सीमित।

भारत समाज कृषक (Bharat Krishak Samaj) के अध्यक्ष अजय वीर जाखड़ (Ajay Vir Jakhar) के मुताबिक, खेती में हो रहे बदलावों के बावजूद छोटा और बड़ा-दोनों तरह के किसान अपनी जरूरतों के हिसाब से कमाई नहीं कर पा रहे हैं। खासतौर पर छोटे किसानों की स्थिति ज्यादा चुनौतीपूर्ण होती जा रही है।

पूर्व प्रबंध निदेशक, SFAC और पूर्व कृषि सचिव, मध्यप्रदेश , प्रवेश शर्मा के साथ भारत समाज कृषक के अध्यक्ष अजय वीर जाखड़ के बीच हुई खास बातचीत में उन्होंने छोटे किसानों के हालातों के बारे में विस्तार से बात की। साथ ही उन्होंने वर्तमान में किसानों की आर्थिक स्थिति खराब होने के तीन बड़ी वजहें भी बताई हैं, जो इस प्रकार है-

1. बेहद छोटी जोत (लैंड होल्डिंग)

देश के 70-80% किसानों के पास सिर्फ 2-3 बीघा जमीन है। इतनी कम जमीन पर खेती करना आर्थिक रूप से टिकाऊ नहीं रह जाता, क्योंकि लागत बढ़ती है लेकिन उत्पादन सीमित रहता है।

2. बारिश पर निर्भरता

आज भी बड़ी संख्या में किसान सिंचाई के लिए मानसून पर निर्भर हैं। बारिश में थोड़ा भी उतार-चढ़ाव सीधे उनकी फसल और आय पर असर डालता है, जिससे जोखिम और बढ़ जाता है।

3. सरकारी नीतियों का असर

महंगाई को काबू में रखने और खाने की कीमतें ज्यादा न बढ़ने देने की नीति के कारण किसानों को अक्सर उनकी फसल का उचित दाम नहीं मिल पाता। इससे उनकी मेहनत का पूरा लाभ नहीं मिल पाता।

यह समस्या सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है। दुनिया के कई देशों में सरकारें इन्फ्लेशन को कंट्रोल करने के लिए खाद्य कीमतों को सीमित रखने की कोशिश करती हैं, जिसका सीधा असर किसानों की आय पर पड़ता है।

कृषि भूमि का भविष्य आज एक अहम बहस का विषय बनता जा रहा है। सवाल यह है कि आने वाले समय में क्या खेती की जमीन, वाणिज्यिक (कमर्शियल) भूमि के मुकाबले अपना महत्व खो देगी, या फिर बढ़ती आबादी और खाद्य सुरक्षा की जरूरतों के चलते इसकी अहमियत और ज्यादा बढ़ेगी।

इसी मुद्दे पर हुई एक विशेष चर्चा में विशेषज्ञों ने छोटे किसानों के भविष्य, कृषि भूमि के वास्तविक मूल्य और खेती को टिकाऊ बनाए रखने के उपायों पर विस्तार से अपने विचार रखे। इस सत्र का संचालन प्रवेश शर्मा (पूर्व प्रबंध निदेशक, SFAC और पूर्व कृषि सचिव, मध्यप्रदेश) ने किया, जबकि हरीश दामोदरन (एडिटर, रूरल अफेयर्स, इंडियन एक्सप्रेस) और अजय वीर जाखड़ (अध्यक्ष, भारत कृषक समाज) जैसे विशेषज्ञों ने जमीन से जुड़े अनुभवों के साथ इस विषय पर गहराई से चर्चा की।

इस पूरी बातचीत में खेती के बदलते आर्थिक समीकरण, किसानों की चुनौतियों और भविष्य की संभावनाओं को समझने की कोशिश की गई, जिसे आप नीचे दिए गए पॉडकास्ट में विस्तार से सुन सकते हैं।

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