01 मई2026, नई दिल्ली: पुदीना की खेती से किसानों को मिल सकता है कम लागत में बेहतर मुनाफा, जानें मिट्टी से लेकर सिंचाई तक पूरी जानकारी - पुदीना (Mint) की खेती किसानों के लिए एक लाभकारी नकदी फसल के रूप में तेजी से लोकप्रिय हो रही है।
कम लागत, आसान देखभाल और लगातार बाजार मांग के कारण यह फसल किसानों की आमदनी बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। पुदीना का उपयोग केवल चटनी और पेय पदार्थों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका इस्तेमाल औषधीय, कॉस्मेटिक और फूड इंडस्ट्री में भी बड़े पैमाने पर किया जाता है।
पुदीना की खेती शुरू करने के लिए सबसे पहले खेत की गहरी जुताई करनी चाहिए और उसे कुछ दिनों के लिए खुला छोड़ देना चाहिए ताकि मिट्टी अच्छी तरह से साफ और भुरभुरी हो जाए।
जलवायु की बात करें तो समशीतोष्ण (Temperate) और आंशिक उष्ण (Subtropical) क्षेत्र इसकी खेती के लिए उपयुक्त हैं। इसे जायद और खरीफ दोनों मौसमों में उगाया जा सकता है, लेकिन अत्यधिक ठंड और पाले से फसल को नुकसान हो सकता है।
अंकुरण के लिए 20-25°C तापमान सबसे अच्छा होता है, जबकि पौधों के विकास के लिए लगभग 30°C तापमान उपयुक्त माना जाता है। पुदीना 40°C तक की गर्मी सहन कर सकता है।
इसके बाद खेत में 15-20 गाड़ी सड़ी हुई गोबर की खाद मिलाकर पुनः जुताई करें और खेत को समतल कर लें। बेहतर उत्पादन के लिए खेत में नर्सरी तैयार करना जरूरी होता है। लगभग 1.5 से 2 महीने पहले नर्सरी में पौधे तैयार किए जाते हैं। जब पौधे मजबूत हो जाएं, तब उन्हें तैयार खेत की क्यारियों में रोप दिया जाता है।
पुदीना की खेती में नमी बनाए रखना बहुत जरूरी है। गर्मी के मौसम में हर 2-3 दिन के अंतराल पर हल्की सिंचाई करनी चाहिए, जबकि सर्दियों में 10-15 दिन के अंतराल पर सिंचाई पर्याप्त होती है।
खाद और उर्वरक का सही उपयोग उत्पादन बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अंतिम जुताई के समय एनपीके (NPK) उर्वरक का प्रयोग किया जाता है। फसल के बढ़ने के दौरान तीसरी या चौथी सिंचाई के साथ लगभग 20 किलो नाइट्रोजन प्रति एकड़ डालना फायदेमंद होता है।
पुदीना की फसल में खरपतवार नियंत्रण बहुत जरूरी है, क्योंकि खरपतवार पौधों के पोषक तत्वों को कम कर देते हैं। समय-समय पर निराई-गुड़ाई करने से पौधों की वृद्धि बेहतर होती है और पैदावार भी बढ़ती है।
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