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सोयाबीन में बुवाई के तुरंत बाद (PE) उपयोग होने वाले खरपतवारनाशक की सूची

सोयाबीन में बुवाई के तुरंत बाद (PE) उपयोग होने वाले खरपतवारनाशक की सूची

07 जुलाई2026, नई दिल्ली: सोयाबीन में बुवाई के तुरंत बाद (PE) उपयोग होने वाले खरपतवारनाशक की सूची - सोयाबीन की सफल खेती में शुरुआती 25 से 30 दिन अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। इसी अवधि में फसल और खरपतवार दोनों तेजी से बढ़ते हैं तथा नमी, पोषक तत्व, सूर्य के प्रकाश और स्थान के लिए प्रतिस्पर्धा शुरू हो जाती है।

यदि इस चरण में खरपतवारों को नियंत्रित नहीं किया जाए तो वे फसल की प्रारंभिक वृद्धि को प्रभावित करते हैं, पौधों की संख्या घटती है और अंततः उत्पादन पर प्रतिकूल असर पड़ता है। इसलिए कृषि वैज्ञानिक शुरुआती खरपतवार नियंत्रण को सोयाबीन उत्पादन की सबसे महत्वपूर्ण कृषि क्रियाओं में शामिल करते हैं।

इसी उद्देश्य से प्री-इमर्जेंस (Pre-Emergence - PE) खरपतवारनाशकों का उपयोग किया जाता है। इनका छिड़काव बुवाई के तुरंत बाद, लेकिन फसल और खरपतवार दोनों के उगने से पहले किया जाता है। ये खरपतवारनाशक मिट्टी की ऊपरी सतह पर एक सुरक्षात्मक परत बनाते हैं। जैसे ही खरपतवारों के बीज अंकुरित होते हैं, वे इस रासायनिक परत के संपर्क में आकर नष्ट हो जाते हैं। परिणामस्वरूप सोयाबीन के पौधों को शुरुआती अवस्था में बिना प्रतिस्पर्धा के विकसित होने का अवसर मिलता है।

आईसीएआर-राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान (NSRI), इंदौर ने केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड (CIB) के 31 मार्च 2026 तक के लेबल दावों के आधार पर सोयाबीन के लिए 13 प्री-इमर्जेंस खरपतवारनाशकों की अनुशंसा की है। यह सूची किसानों को विभिन्न प्रकार के खरपतवारों तथा अलग-अलग कृषि परिस्थितियों के अनुसार उपयुक्त विकल्प उपलब्ध कराती है।

कुछ वर्ष पहले तक सोयाबीन किसानों के पास प्री-इमर्जेंस खरपतवार नियंत्रण के लिए मुख्य रूप से पेन्डीमेथालिन और मेट्रिब्यूजिन जैसे सीमित विकल्प उपलब्ध थे। लेकिन बदलते खरपतवार स्वरूप, नए सक्रिय तत्वों के विकास और मिश्रित खरपतवारों की बढ़ती समस्या को देखते हुए अब कई नई रसायनिक संरचनाएं बाजार में उपलब्ध हैं।

आज पाइरोक्सासल्फोन, सल्फेन्ट्राजोन, डायक्लोसुलम, फ्लूमिऑक्साजिन तथा क्लोमाजोन जैसे सक्रिय तत्व किसानों को अधिक व्यापक खरपतवार नियंत्रण उपलब्ध करा रहे हैं। इसके अलावा विभिन्न प्रीमिक्स (Premix) उत्पाद एक साथ कई प्रकार के घास कुल एवं चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों पर प्रभावी नियंत्रण प्रदान करते हैं।

राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान किसानों को सलाह देता है कि प्री-इमर्जेंस खरपतवारनाशकों का छिड़काव बुवाई के तुरंत बाद किया जाए। इनके प्रभावी परिणाम के लिए मिट्टी में पर्याप्त नमी आवश्यक होती है। यदि छिड़काव के बाद अच्छी वर्षा या हल्की सिंचाई उपलब्ध हो जाए, तो इनकी प्रभावशीलता और बढ़ जाती है। संस्थान पर्याप्त पानी के उपयोग पर भी विशेष जोर देता है। नैपसैक स्प्रेयर से प्रति हेक्टेयर 450-500 लीटर तथा पावर स्प्रेयर से लगभग 120 लीटर पानी का उपयोग करने की सलाह दी गई है।

स्रोत : आईसीएआर-राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान, केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड (CIB) के 31 मार्च 2026 तक के लेबल दावों के अनुसार।

इन अनुशंसाओं से स्पष्ट होता है कि अब खरपतवार नियंत्रण केवल एक या दो रसायनों तक सीमित नहीं है। कई उत्पाद दो सक्रिय तत्वों के संयोजन के रूप में उपलब्ध हैं, जिससे विभिन्न प्रकार के खरपतवारों पर व्यापक नियंत्रण प्राप्त किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, पाइरोक्सासल्फोन + डायक्लोसुलम तथा मेटोलाक्लोर + सल्फेन्ट्राजोन जैसे संयोजन उत्पाद घास कुल एवं चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों पर बेहतर नियंत्रण प्रदान करते हैं। वहीं पेन्डीमेथालिन विभिन्न फॉर्मुलेशनों में उपलब्ध होकर आज भी सबसे अधिक उपयोग किए जाने वाले प्री-इमर्जेंस खरपतवारनाशकों में शामिल है।

विशेषज्ञों के अनुसार प्री-इमर्जेंस खरपतवारनाशकों का सबसे महत्वपूर्ण पहलू समय है। यदि इनका छिड़काव बुवाई के तुरंत बाद नहीं किया जाता और खरपतवार पहले ही अंकुरित हो जाते हैं, तो इनकी प्रभावशीलता काफी कम हो जाती है। इसी प्रकार छिड़काव के बाद खेत में अनावश्यक जुताई या मिट्टी को हिलाने से मिट्टी की सतह पर बनी रासायनिक परत टूट सकती है, जिससे खरपतवार नियंत्रण प्रभावित होता है।

कृषि वैज्ञानिक यह भी मानते हैं कि किसी एक ही खरपतवारनाशक का लगातार उपयोग दीर्घकाल में प्रतिरोधी खरपतवारों के विकास का कारण बन सकता है। इसलिए अलग-अलग मोड ऑफ एक्शन वाले खरपतवारनाशकों का क्रमवार उपयोग, फसल चक्र अपनाना, समय पर बुवाई तथा आवश्यकता पड़ने पर यांत्रिक निराई जैसे उपाय भी समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।

आज जब सोयाबीन की खेती अधिक वैज्ञानिक और व्यावसायिक होती जा रही है, तब प्री-इमर्जेंस खरपतवारनाशक किसानों को शुरुआती खरपतवार प्रतिस्पर्धा से फसल की रक्षा करने का सबसे प्रभावी अवसर प्रदान करते हैं। सही उत्पाद का चयन, अनुशंसित मात्रा में उपयोग, पर्याप्त मिट्टी की नमी तथा उचित छिड़काव तकनीक अपनाकर किसान खरपतवारों को प्रारंभिक अवस्था में ही नियंत्रित कर सकते हैं। यही रणनीति स्वस्थ फसल, बेहतर पौध वृद्धि और अधिक उत्पादन की मजबूत नींव तैयार करती है।



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