Kurma Jayanti Katha : हिंदू धर्म में कूर्म जयंती का बहुत खास महत्व है। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को कूर्म जयंती मनाई जाती है। इस साल कूर्म जयंती 1 मई, 2026 शुक्रवार के दिन मनाई जाएगी।
माना जाता है कि कूर्म जयंती का संबंध भगवान विष्णु के कूर्म यानी कच्छप अवतार से है। यह अवतार हमें धैर्य और अडिग रहने की प्रेरणा देता है। माना जाता है कि इस दिन पूरे विधि-विधान के साथ विष्णु जी के कूर्म अवतार की पूजा करने से जीवन में आ रही परेशानियों से छुटकारा मिलता है और मन की हर इच्छा पूरी होती है। तो आइए जानते हैं भगवान विष्णु को कछुए का अवतार क्यों लेना पड़ा।
कूर्म अवतार से जुड़ी कथा पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान विष्णु का कछुए का अवतार समुद्र मंथन से जुड़ी हुई है। एक बार दुर्वासा ऋषि के श्राप के इंद्र देव और बाकी अन्य देवता अपनी शक्ति खो बैठे थे। जिस कारण तीनों लोकों में दैत्य शक्ति दिन प्रतिदिन बढ़ रही थी। सारे देवता दैत्य की शक्ति बढ़ती देखकर भयभीत हो गए थे। लेकिन इस स्थिति को हल करने का उपाय भगवान विष्णु जी के पास ही था। सभी देवता ब्रह्मा जी के साथ अपने विष्णु जी के पास पहुंच गए और अपना दुख सुनाने लगे। विष्णु जी के कहने पर अपनी खुई हुई शक्तियों को वापस पाने के लिए देवताओं और दानवों ने मिलकर समुद्र मंथन करने का निर्णय लिया।
जब समुद्र मंथन की तैयारी पूरी हुई, तो मंदराचल पर्वत को मथनी और वासुकी नाग को रस्सी बनाया गया। लेकिन जब समुद्र मंथन शुरू हुआ तो मंदराचल पर्वत नीचे समुद्र की गहराई में धसने लगा। क्योंकि उसके नीचे से कोई आधार नहीं मिल रहा था। समुद्र मंथन रुकता हुआ देखकर दोवताओं ने अपनी मदद के लिए भगवान विष्णु को पुकारा। देवताओं की पुकार सुनकर विष्णु जी ने एक विशाल कछुए का रूप लिया और समुद्र के तल में जाकर मंदराचल पर्वत को अपनी कठोर पीठ पर धारण कर लिया। जिस कारण समुद्र मंथन संभव हो पाया और जिससे लक्ष्मी जी प्रकट हुईं और देवताओं को अमृत व खोई हुई शक्तियां फिर से वापस मिल सकी। इसी दिव्य घटना के कारण भगवान विष्णु का यह अवतार कूर्म अवतार या कच्छपावतार के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
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