शिखिल ब्यौहार, भोपाल। राजधानी में नागरिक सुविधाओं को लेकर बड़े-बड़े दावे करने वाले भोपाल नगर निगम की एक बेहद संवेदनशील मोर्चे पर पोल खुलती नजर आ रही है। शहर में दिवंगत आत्माओं को उनके अंतिम सफर तक पहुंचाने वाले 'शांति वाहन' खुद वेंटिलेटर पर नजर आ रहे हैं।
तकनीकी खराबी और रखरखाव के अभाव में ये गाड़ियां बीच रास्तों में हांफ रही हैं, जिससे अपनों को खो चुके परिजनों को दुख की इस घड़ी में अतिरिक्त मानसिक प्रताड़ना झेलनी पड़ रही है।
जुगाड़ के भरोसे 'अंतिम यात्रा'
निगम के बेड़े में शामिल अधिकांश शव वाहनों की स्थिति बेहद जर्जर हो चुकी है। आलम यह है कि कई वाहनों के दरवाजे लॉक नहीं होते, जिन्हें सुरक्षित रखने के लिए रस्सियों का सहारा लिया जा रहा है। इसके अतिरिक्त, कई गाड़ियों के इंडिकेटर और हेडलाइट्स बंद पड़े हैं, जिससे रात के समय शवों को ले जाते समय गंभीर हादसों का अंदेशा बना रहता है। भोपाल की करीब 24 लाख की आबादी के अनुपात में नगर निगम के पास कुल जमा 10 शव वाहन हैं। विडंबना यह है कि इनमें से 30 से 40 फीसदी वाहन हमेशा मरम्मत के लिए वर्कशॉप में खड़े रहते हैं। सीमित संसाधनों के कारण जो गाड़ियां सड़कों पर दौड़ रही हैं, वे भी किसी तरह खींचतान कर चलाई जा रही हैं।
गाड़ी बीच चौराहे पर ही जवाब दे देती
ड्राइवरों की मानें तो कई बार शव को ले जाते समय गाड़ी बीच चौराहे पर ही जवाब दे देती है, जिससे सड़क पर भी असहज स्थिति निर्मित हो जाती है। मामला सामने आने के बाद निगम प्रबंधन में हलचल देखी जा रही है। नगर निगम परिषद के अध्यक्ष किशन सूर्यवंशी ने इस विषय पर सफाई देते हुए कहा कि वाहन शाखा को लगातार अपग्रेड किया जा रहा है और नए वाहनों को भी बेड़े में शामिल किया गया है। मीडिया के माध्यम से जो भी तकनीकी खामियां और कमियां हमारे संज्ञान में आई हैं, उन्हें तुरंत दुरुस्त करने के निर्देश अधिकारियों को दिए जा रहे हैं।
कंडम हो चुके वाहनों को कब तक बदलता है
जिम्मेदारों को आखिर कौन समझाए कि यह कोई सामान्य परिवहन सेवा नहीं है, बल्कि इंसानी भावनाओं और मर्यादा से जुड़ा बेहद गंभीर मामला है। निगम को ऐसे वाहनों के मेंटेनेंस के लिए एक विशेष टीम बनानी चाहिए ताकि किसी भी नागरिक को अपने प्रियजन की अंतिम विदाई के समय ऐसी अव्यवस्था का सामना न करना पड़े। अब देखना यह है कि प्रशासन कागजी दावों से आगे बढ़कर इन कंडम हो चुके वाहनों को कब तक बदलता है।

