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नेपाल बाढ़ में तबाह हुआ हिमालयी कॉरिडोर

नेपाल बाढ़ में तबाह हुआ हिमालयी कॉरिडोर

Live हलचल 3 weeks ago

नेपाल में आई अचानक बाढ़ ने भारी तबाही मचाई है। इसमें हिमालयी कॉरिडोर खासकर रसुवागढ़ी बुरी तरह से प्रभावित हुआ है। यह 260 से ज्यादा सालों से नेपाल के अहम ट्रांस-हिमालयी रास्तों में से एक रहा है।

यहां से व्यापारी, तीर्थयात्री और सेनाएं गुजरती थीं और बाद में यह चीन से आने वाले इलेक्ट्रॉनिक्स, कपड़ों, जूतों और इलेक्ट्रिक गाड़ियों के लिए देश का एक बड़ा प्रवेश द्वार बन गया।

भोटे कोशी घाटी में ट्रकों के आने से बहुत पहले खच्चरों के काफिले नेपाल से उत्तर की ओर ग्यारोंग तक चावल और दूसरे अनाज ले जाते थे, जहां व्यापारी उन्हें तिब्बती नमक और ऊन के बदले बेचते थे। नेपाल की मध्य पहाड़ियों में नमक की बहुत ज्यादा कीमत थी और यह दक्षिण की ओर भारत तक पहुंचता था। नेवार व्यापारी समुदाय भी तिब्बत के व्यापारिक कस्बों में बस गए थे।

इस कॉरिडोर का रणनीतिक महत्व बहुत ज्यादा था। गोरखा (नेपाल का वह जिला जहां से इस समुदाय को अपना नाम मिला) ने 1744 में नुवाकोट पर कब्जा किया, जिसका एक मकसद तिब्बत के साथ होने वाले फायदेमंद व्यापार पर नियंत्रण करना था। बाद में 1792 में चीनी और तिब्बती सेनाओं के जवाबी हमले से पहले 1788 और 1791 में तिब्बत पर हमले के दौरान नेपाली सेनाओं ने इसी रास्ते का इस्तेमाल किया था।

1855 में एक और हमले की तैयारी के दौरान जंग बहादुर राणा ने सीमा पर रसुवागढ़ी किला बनवाया था। 171 साल पुराना किला आज भी आधुनिक रसुवागढ़ी-ग्यिरोंग कस्टम्स क्रॉसिंग के पास खड़ा है। 1950 के बाद हुए राजनीतिक बदलावों और नई सड़कों के बनने से धीरे-धीरे कारवां वाली अर्थव्यवस्था खत्म हो गई, लेकिन पहाड़ी रास्ते से होने वाला व्यापार बस एक अलग रूप में जारी रहा।

बाद के सालों में रसुवागढ़ी नेपाल में इलेक्ट्रिक गाड़ियों (EV) के बढ़ते चलन के लिए एक अहम एंट्री पॉइंट बन गया। रसुवा कस्टम्स के आंकड़ों के मुताबिक, 2025-26 में इस क्रॉसिंग से 6,500 से ज्यादा चीनी इलेक्ट्रिक कारें, जीप, वैन और मिनीबसें नेपाल में आईं।

मंजूरी का इंतजार कर रही गाड़ियों की वजह से कस्टम्स का इलाका अक्सर भरा रहता था, जिससे हिमालय की यह छोटी सी बस्ती गाड़ियों के एक अस्थायी डिपो में बदल जाती थी। गाड़ियों और सामान के इस तरह जमा होने से आपदा का खतरा भी बढ़ गया था। जुलाई 2025 की बाढ़ में हाल ही में आयात की गई कई ईवी और कार्गो गाड़ियां बह गईं।

अभी आई बाढ़ में तिमुरे नदी के किनारे रखे सैकड़ों 40-फीट के शिपिंग कंटेनर अपनी जगह से हटकर नदी की धारा के साथ बहने लगे। ये कंटेनर तैरते हुए भारी हथियारों की तरह पुल के खंभों, सड़क के किनारों और बिजली ट्रांसमिशन टावरों से टकराते रहे।

बाढ़ ने ल्हेन्डे/कोशी नदी पर बने मितरी संघु यानी फ्रेंडशिप ब्रिज को भी नष्ट कर दिया। 2015 के भूकंप के बाद दोबारा बनाए गए और 2025 की बाढ़ के बाद मरम्मत किए गए इस पुल के सहारे (abutments) कुछ ही सेकंड में ढह गए, जिससे नेपाल-चीन के बीच का जमीनी संपर्क टूट गया। यही वह रास्ता था जिससे कभी नमक और ऊन नीचे आते थे और चावल ऊपर भेजे जाते थे।

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