गुरुग्राम, 01 सितंबर (वेब वार्ता)। उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर निवासी 30 वर्षीय युवक की मेदांता अस्पताल में इलाज के दौरान मौत के बाद बकाया बिल व शव सौंपने को लेकर विवाद खड़ा हो गया।
स्वजन का आरोप था कि अस्पताल प्रबंधन ने करीब 18 लाख रुपये का बकाया बिल जमा होने तक शव देने से इनकार कर दिया।
मामला राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तक पहुंचा तो आयोग ने हस्तक्षेप किया। इसके बाद मेदांता प्रबंधन ने बकाया बिल के भुगतान के बगैर ही शव स्वजन को सौंप दिया।
आयोग के सदस्य प्रियंक कानूनगो ने अपने आधिकारिक एक्स हैंडल से मामले में अस्पताल प्रशासन को चेतावनी दी थी। उन्होंने पोस्ट में लिखा कि वह स्वयं अस्पताल का इलाज करने पहुंच रहे हैं। इसके बाद मामले में तेजी से कार्रवाई हुई और शनिवार देर शाम शव स्वजन को सौंपा गया।
31 वर्षीय अंकुर गुप्ता का इलाज के दौरान हुआ था निधन
सदस्य प्रियंक कानूनगो के अनुसार, शिकायतकर्ता सुषमा रानी ने उन्हें बताया कि उनके 31 वर्षीय बेटे अंकुर गुप्ता का फेफड़ों के संक्रमण के उपचार के दौरान मेदांता अस्पताल में निधन हो गया था। आरोप है कि अस्पताल ने पहले ही 23 लाख 67 हजार 524 रुपये ले लिए थे। इसके बावजूद शव देने से पहले 18 लाख 55 हजार 422 रुपये की अतिरिक्त राशि मांगी गई।
महिला ने आयोग से गुहार लगाई कि उसकी आर्थिक स्थिति बेहद खराब है और इतनी बड़ी रकम देना उसके लिए संभव नहीं है। आरोप है कि अस्पताल प्रबंधन ने बकाया राशि जमा होने तक शव देने से मना कर दिया। इसके बाद परिवार ने मामले की शिकायत राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से की। आयोग के हस्तक्षेप के बाद अस्पताल प्रशासन ने शव स्वजन को सौंप दिया।
शनिवार दोपहर स्वजन शव लेने पहुंचे थे। उन्होंने आर्थिक स्थिति का हलावा देते हुए बकाया बिल भुगतान में असमर्थता जताई थी। इसके बाद प्रबंधन से बातचीत और कागजी कार्रवाई में समय लगा। देर शाम स्वजन को शव सौंप दिया गया था। बिल के विवाद जैसी स्थित नहीं थी। - प्रशासन, मेदांता अस्पताल

