साल 1988 की बात है। उस दौर में मार धाड़ वाली फिल्मों से हिंदी सिनेमा जगत थोड़ा थका हुआ सा महसूस कर रहा था। पर्दे पर हिंसा का बोलबाला था। उसी वक्त 29 अप्रैल 1988 को एक फिल्म रिलीज हुई जिसने पूरे भारत में प्यार का एक नया रंग बिखेर दिया।
इस फिल्म का नाम था 'कयामत से कयामत तक'। लोग इसे प्यार से 'QSQT' कहने लगे। इस फिल्म से मंसूर खान ने डायरेक्शन में कदम रखा और आमिर खान व जूही चावला की जोड़ी ने बॉलीवुड में अपनी पहली बड़ी दस्तक दी। नासिर हुसैन ने इस फिल्म को लिखा और प्रोड्यूस किया था। यह फिल्म सिर्फ एक प्रेम कहानी नहीं थी। यह एक कल्ट क्लासिक बन गई। इसने रोमांस और म्यूजिक के जॉनर को फिर से जिंदा कर दिया। आज भी लोग इसे 'टॉप 25 मस्ट सी बॉलीवुड फिल्म्स' में गिनते हैं। (QSQT making story and casting secrets)
फिल्म की कहानी दो ठाकुर परिवारों की आपसी दुश्मनी पर आधारित है। धनकपुर गांव के दो भाई जसवंत और धनराज अपनी बहन मधुमती से बहुत प्यार करते हैं। लेकिन एक अमीर राजपूत परिवार के रतन ने मधु को धोखा दिया। जब मधु गर्भवती हो गई तो रतन ने उसे अपनाने से मना कर दिया। अपमान और दुख की वजह से मधु ने खुदकुशी कर ली। गुस्से में पागल होकर भाई धनराज ने रतन की हत्या कर दी। यहीं से दो परिवारों के बीच नफरत की दीवार खड़ी हो गई। धनराज जेल चला गया और जसवंत अपने परिवार को लेकर दिल्ली बस गया। सालों बाद धनराज का बेटा राज और दुश्मन परिवार की बेटी रश्मि एक-दूसरे के प्यार में पड़ जाते हैं। वे घर से भाग जाते हैं लेकिन अंत में पुरानी दुश्मनी उनकी जान ले लेती है। यह अंत विलियम शेक्सपियर के नाटक 'रोमियो एंड जूलियट' की याद दिलाता है।
मंसूर खान की नई सोच से बनी फिल्म, आमिर खान का लॉन्च और कास्टिंग ट्विस्
फिल्म के पीछे की मेकिंग बहुत दिलचस्प है। मंसूर खान अपनी फिल्म की टीम में नए और युवा लोगों को चाहते थे। पहले इस फिल्म का नाम 'नफरत के वारिस' रखा गया था। नासिर हुसैन चाहते थे कि आमिर खान को बतौर हीरो लॉन्च किया जाए। साथ ही वे अपने युवा बेटे मंसूर को निर्देशन का कमान देना चाहते थे क्योंके नासिर साहब उन दिनों बहुत बीमार हो गए थे। उन्होंने मंसूर की एक टेलीफिल्म देखी थी और तभी तय कर लिया था कि मंसूर ही इसे डायरेक्ट करेंगे। नासिर साहब चाहते थे कि फिल्म के सीनियर किरदारों के लिए शम्मी कपूर और संजीव कुमार को लिया जाए। मंसूर खान ने साफ मना कर दिया। उन्हें लगा कि वे कलाकार बहुत सीनियर हैं और वे उनके साथ काम करने में सहज महसूस नहीं करेंगे। (Qayamat Se Qayamat Tak shooting unknown facts)
फिल्म की कास्टिंग के समय एक और मजेदार बात हुई। आमिर खान ने खुद रश्मि के रोल के लिए जूही चावला का ऑडिशन लिया था। जूही को उस समय पता भी नहीं था कि आमिर ही फिल्म के हीरो हैं। आमिर फिल्म में असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर भी काम कर रहे थे। फिल्म के क्लाइमैक्स में एक गैंग दिखाई देता है जो जूही को परेशान करता है। उस बाबा गैंग के लीडर मकरंद देशपांडे थे। उसमें आमिर के भाई फैसल खान और यतिन कार्येकर भी शामिल थे। दलीप ताहिल ने इस फिल्म में आमिर के पिता का रोल निभाया। हैरानी की बात यह है कि उस समय उनकी उम्र सिर्फ 31 साल थी। उनकी शादी भी नहीं हुई थी। उन्होंने यह रोल बिना एक पल सोचे समझे स्वीकार कर लिया था ।
फिल्म का म्यूजिक इस फिल्म की रीढ़ की हड्डी था। आनंद-मिलिंद की जोड़ी और उदित नारायण व अलका याग्निक के लिए यह फिल्म टर्निंग पॉइंट साबित हुई। नासिर हुसैन की फिल्मों में अक्सर आर.डी. बर्मन (पंचम दा) का संगीत होता था। लेकिन नौजवान बेटे मंसूर खान ने फ़िल्म डाइरेक्ट करने से पहले पिता के सामने एक शर्त रखी। वे आर.डी. बर्मन के साथ काम नहीं करना चाहते थे। उन्हें डर था कि पंचम दा एक लीजेंड हैं और वे उन्हें अपनी पसंद के हिसाब से बदलाव करने के लिए नहीं कह पाएंगे। इसलिए उन्होंने आनंद-मिलिंद को चुना। उदित नारायण की आवाज आमिर पर एकदम फिट बैठी। 'पापा कहते हैं' गाना तो पूरे देश की जुबान पर चढ़ गया। इस गाने को मशहूर गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी ने 70 साल की उम्र में लिखा था। फ़िल्म के सारे गाने, पापा कहते हैं, ऐ मेरे हमसफर, अकेले है तो क्या गम है, गजब का है दिन, काहे सताए सुपर हिट थे। फिल्म के म्यूजिक राइट्स गुलशन कुमार ने सिर्फ 4 लाख रुपये में खरीदे थे। टी-सीरीज के लिए यह पहली बड़ी हिट साबित हुई। (Juhi Chawla refused kissing scene QSQT song Akele Hain)
प्रमोशन के लिए भी आमिर खान ने बहुत मेहनत की। उस जमाने में बड़े होर्डिंग्स लगाए गए जिनमें आमिर का चेहरा नहीं था। बस एक लाइन लिखी थी, "आमिर खान कौन है? अपने पड़ोस वाली लड़की से पूछो!" आमिर और उनके जीजा राज जुत्शी ने खुद घूम-घूम कर ऑटो-रिक्शा पर फिल्म के पोस्टर चिपकाए थे। जब फिल्म हिट हो गई तो डिस्ट्रीब्यूटर्स ने एक नई स्कीम निकाली। जो भी फिल्म की 8 या उससे ज्यादा टिकटें खरीदता, उसे आमिर और जूही का पोस्टर मुफ्त मिलता था। यह तरीका खूब चला और फिल्म की कमाई बढ़ गई।
शूटिंग के अनसुने किस्से: जूही ने ठुकराया किसिंग सीन, रीना दत्ता का कैमियो और इमरान का छोटा रोल
फिल्म की शूटिंग के दौरान कुछ ऐसे पल भी आए जो कम ही लोग जानते हैं। 'अकेले हैं' गाने की शूटिंग के दौरान मंसूर खान चाहते थे कि जूही और आमिर के बीच एक होंठों पर किसिंग सीन हो। जूही इसके लिए तैयार नहीं थीं। वे पहले ही दो किसिंग सीन कर चुकी थीं और अब और नहीं करना चाहती थीं। मंसूर ने उन्हें समझाया कि वे उन पर भरोसा रखें। फिल्म के गाने 'पापा कहते हैं' के अंत में आमिर एक लड़की के करीब जाकर गाते हैं। वो लड़की कोई और नहीं बल्कि आमिर की पहली पत्नी रीना दत्ता थीं। उनकी उस वक्त नई-नई शादी हुई थी और वे आमिर से मिलने सेट पर आई थीं। आमिर के भाई इमरान खान ने फिल्म में छोटे आमिर का रोल निभाया। (Reena Dutta appearance in Papa Kehte Hain song)
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फिल्म की सफलता ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। 2.5 करोड़ के बजट में बनी इस फिल्म ने 5 करोड़ का नेट कलेक्शन किया। यह 1988 की तीसरी सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म थी। इसे नेशनल अवार्ड मिला। फिल्मफेयर अवार्ड्स में इसने 11 नॉमिनेशन पाए और 8 अवार्ड्स अपने नाम किए। आमिर और जूही को बेस्ट डेब्यू का अवार्ड मिला। फिल्म इतनी बड़ी हिट थी कि इसे तेलुगु, बांग्लादेशी, सिंहली और नेपाली भाषाओं में भी बनाया गया। पवन कल्याण और राजेश हमाल जैसे सितारों ने इन्हीं रीमेक फिल्मों से अपना डेब्यू किया।
कयामत से कयामत तक ने हिंदी सिनेमा को एक नया जीवन दिया। 80 के दशक के आखिर में पायरेसी और खराब म्यूजिक की वजह से लोग सिनेमाघरों से दूर हो रहे थे। इस फिल्म की सादगी और मधुर संगीत ने परिवारों को फिर से थिएटर तक खींचा। मंसूर खान ने फिल्म का अंत दुखांत रखा था जबकि उनके पिता नासिर हुसैन इसे सुखांत बनाना चाहते थे। नासिर साहब को डर था कि लोग दुखी अंत पसंद नहीं करेंगे। फिल्म के डिस्ट्रीब्यूटर्स भी इसे खरीदने से डर रहे थे क्योंकि इसमें सब नए लोग थे। आखिर में नासिर हुसैन ने खुद रिस्क लेकर फिल्म रिलीज की। फिल्म गोल्डन जुबली रही और 50 हफ्तों तक चली। (Mansoor Khan direction decisions QSQT film)
इस फिल्म का जादू आज भी बरकरार है। 'पापा कहते हैं' और 'ऐ मेरे हमसफर' जैसे गाने आज भी रीक्रिएट किए जाते हैं। फिल्म में आमिर खान ने जो गिटार इस्तेमाल किया था, वही गिटार 1973 की फिल्म 'यादों की बारात' में तारिक ने इस्तेमाल किया था। यह फिल्म न सिर्फ आमिर और जूही की जिंदगी का सबसे बड़ा मोड़ थी, बल्कि इसने आने वाले दशक के लिए बॉलीवुड का एक नया चेहरा तैयार कर दिया।
FAQ
Q1. 'कयामत से कयामत तक' कब रिलीज हुई थी? (When was 'Qayamat Se Qayamat Tak' released?)
यह फिल्म 29 अप्रैल 1988 को रिलीज हुई थी।
Q2. इस फिल्म से किन कलाकारों ने डेब्यू किया? (Which actors made their debut with this film?)
इस फिल्म से Aamir Khan और Juhi Chawla ने बॉलीवुड में बतौर लीड स्टार बड़ी शुरुआत की।
Q3. फिल्म के डायरेक्टर और प्रोड्यूसर कौन थे? (Who was the director and producer of the film?)
फिल्म का निर्देशन Mansoor Khan ने किया था, जबकि Nasir Hussain इसके लेखक और प्रोड्यूसर थे।
Q4. फिल्म की कहानी किससे प्रेरित लगती है? (What does the story of the film seem to be inspired by?)
फिल्म की कहानी Romeo and Juliet से प्रेरित लगती है, जिसमें दो दुश्मन परिवारों के बच्चों की प्रेम कहानी दिखाई गई है।
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