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आज की कथा : कर्ण और अर्जुन का अंतिम युद्ध- भाग्य और कर्म दोनों मिलकर परिणाम निर्धारित करते हैं

आज की कथा : कर्ण और अर्जुन का अंतिम युद्ध- भाग्य और कर्म दोनों मिलकर परिणाम निर्धारित करते हैं

महाभारत की कथा : कर्ण-अर्जुन का अंतिम संग्राम

कुरुक्षेत्र का सत्रहवां दिन। युद्ध अपनी चरम सीमा पर था। कर्ण और अर्जुन आमने-सामने थे। दोनों के बाण आकाश में मिलते और नष्ट होते थे। दोनों के रथ थर-थर कांप रहे थे।

देवता भी मूक होकर देख रहे थे। यह केवल दो धनुर्धरों का युद्ध नहीं था, यह भाग्य और कर्म के दो छोरों का अंतिम संघर्ष था। तभी कर्ण का रथ-चक्र धरती में धंस गया। भूमि ने उन्हें ग्रास लिया था। वह शाप जो धरती-माता ने दिया था, आज पूरा हो रहा था। कर्ण रथ से उतरे। उन्होंने अर्जुन से कहा, 'हे पार्थ, मेरा चक्र धरती में फंस गया है। एक क्षण रुको। धर्म के नाम पर, रणनीति के नाम पर। विपन्न शत्रु पर बाण मत चलाओ।'

श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा, 'आज तुम्हें धर्म की याद आई? जब द्रौपदी का चीरहरण हुआ, तब कहां था यह धर्म? जब अभिमन्यु को सात-सात महारथियों ने घेरा, तब कहां था यह धर्म?' अर्जुन का धनुष तना। और उस क्षण में, भाग्य और कर्म दोनों एकत्र हो गए। बाण छूटा। कर्ण का सिर धरती पर गिरा। एक महायोद्धा का अंत हो गया। परंतु उनकी वेदना अनंत काल तक गूंजती रही।

जब नियति और कर्म एक ही धागे में बंधते हैं

कर्ण-अर्जुन का यह अंतिम संग्राम केवल दो वीरों का युद्ध नहीं है। यह महाभारत का वह दार्शनिक शिखर है जहां भाग्य और कर्म का प्रश्न अपनी पूरी जटिलता में प्रकट होता है। कर्ण का जीवन ही इस प्रश्न का उत्तर था, पर उस उत्तर की भाषा बड़ी कठोर थी।

वह पात्र जिसे नियति ने चुना, फिर त्याग

कर्ण जन्म से ही शापित थे। कुन्ती-पुत्र होते हुए भी सूत-पुत्र कहलाए। परशुराम ने शाप दिया कि जब उन्हें सर्वाधिक आवश्यकता होगी, तब वह अपनी सर्वश्रेष्ठ विद्या भूल जाएंगे। धरती माता ने शाप दिया कि रथ-चक्र भूमि में धंसेगा। इन शापों को क्या कहेंगे, भाग्य या कर्म का फल? यहां व्यास एक गहरी बात कहते हैं कि भाग्य वह नहीं जो आकाश से गिरता है, भाग्य वह है जो हमारे पूर्वकर्मों की परछाईं है।

धर्म की दुहाई

जब कर्ण ने अर्जुन से युद्ध रोकने का अनुरोध किया, तब उसने धर्म का आह्वान किया। यह क्षण बहुत विचारणीय है। क्या एक व्यक्ति तब धर्म की मांग कर सकता है जब वह स्वयं जीवन भर धर्म की उपेक्षा करता रहा हो? कर्ण ने द्रौपदी के अपमान में दुर्योधन का साथ दिया था। अभिमन्यु-वध के उस अधर्म में मौन रहे थे। गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं, 'यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः'। श्रेष्ठ व्यक्ति जो आचरण करता है, सामान्य जन भी उसी का अनुसरण करता है। कर्ण श्रेष्ठ थे, इसीलिए उनके आचरण का भार भी उतना ही भारी था।

कृष्ण का न्याय करुणा या क्रूरता?

कृष्ण का वह उत्तर जो उन्होंने अर्जुन को दिया, सुनने में कठोर लगता है। पर वह वास्तव में ब्रह्मांडीय न्याय की घोषणा थी। एक समाज में जब नियम और धर्म केवल शक्तिशालियों की सुविधा के लिए होते हैं, तब वह धर्म नहीं, स्वार्थ है। कर्ण का विलाप उसी स्वार्थ का परिणाम था। यह आधुनिक मनुष्य के लिए भी उतना ही सत्य है। हम तब धर्म और नियम की बात करते हैं जब हम असहाय होते हैं, और जब शक्ति होती है तब उसी धर्म को ताक पर रख देते हैं।

भाग्य और कर्म, दो नहीं, एक ही सत्य

कर्ण का अंत यह सिद्ध करता है कि भाग्य और कर्म दो अलग-अलग नदियां नहीं हैं। वे एक ही जलधारा के दो किनारे हैं। कर्ण को जो शाप मिले, वे उसके स्वयं के निर्णयों के प्रतिबिंब थे। उसने दुर्योधन का साथ चुना, अधर्म में मौन रहा, और अंत में उसी मौन ने उसे घेर लिया। उपनिषद कहते हैं कि प्रत्येक कर्म एक संस्कार बनाता है, और संस्कारों का समुच्चय ही प्रारब्ध है। अतः भाग्य बाहर से नहीं आता, वह हमारे भीतर से उगता है।

वह प्रश्न जो आज भी उत्तर मांगता है

कर्ण-अर्जुन के इस युद्ध को हम आज भी अपने जीवन में देखते हैं। जब कोई शक्तिशाली व्यक्ति संकट में पड़कर न्याय की गुहार लगाता है, तब हम पूछते हैं कि क्या उसने न्याय का साथ दिया था? कर्ण की त्रासदी यह नहीं कि वह पराजित हुए। उनकी त्रासदी यह है कि वह इतना श्रेष्ठ होते हुए भी उस क्षण को नहीं पहचान पाए जब उन्हें पक्ष बदलना चाहिए था। महाभारत का यह सन्देश आज भी उतना ही ताजा है, जितना व्यास के काल में था।

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