Air India CEO Resign: एअर इंडिया के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) और मैनेजिंग डायरेक्टर कैंपबेल विल्सन (Campbell Wilson) ने इस्तीफा दे दिया है। कंपनी ने आधिकारिक रूप से इसका ऐलान कर दिया है।
हालांकि, जब तक उनकी जगह पर कोई नया व्यक्ति नहीं आ जाता है, तब तक वह एयरलाइंस के साथ जुड़कर बतौर सीईओ अपनी सेवा देते रहेंगे। बताया जा रहा है कि पिछले हफ्ते हुई बोर्ड की बैठक में उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया था। विल्सन से सितंबर 2026 तक पद पर बने रहने की उम्मीद जताई जा रही है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, एयरलाइन अहमदाबाद प्लेन क्रैश की फाइनल जांच रिपोर्ट आने के बाद नए CEO की नियुक्ति करेगी। एयरक्राफ्ट एक्सीडेंट इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो (AAIB) ने 12 जुलाई 2025 को हादसे की प्रारंभिक रिपोर्ट जारी की थी। अंतिम रिपोर्ट जून 2026 में आ सकती है। बताया जा रहा है कि उनका कार्यकाल सितंबर 2027 तक था, लेकिन उन्होंने पहले ही संकेत दे दिया था कि वे इसे आगे नहीं बढ़ाना चाहते। इसी वजह से कंपनी ने जनवरी 2026 से ही नए सीईओ की तलाश शुरू कर दी थी।
कौन हैं कैंपबेल विल्सन?
कैंपबेल विल्सन एविएशन इंडस्ट्री का जाना-पहचाना नाम हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत 1996 में सिंगापुर एयरलाइंस में मैनेजमेंट ट्रेनी के रूप में की थी। न्यूजीलैंड के निवर्सिटी ऑफ कैंटरबरी से मास्टर ऑफ कॉमर्स (फर्स्ट क्लास ऑनर्स) करने वाले विल्सन ने कनाडा, हांगकांग और जापान जैसे देशों में काम किया है। वे स्कूट के फाउंडिंग सीईओ भी रहे हैं और 2011 से 2016 तक इस लो-कॉस्ट एयरलाइन का नेतृत्व किया। बाद में 2020 में फिर से स्कूट के सीईओ बने। इसके बाद 2022 में उन्होंने एअर इंडिया का कार्यभार संभाला।
इस्तीफे की क्या हो सकती है वजह?
एअर इंडिया इस वक्त अपने सबसे चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रही है। कैंपबेल के इस्तीफे की वजह भी कंपनी के बढ़ते घाटे और ऑपरेशन में आ रही दिक्कतों को ठहराया जा रहा है। हालिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, साल 2024-25 में एअर इंडिया का घाटा कम होने के बजाय और बढ़ गया। कंपनी के ऊपर कर्ज का भी भारी दबाव है। इसके अलावा, जून 2025 में अहमदाबाद में हुए भयावह विमान हादसे के बाद एयरलाइन कड़े विनियामक घेरे में है।
एअर इंडिया के सामने बड़ी चुनौतियां
एअर इंडिया इस समय कई मोर्चों पर दबाव में है। रिपोर्ट्स के अनुसार, वित्त वर्ष 2026 में कंपनी को करीब ₹20,000 करोड़ तक का नुकसान होने की आशंका है। इसकी मुख्य वजह पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव है, जिसके चलते एयरस्पेस प्रतिबंध लागू हो रहे हैं। इससे फ्लाइट्स के रूट बदलने और अतिरिक्त ईंधन खर्च बढ़ गया है, खासकर लंबी दूरी की अंतरराष्ट्रीय उड़ानों पर इसका असर पड़ा है। इसके अलावा, नए विमानों की डिलीवरी में देरी और ऑपरेशनल लागत में बढ़ोतरी भी कंपनी की परेशानी बढ़ा रही है।

