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RBI Explained: रेपो रेट, एसडीएफ और एमएसएफ में क्या अंतर है? EMI, FD रेट से संंबंध समझिए

RBI Explained: रेपो रेट, एसडीएफ और एमएसएफ में क्या अंतर है? EMI, FD रेट से संंबंध समझिए

ई दिल्ली: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) वाणिज्यिक बैंकों में नकदी के प्रवाह और ब्याज दरों को नियंत्रित करने के लिए तरलता समायोजन सुविधा (LAF) का उपयोग करता है। इस व्यवस्था के तीन मुख्य स्तंभ हैं।

पहला, स्टैंडिंग डिपोजिट फैसिलिटी (SDF) जिसे फ्लोर रेट भी कहा जाता है। दूसरा, रेपो रेट (Repo Rate) जो मुख्य नीतिगत बेंचमार्क दर होती है। और, तीसरा है मार्जिनल स्टैंडिंग फैसिलिटी (MSF) जिसे सीलिंग रेट भी कहते हैं।

एसडीएफ (Standing Deposit Facility - SDF) क्या है?

एसडीएफ वह दर है जिस पर वाणिज्यिक बैंक अपनी अतिरिक्त नकदी को आरबीआई के पास जमा करते हैं। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके बदले में आरबीआई बैंकों को कोई सरकारी प्रतिभूति (Collateral) नहीं देता है।

अप्रैल 2022 में आरबीआई ने रिवर्स रेपो रेट के स्थान पर एसडीएफ को फ्लोर रेट के रूप में लागू किया था, ताकि बिना सिक्यॉरिटीज ट्रांसफर के सिस्टम से अतिरिक्त नकदी को सोखा जा सके। आरबीआई के इस कदम का उद्देश्य बाजार में मौजूद अत्यधिक नकदी को नियंत्रित करना होता है। आरबीआई बैंक से मिली राशि पर एक निश्चित दर से ब्याज देता है। वर्तमान में यह दर 5% वार्षिक है।

इसे ऐसे समिझए कि दिनभर के कारोबार के बाद किसी बैंक के पास अंत में 100 करोड़ रुपये की अतिरिक्त नकदी बच गई जिसे वह ग्राहकों को उधार नहीं दे सका। तो एसडीएफ के तहत बैंक इस 100 करोड़ रुपये को बिना किसी सिक्यॉरिटी के सीधे आरबीआई के पास जमा कर देता है। नियम के मुताबिक, आरबीआई बैंक को 5% वार्षिक दर से 1 दिन का लगभग 1.37 लाख रुपये का ब्याज देता है।

रेपो रेट ((Repurchase Option Rate) क्या है?

रेपो रेट वह दर है जिस पर वाणिज्यिक बैंक शॉर्ट टर्म की कमी को पूरा करने के लिए आरबीआई से पैसे उधार लेते हैं। इसके बदले बैंकों को अपनी सरकारी प्रतिभूतियां (Government Securities यानी G-Secs) आरबीआई के पास गिरवी रखनी पड़ती हैं। इससे बैंकिंग प्रणाली में नकदी की कमी नहीं होती है। बदले में आरबीआई को बैंक से तय दर से ब्याज मिलता है। अभी यह दर 5.25% वार्षिक है।

इसे समझना है तो मान लीजिए कि किसी बैंक को अभी 100 करोड़ रुपये की जरूरत है। बैंक आरबीआई के पास 100 करोड़ रुपये मूल्य के सरकारी बॉन्ड जमा करता है। आरबीआई बैंक को 5.25% वार्षिक दर पर 100 करोड़ जारी कर देता है। यदि यह लोन 1 दिन के लिए लिया गया है, तो बैंक को लगभग 1.44 लाख रुपये का ब्याज चुकाना होगा।

एमएसएफ (Marginal Standing Facility - MSF) क्या है?

एमएसएफ एक आपातकालीन उधारी विंडो है। रेपो रेट पर उधार लेने की एक समयसीमा होती है। अगर वह समयसीमा पार हो गई और इंटर बैंकिंग मार्केट से भी पैसा नहीं मिल पा रहा है। इस बीच में बैंक को अचानक पैसों की जरूरत पड़ गई तो उसे एमएसएफ विंडो से ही उधार लेना होगा।

तब बैंक रातभर के लिए हाई रेट पर आरबीआई से धन उधार ले सकता है। इससे गंभीर नकदी संकट का सामना नहीं करना पड़ता और आपातकालीन स्थिति में बैंकों को सुरक्षा कवच मिल जाता है। नियम के तहत, बैंक अपनी वैधानिक तरलता अनुपात (SLR) कोटे की सिक्यॉरिटीज का उपयोग करके भी एक निर्धारित सीमा तक उधार ले सकते हैं। इसके लिए आरबीआई से एक निश्चित दर से ब्याज वसूलता है। अभी यह दर 5.50% वार्षिक है।

इसे ऐसे समझिए कि एक बैंक को अचानक शाम को 100 करोड़ रुपये का पेमेंट अचानक करना पड़ेगा। उसकी सामान्य रेपो लिमिट समाप्त हो चुकी है। तब बैंक अपनी एसएलआर कोटा की सिक्यॉरिटीज का उपयोग करके एमएसएफ विंडो से फंड लेता है। आरबीआई बैंक से 5.50% की हाई रेट वसूलता है। 1 दिन के इस आपातकालीन ऋण के लिए बैंक को लगभग 1.51 लाख रुपये का ब्याज देना होता है।

Repo Rate, SDF, MSF का अंतर समझें

EMI, FD और फाइनैंशियल सिस्टम से संबंध

कुल मिलाकर यह समझें कि रेपो रेट से EMI पर प्रभाव पड़ता है। रेपो रेट मुख्य बेंचमार्क है। जब इसमें बदलाव होता है, तो बैंकों के MCLR और EBLR (External Benchmark Lending Rate) बदलते हैं, जिससे होम लोन और कार लोन की EMI प्रभावित होती है। वहीं, एसडीएफ से एफडी रेट पर असर होता है।

SDF दर यह तय करती है कि बैंकों को आरबीआई के पास पैसे जमा करने पर कितना सुरक्षित रिटर्न मिलेगा। यदि एसडीएफ रेट अधिक होती है, तो बैंक आम जनता के लिए भी फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) की दरें बढ़ाते हैं। जबकि एमएसएफ से फाइनेंशियल सिस्टम की मजबूती बनी रहती है। MSF व्यवस्था यह सुनिश्चित करती है कि कोई भी बैंक केवल एक दिन के नकदी संकट की वजह से विफल या डिफॉल्ट न हो।

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