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आज से शुरू हुआ मिथिलांचल का आस्था और परंपरा का महापर्व 'मधुश्रावणी', 13 दिनों तक गूंजेंगे लोकगीत, नवविवाहिताओं में दिखा उत्साह

आज से शुरू हुआ मिथिलांचल का आस्था और परंपरा का महापर्व 'मधुश्रावणी', 13 दिनों तक गूंजेंगे लोकगीत, नवविवाहिताओं में दिखा उत्साह

मिथिला हिन्दी न्यूज | रोहित कुमार सोनू

सीतामढ़ी/दरभंगा: मिथिला की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और लोक परंपराओं का प्रतीक मधुश्रावणी महापर्व आज 3 अगस्त 2026 (सोमवार) से पूरे मिथिलांचल में श्रद्धा और उल्लास के साथ शुरू हो गया।

यह पर्व विशेष रूप से नवविवाहित महिलाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। विवाह के बाद पहली बार मधुश्रावणी मनाने वाली नवविवाहिताएं अपने मायके पहुंच चुकी हैं और पूरे उत्साह के साथ पूजा-अर्चना की तैयारियों में जुट गई हैं।

घर-घर में पारंपरिक मैथिली लोकगीत गूंज रहे हैं। पूजा कक्षों को आकर्षक ढंग से सजाया गया है और परिवार की महिलाएं पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार इस पर्व की तैयारियों में व्यस्त हैं। कई नवविवाहिताओं ने पूजा शुरू होने से पहले मेहंदी रचाई है और नए वस्त्र धारण कर इस विशेष पर्व का स्वागत किया है। पूरे मिथिलांचल में उत्सव जैसा माहौल देखने को मिल रहा है।

13 दिनों तक चलेगा मधुश्रावणी महापर्व

मधुश्रावणी पर्व कुल 13 दिनों तक मनाया जाता है। इसकी शुरुआत सावन मास के कृष्ण पक्ष की पंचमी (मौना पंचमी) से होती है और यह शुक्ल पक्ष की तृतीया तक चलता है। इस वर्ष यह महापर्व 15 अगस्त 2026 को पारंपरिक अनुष्ठानों के साथ संपन्न होगा।

गौरी-शंकर, गणेश और नाग देवता की होती है पूजा

इस पर्व के दौरान पूजा स्थल को विशेष रूप से सजाया जाता है। वहां गौरी-शंकर, भगवान गणेश और नाग देवता (विषहरा) की मिट्टी की प्रतिमाएं स्थापित कर विधि-विधान से पूजा की जाती है। प्रतिदिन धार्मिक अनुष्ठान, लोक परंपराओं और पारिवारिक रीति-रिवाजों के अनुसार आराधना की जाती है।

फूल चुनने और सात्विक भोजन की परंपरा

मधुश्रावणी के दौरान नवविवाहित महिलाएं प्रतिदिन शाम को अपनी सखियों के साथ पूजा के लिए फूल चुनने जाती हैं। अगले दिन इन्हीं फूलों से देवी-देवताओं की पूजा की जाती है। पूरे 13 दिनों तक महिलाएं बिना नमक का अरवा भोजन ग्रहण करती हैं और सात्विक जीवनशैली का पालन करती हैं। इस दौरान लोकगीत, पारंपरिक कथाएं और धार्मिक अनुष्ठान इस पर्व की विशेष पहचान होते हैं।

अंतिम दिन निभाई जाती है 'टेमी दागने' की परंपरा

पर्व के अंतिम दिन पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार 'टेमी दागने' की परंपरा निभाई जाती है, जिसे मधुश्रावणी का महत्वपूर्ण और प्रतीकात्मक अनुष्ठान माना जाता है। इसके साथ ही 13 दिनों तक चलने वाला यह महापर्व संपन्न होता है।

क्या है धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व?

धार्मिक मान्यता के अनुसार मधुश्रावणी का व्रत और पूजा करने से पति की दीर्घायु, सुखी दांपत्य जीवन तथा परिवार में सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है। साथ ही यह पर्व केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि मिथिला की समृद्ध लोक संस्कृति, पारिवारिक परंपराओं, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक पहचान का भी जीवंत उदाहरण है। यह पर्व नई पीढ़ी को अपनी परंपराओं और संस्कारों से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता है।

मधुश्रावणी के अवसर पर पूरे मिथिलांचल में श्रद्धा, भक्ति और लोक संस्कृति का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। पारंपरिक गीतों, पूजा-अर्चना और पारिवारिक सहभागिता के बीच यह महापर्व मिथिला की सांस्कृतिक धरोहर को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का कार्य करता है।

— रोहित कुमार सोनू
संपादक, मिथिला हिन्दी न्यूज

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