नई दिल्ली/कोलकाता: पांच राज्यों के चुनाव परिणाम आज सामने आ चुके हैं, लेकिन सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश पश्चिम बंगाल से निकलकर पूरे देश की राजनीति को झकझोर रहा है। जो राज्य कभी तृणमूल कांग्रेस का अभेद किला माना जाता था, वहां अब भारतीय जनता पार्टी की मजबूती एक बड़े बदलाव का संकेत दे रही है।
यह सिर्फ एक चुनाव परिणाम नहीं है-यह एक पैटर्न है, जो पिछले कुछ वर्षों से बन रहा था और अब खुलकर सामने आ गया है।
पिछले दशक में कई क्षेत्रीय दलों ने एक समान राजनीतिक लाइन अपनाई-
"कांग्रेस खत्म हो चुकी है, हम ही विकल्प हैं।"
लेकिन नतीजे क्या रहे?
राजनीतिक हकीकत यह बताती है कि बीजेपी को हराने से ज्यादा ऊर्जा कांग्रेस को रोकने में खर्च की गई-और इसका फायदा सीधे भाजपा को मिला।
भारतीय राजनीति में तथाकथित "तीसरा मोर्चा" हमेशा एक आकर्षक विचार रहा है, लेकिन इतिहास इसका रिकॉर्ड साफ दिखाता है-
तीसरा मोर्चा कभी भी भाजपा को निर्णायक रूप से नहीं हरा पाया।
न तो राष्ट्रीय स्तर पर, न ही बड़े राज्यों में।
इसके विपरीत, जहां-जहां कांग्रेस ने सीधी लड़ाई लड़ी, वहां परिणाम अलग दिखे:
यानी एक बात साफ है-राष्ट्रीय स्तर पर मुकाबला करने की क्षमता अभी भी कांग्रेस के पास है।
पश्चिम बंगाल के ताजा नतीजे यह बताते हैं कि
अगर विपक्ष बिखरा रहेगा, तो भाजपा को रोकना लगभग असंभव हो जाएगा।
राजनीति में "स्पेस" खाली नहीं रहता-
जहां विपक्ष कमजोर होता है, वहां कोई न कोई उस जगह को भर देता है।
और इस समय, वह जगह भाजपा तेजी से भर रही है।
आज सवाल यह नहीं है कि कौन बड़ा है या छोटा-
सवाल यह है कि रणनीति क्या है?
क्योंकि अगर यही स्थिति जारी रही, तो कई दल सिर्फ इतिहास की किताबों तक सिमट सकते हैं।
यह कहना गलत होगा कि कोई एक पार्टी अजेय है।
लेकिन यह भी उतना ही सच है कि बिखरा हुआ विपक्ष किसी भी मजबूत सत्ताधारी दल के लिए सबसे बड़ा फायदा होता है।
आज की राजनीति में संदेश साफ है:
अहंकार बनाम एकजुटता - यही असली चुनाव है।
और अगर इस सवाल का जवाब नहीं मिला,
तो आने वाले चुनावों में सिर्फ नतीजे नहीं बदलेंगे-
पूरी राजनीतिक तस्वीर बदल जाएगी।

