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देशभर से एक दिन बाद नंदगांव में क्यों मनती है श्रीकृष्ण जन्माष्टमी? जानिए सदियों पुरानी अनूठी परंपरा

देशभर से एक दिन बाद नंदगांव में क्यों मनती है श्रीकृष्ण जन्माष्टमी? जानिए सदियों पुरानी अनूठी परंपरा

नवभारत 1 month ago

Krishna Janmashtami Tradition Nand Bhawan: भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं की पावन भूमि नंदगांव में जन्माष्टमी का पर्व इस बार देशभर से एक दिन बाद मनाया जाएगा। मथुरा-वृंदावन सहित देश के अधिकांश हिस्सों में जहां 4 सितंबर को भगवान श्रीकृष्ण का 5253वां जन्मोत्सव मनाया जाएगा, वहीं नंदगांव में 5 सितंबर को श्रीकृष्ण जन्मोत्सव और 6 सितंबर को नंद महोत्सव का आयोजन होगा।

जन्माष्टमी की तिथि में यह अंतर किसी पंचांग संबंधी भूल का परिणाम नहीं, बल्कि नंदगांव की सदियों पुरानी विशिष्ट धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा है।

नंदगांव स्थित नंद भवन में जन्माष्टमी की तैयारियां रक्षाबंधन से ही शुरू हो जाती हैं। रक्षाबंधन के दिन से ही नंद भवन में बालकृष्ण के जन्म की बधाई के पदों का गायन प्रारंभ हो जाता है। जन्माष्टमी तक लगातार आठ दिनों तक रसिक संतों और ब्रज के पारंपरिक गायकों द्वारा अलग-अलग बधाई पद गाए जाते हैं। इन पदों में नंद बाबा के घर कान्हा के जन्म की खुशी, यशोदा मैया का वात्सल्य और ब्रजवासियों के उल्लास का अद्भुत वर्णन मिलता है।

तिथि घटे तो बधाई कैसे घटे?

नंदगांव में जन्माष्टमी की परंपरा के पीछे एक अनूठी मान्यता जुड़ी है। यहां भादो मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से प्रतिदिन अलग-अलग रसिक संतों द्वारा रचित बधाई के पद गोस्वामीजनों द्वारा गाए जाते हैं। प्रत्येक तिथि की अपनी विशेष बधाई मानी जाती है।

नंदगांव के सेवायत पुजारी कृष्ण मुरारी गोस्वामी बताते हैं कि पंचांग की सामान्य गणना में कभी-कभी तिथि क्षय हो जाती है। ऐसी स्थिति में यदि जन्माष्टमी उसी गणना के अनुसार मनाई जाए तो बधाई गायन की एक तिथि कम हो सकती है। लेकिन ब्रजवासियों के लिए अपने लाला के जन्मोत्सव में किसी भी तरह की कमी स्वीकार नहीं थी।

इसी मान्यता के चलते सदियों पहले नंद भवन के सेवायतों ने विशेष परंपरा निर्धारित की कि रक्षाबंधन के आठवें दिन नंदगांव में जन्माष्टमी मनाई जाएगी। इस व्यवस्था से बधाई गायन की सभी तिथियां पूरी रहती हैं और किसी भी बधाई में कटौती नहीं करनी पड़ती। यही परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी आज तक चली आ रही है।

जन्माष्टमी के अगले दिन नंद महोत्सव

नंदगांव में जन्माष्टमी केवल भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्य का पर्व नहीं है। यहां इसे नंद बाबा के घर लाला के जन्म और उसके बाद मनाए जाने वाले आनंदोत्सव के रूप में देखा जाता है। जन्माष्टमी के अगले दिन नंद महोत्सव मनाया जाता है।

नंद महोत्सव के दौरान नंद भवन में बधाई गायन, ब्रज के लोकगीत, भक्ति संगीत और पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन होता है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु नंद बाबा के आंगन में पहुंचकर कान्हा के जन्म की खुशी में शामिल होते हैं। वातावरण में गूंजती बधाइयां और जयकारे नंदगांव को पूरी तरह कृष्णमय कर देते हैं।

सैकड़ों वर्षों से चली आ रही इस परंपरा में आज भी बदलाव नहीं हुआ है। इस वर्ष 5 सितंबर को नंदगांव में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी और 6 सितंबर को नंद महोत्सव धूमधाम से मनाया जाएगा। देशभर में 4 सितंबर को जन्माष्टमी का उल्लास होगा, जबकि नंदगांव में एक दिन बाद कान्हा के जन्म की खुशियां मनाई जाएंगी।

नंदगांव की यह अनूठी परंपरा केवल तिथि के अंतर की कहानी नहीं, बल्कि ब्रज की उस भावभूमि का प्रतीक है, जहां भगवान श्रीकृष्ण आराध्य देव होने के साथ-साथ नंद बाबा-यशोदा के लाड़ले और ब्रजवासियों के अपने कान्हा हैं। यही वजह है कि यहां जन्माष्टमी की तारीख बदल सकती है, लेकिन कान्हा के प्रति ब्रजवासियों का प्रेम और उत्सव की परंपरा सदियों से अटूट है।

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