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Raksha Bandhan 2026: भाई-बहन के प्रेम का पर्व, जानें रक्षाबंधन से जुड़ी प्रसिद्ध पौराणिक कहानियां

Raksha Bandhan 2026: भाई-बहन के प्रेम का पर्व, जानें रक्षाबंधन से जुड़ी प्रसिद्ध पौराणिक कहानियां

नवभारत 3 months ago

Raksha Bandhan Story: रक्षाबंधन भाई-बहन के पवित्र रिश्ते का त्योहार है। यह महज एक रिवाज नहीं है, बल्कि उस भाव का उत्सव है जहां प्यार, विश्वास और सुरक्षा की भावना को सेलिब्रेट किया जाता है।

बहन द्वारा भाई की कलाई पर बांधा गया धागा धागा उसके प्यार, दुआओं और भरोसे का प्रतीक होता है। भाई उसे उपहार देकर यह वचन देता है कि वह जीवन भर उनकी रक्षा करेगा और हर परिस्थिति में उनके साथ खड़ा रहेगा।

राखी के त्योहार से हमें सीख मिलती है कि जहां भावनाएं सच्ची हों, वहां राखी का बंधन और भी खास हो जाता है। इस साल रक्षाबंधन 28 अगस्त को मनाया जाता है। आइए जानते है रक्षाबंधन से जुड़ी पौराणिक कथाओं के बारे में।

माता लक्ष्मी और राजा बलि की कथा

रक्षाबंधन की एक कहानी माता लक्ष्मी और राजा बलि से जुड़ी है। इसका विवरण भगवत पुराण से लेकर विष्णु पुराण में भी मिलता है। जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर राजा बलि से तीन पग भूमि मांगी और अपनी माया से तीनों लोकों को नाप लिया, तब राजा बलि ने अपना सब कुछ दान कर दिया। अपने वचन के पालन के लिए, राजा बलि ने भगवान विष्णु से आग्रह किया कि वे सदा उनके पास पाताल लोक में निवास करें।

कहते है भगवान विष्णु राजा बलि के प्रेम और भक्ति से प्रभावित होकर उनके साथ रहने चले गए। लेकिन इस निर्णय से माता लक्ष्मी बहुत व्याकुल हो गईं। भगवान विष्णु का वापस लाने के लिए देवी लक्ष्मी ने एक उपाय सोचा। देवी लक्ष्मी एक सामान्य स्त्री के वेश में राजा बलि के महल पहुंचीं। उन्होंने राजा से शरण मांगी और उन्हें राखी बांधकर अपना भाई बना लिया। राजा बलि बहन के प्रेम और सरल भाव से अभिभूत हो गए। इसके बाद जब लक्ष्मी ने प्रभु को ले जाने की अपनी इच्छा व्यक्त की, तो राजा बलि ने बिना एक क्षण गवाएं इसे तुरंत स्वीकार कर लिया।

रक्षा बंधन (फोटो.सोशल मीडिया)

श्रीकृष्ण और द्रौपदी का बंधन

श्रीकृष्ण और द्रौपदी का रिश्ता सखा का है, लेकिन यह सामान्य बंधन नहीं, आत्मा से जुड़ा पवित्र बंधन था। द्रौपदी और श्रीकृष्ण की मित्रता की शुरुआत तब हुई जब श्रीकृष्ण को युद्ध के दौरान उंगली में चोट लग गई। खून बह रहा था और आस-पास कोई उपचार नहीं था। द्रौपदी ने बिना देर किए अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर श्रीकृष्ण की उंगली पर बांध दिया।

इस छोटे से प्रेम भरे व्यवहार से श्रीकृष्ण अत्यंत भावुक हो उठे। उन्होंने उसी क्षण मन ही मन यह संकल्प लिया कि जब भी द्रौपदी संकट में होंगी, वे उसकी रक्षा अवश्य करेंगे। यह संकल्प मात्र एक वचन नहीं, बल्कि एक रक्षा कवच बन गया। जब महाभारत में कौरवों ने द्रौपदी का चीरहरण करने का प्रयास किया था तब सभा में सभी लोग मौन थे, लेकिन कृष्ण ने अपने वचन को निभाते हुए द्रौपदी की लाज बचाई और द्रौपदी की साड़ी अंतहीन होती गई और कौरव द्रौपदी का चीरहरण करने में विफल हुए।

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