नई दिल्ली/इस्लामाबाद: हर साल 5 अगस्त आते ही जम्मू-कश्मीर को लेकर भारत और पाकिस्तान में राजनीतिक और कूटनीतिक बयानबाजी तेज हो जाती है। भारत सरकार इसे अनुच्छेद 370 हटाए जाने की वर्षगांठ के रूप में जम्मू-कश्मीर के पूर्ण एकीकरण और विकास की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताती है जबकि पाकिस्तान इसे 'यौम-ए-इस्तेहसाल' के रूप में मनाकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपना विरोध दर्ज कराता है।
लेकिन इन राजनीतिक नारों से अलग यदि वास्तविक स्थिति का आकलन किया जाए तो नियंत्रण रेखा यानि LoC के दोनों तरफ मौजूद जम्मू-कश्मीर और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoJK) की तस्वीर एक-दूसरे से बिल्कुल अलग दिखाई देती है। एक तरफ भारतीय जम्मू-कश्मीर में बुनियादी ढांचे, पर्यटन और निवेश के क्षेत्र में बड़े बदलाव देखने को मिल रहे हैं वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान के कब्जे वाले इलाके में आर्थिक संकट, बेरोजगारी, अशांति, बिजली की समस्या और जन असंतोष लगातार बढ़ता दिखाई दे रहा है।
दोनों कश्मीर में इन्फ्रास्ट्रक्चर बना सबसे बड़ा अंतर
मोदी सरकार ने कश्मीर में काफी तेजी से डेवलपमेंट के काम को आगे बढ़ाया है और इसका जबरदस्त असर देखने को मिल रहा है। दरअसल किसी भी क्षेत्र के विकास का सबसे बड़ा आधार उसकी कनेक्टिविटी होती है। पिछले कुछ वर्षों में जम्मू-कश्मीर में सड़क, रेल और हवाई संपर्क पर बड़े पैमाने पर निवेश किया गया है।नवभारत टाइम्स से बात करते हुए जम्मू कश्मीर के पूर्व डीजीपी एसपी वैद ने कहा 'अब सोशल मीडिया का जमाना है और लोग तस्वीरें देखते हैं। पीओके के लोग देख रहे हैं भारत ने कश्मीर में क्या विकास के काम किए हैं। लेकिन उधर खाने के लाले पड़े हैं, बिजली इतनी महंगी है कि बिल चुकाना एक मुसीबत है।'
हिंदुस्तान टाइम्स में सीनियर जर्नलिस्ट शिशिर गुप्ता ने लिखा है कि चिनाब नदी पर बना दुनिया का सबसे ऊंचा रेलवे पुल सिर्फ इंजीनियरिंग की उपलब्धि नहीं माना जा रहा बल्कि यह घाटी को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने वाली रणनीतिक परियोजना भी है। इसके अलावा उधमपुर-श्रीनगर-बारामूला रेल परियोजना, नए राष्ट्रीय राजमार्ग, सुरंगों और आधुनिक हवाई अड्डों ने जम्मू-कश्मीर की कनेक्टिविटी को पहले की तुलना में कहीं ज्यादा मजबूत बनाया है।

पीओके में विकास करने में नाकाम रहा पाकिस्तान
जबकि इसके विपरीत पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में रेलवे नेटवर्क लगभग न के बराबर है। एलओसी के उस पार आज भी ज्यादातर परिवहन पुराने और सीमित सड़क नेटवर्क पर निर्भर है। कराकोरम हाईवे जरूर मौजूद है लेकिन उसका प्रमुख उद्देश्य चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के तहत रणनीतिक और व्यापारिक यातायात को बढ़ावा देना है। स्थानीय आबादी को इससे अपेक्षित आर्थिक लाभ नहीं मिल पाया है।दोनों कश्मीर में अर्थव्यवस्था में बढ़ता अंतर
अनुच्छेद 370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर में औद्योगिक निवेश को आकर्षित करने के लिए नई औद्योगिक नीति लागू की गई। सरकार के अनुसार इससे कश्मीर की अर्थव्यवस्था लगातार बढ़ रही है और GDP लगभग 2.65 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी, स्टार्टअप, पर्यटन, कृषि और सेवा क्षेत्र में निवेश बढ़ने के साथ-साथ 5G नेटवर्क जैसी सुविधाओं ने भी कारोबारी माहौल को बेहतर बनाने में भूमिका निभाई है।पर्यटन क्षेत्र में भी रिकॉर्ड वृद्धि देखने को मिली है। हाल के वर्षों में करोड़ों पर्यटक जम्मू-कश्मीर पहुंचे जिससे होटल, परिवहन, हस्तशिल्प, स्थानीय बाजार और छोटे कारोबारों को बड़ा लाभ हुआ। श्रीनगर सहित कई शहरों में रात के समय भी आर्थिक गतिविधियां बढ़ी हैं जिसे सामान्य स्थिति की वापसी के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। कई एक्सपर्ट का दावा है कि इसीलिए पाकिस्तानी सेना ने पहलगाम आतंकी हमला करवाया ताकि कश्मीर में होने वाले पर्यटन के विकास को पटरी से उतारा जा सके।
इसके उलट पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर की अर्थव्यवस्था पाकिस्तान के पाताल में जा चुकी इकोनॉमी से ग्रसित है। पाकिस्तान जब खुद दरिद्र है तो वो पीओके में क्या विकास करेगा। पीओके में ना उद्योग हैं ना कोई निवेश तो फिर विकास कैसे होगा। हां चीन जरूर अपने प्रोजेक्ट्स चला रहा है लेकिन इससे स्थानीय विकास को कोई मतलब नहीं है। पीओके में जो बिजली पैदा होती है उसे पाकिस्तानी पंजाब में कम कीमत पर भेजा जाता है।

खुद अंधेरे में बिजली पैदा करने वाला इलाका
पीओके पाकिस्तान के लिए जलविद्युत उत्पादन का महत्वपूर्ण केंद्र है। मंगला और नीलम-झेलम जैसी परियोजनाओं से बड़ी मात्रा में बिजली पैदा होती है लेकिन स्थानीय लोगों का आरोप है कि उन्हें इसका लाभ नहीं मिलता। रिपोर्टों के अनुसार कई इलाकों में लंबे समय तक बिजली कटौती होती है जबकि बिजली के बढ़ते बिल भी स्थानीय लोगों की नाराजगी का बड़ा कारण बने हुए हैं। यही वजह है कि पिछले कुछ समय से वहां बिजली दरों और महंगाई के खिलाफ लगातार प्रदर्शन देखने को मिले हैं।महंगाई और बेरोजगारी ने बढ़ाया जनाक्रोश
पिछले एक वर्ष के दौरान पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में कई बार बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए। प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगें किसी राजनीतिक मुद्दे से अधिक महंगाई, आटे की कीमत, बिजली बिल और स्थानीय संसाधनों पर अधिकार से जुड़ी रही हैं।स्थानीय मीडिया और विभिन्न रिपोर्टों के मुताबिक जुलाई 2026 में भी कई शहरों जैसे रावलाकोट, मुजफ्फराबाद, कोटली, मीरपुर, बाग और अन्य क्षेत्रों में बार बार प्रदर्शन हुए हैं। इन प्रदर्शनों के दौरान हिंसा और सुरक्षा बलों के साथ झड़पों की भी खबरें सामने आईं। पिछले दो महीने से जो प्रदर्शन चल रहा है उसमें 100 से ज्यादा लोग मारे गये हैं। विश्लेषकों का मानना है कि इन घटनाओं ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में बढ़ते असंतोष को उजागर किया है।
कश्मीर पर कैसे बदल रही है अंतरराष्ट्रीय धारणा?
शिशिर गुप्ता ने लिखा है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सिर्फ राजनीतिक बयान या कूटनीतिक दावे ही किसी क्षेत्र की स्थिति तय नहीं करते बल्कि निवेश, आर्थिक विकास, कानून-व्यवस्था, पर्यटन, आधारभूत ढांचा और लोगों का जीवन स्तर भी किसी क्षेत्र की वैश्विक छवि को प्रभावित करते हैं।भारत का दावा है कि अनुच्छेद 370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था से अधिक मजबूती से जुड़ा है और इससे विकास को नई गति मिली है। दूसरी तरफ पाकिस्तान लगातार कश्मीर मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाता रहा है लेकिन पीओके के भीतर आर्थिक चुनौतियां और स्थानीय असंतोष ने उसके दावे को मिट्टी में मिला दिया है। इसीलिए 5 अगस्त सिर्फ एक राजनीतिक तारीख नहीं रह गई है। यह नियंत्रण रेखा के दोनों ओर मौजूद दो अलग-अलग विकास मॉडलों की तुलना का प्रतीक भी बन चुकी है।

