जयपुर: पिंकसिटी की रफ्तार को नया पंख मिलने वाला है। केंद्र सरकार की ओर से जयपुर मेट्रो फेज-2 के लिए 42.80 किलोमीटर लंबे कॉरिडोर को मंजूरी मिलने के साथ ही शहर के यातायात परिदृश्य में क्रांतिकारी बदलाव की तैयारी शुरू हो गई है।
13,037.66 करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत वाले इस प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी खासियत यह होगी कि जयपुर की यह नई मेट्रो 'ड्राइवरलेस' होगी।
चार चरणों में होगा निर्माण: सबसे पहले 12 किमी की लाइन
राजस्थान मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन ने इस मेगा प्रोजेक्ट को समय सीमा के भीतर पूरा करने के लिए इसे चार चरणों में बांटने का निर्णय लिया है।- प्रथम चरण: सबसे पहले टोंक रोड पर प्रहलादपुरा से पिंजरापोल गौशाला तक करीब 12 किलोमीटर का रूट तैयार किया जाएगा। इसके लिए टेंडर प्रक्रिया वर्तमान में विचाराधीन है।
- अन्य चरण: दूसरे चरण में सीकर रोड (टोडी मोड़) से अंबाबाड़ी तक और फिर शहर के बीच वाले इलाकों में काम शुरू होगा। पूरे प्रोजेक्ट को आगामी 5 साल (2031 डेडलाइन) में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।
CBTC सिस्टम से संचालित होगी ट्रेन
जयपुर की मेट्रो-2 अत्याधुनिक CBTC प्रणाली से लैस होगी। यह तकनीक ट्रेन को बिना मानवीय हस्तक्षेप के सुरक्षित दूरी बनाए रखने और सटीक स्टेशन स्टॉपिंग की सुविधा देती है। ड्राइवरलेस होने के कारण यात्रियों को भविष्य की तकनीक का अनुभव मिलेगा।
परियोजना की मुख्य विशेषताएं और रूट
- कुल लंबाई: 42.80 किलोमीटर (प्रहलादपुरा से टोडी मोड़)।
- स्टेशनों की संख्या: कुल 36 स्टेशन बनेंगे।
- एलिवेटेड और अंडरग्राउंड: 34 स्टेशन एलिवेटेड होंगे, जबकि सांगानेर से जयपुर एयरपोर्ट के बीच मेट्रो अंडरग्राउंड चलेगी। एयरपोर्ट के नए टर्मिनल के नीचे भूमिगत मेट्रो स्टेशन प्रस्तावित है।
- कनेक्टिविटी: यह कॉरिडोर टोंक रोड, सीतापुरा, सांगानेर, अंबाबाड़ी, विद्याधर नगर और सीकर रोड जैसे व्यस्त इलाकों को जोड़ेगा।
फेज-1 से कनेक्टिविटी और फुट ओवरब्रिज
फेज-2 तैयार होने के बाद जयपुर मेट्रो का कुल नेटवर्क 57 किलोमीटर का हो जाएगा। फेज-2 को फेज-1 से जोड़ने के लिए रेलवे स्टेशन से खासा कोठी तक 1 फुट ओवरब्रिज और गवर्नमेंट हॉस्टल व चांदपोल मेट्रो स्टेशन के बीच एक स्पुर लाइन बनाई जाएगी।शहर को जाम से मिलेगी मुक्ति
एक रिपोर्ट के अनुसार, शहर की 75% आबादी (करीब 30 लाख लोग) उत्तर से दक्षिण की ओर सफर करती है। मेट्रो का यह नया कॉरिडोर आने के बाद सड़कों पर निजी वाहनों का दबाव कम होगा, ईंधन की बचत होगी और वायु प्रदूषण में भी गिरावट आएगी।
