नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई 2026 के छात्र प्रदर्शनों से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान कहा कि पुलिस को किसी भी स्थिति में अत्यधिक संयम बरतना चाहिए ताकि हालात नियंत्रण से बाहर न जाएं।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि युवाओं को हिंसा की ओर बढ़ने से रोकने के लिए उन्हें समझाना और भरोसा दिलाना अधिक प्रभावी तरीका है कि "देश की सबसे शक्तिशाली संस्था उनकी बात सुन रही है।
एजेंसियों को बरतनी चाहिए सावधानी
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि किसी भी विरोध-प्रदर्शन के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने वाली एजेंसियों को अत्यधिक संयम बरतना चाहिए और यदि कुछ "भटके हुए तत्व" पथराव जैसी घटनाओं में शामिल भी हों, तब भी युवाओं को समझाकर और परामर्श देकर शांत करने की कोशिश की जानी चाहिए। " अदालत ने इस टिप्पणी के साथ छात्र प्रदर्शन से जुड़े अन्य लंबित मामलों के साथ इस याचिका को भी टैग कर दिया।युवाओं की बात सुनिए और समझिए
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि युवाओं को सलाह और परामर्श की आवश्यकता होती है। उन्होंने कहा, "यदि कुछ भटके हुए तत्व पथराव में शामिल भी हो जाएं, तब भी युवाओं को समझाकर शांत करना जरूरी है। शक्तिशाली राज्य की ओर से अपनाया गया आक्रामक रवैया सामाजिक रूप से स्थिति को और अधिक बिगाड़ सकता है तथा आगे हिंसा को जन्म दे सकता है। इससे बचा जाना चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि यदि कोई अप्रिय घटना होती है तो पुलिस को भी अत्यधिक संयम बरतना चाहिए ताकि स्थिति नियंत्रण से बाहर न जाए।सबसे शक्तिशाली साधन लोगों की बात सुनना
अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में बेहद सावधानी से काम लेने की जरूरत है और युवाओं को हिंसा से दूर रखने के लिए संवाद सबसे प्रभावी माध्यम है।सीजेआई ने कहा, "हमें बहुत सावधानी से आगे बढ़ना होगा ताकि ये युवा हिंसा का रास्ता न अपनाएं। सबसे बेहतर तरीका उन्हें समझाना और शांत करना है। सबसे शक्तिशाली साधन है उनकी बात सुनना। उनकी बात सुनिए और समझिए कि वे क्यों आवाज उठा रहे हैं। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने वाली एजेंसियां ऐसी परिस्थितियों से निपटने का बेहतर अनुभव रखती हैं और अदालत इस विषय को उनके विवेक पर छोड़ती है।CJI बोले- युवाओं को समझाना ही बेहतर रास्ता
चीफ जस्टिस ने कहा कि इस स्थिति को बेहद सावधानी से संभालने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि युवाओं को उचित परामर्श देने और यह भरोसा दिलाने की जरूरत है कि उनकी बात सुनी जा रही है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि अगर कोई घटना होती है तो यह सुनिश्चित करने के लिए पुलिस को अत्यधिक संयम बरतना चाहिए कि स्थिति नियंत्रण से बाहर न जाए।SC ने बताया सबसे अच्छा तरीका
हमें बहुत सावधानी से आगे बढ़ना होगा ताकि युवा हिंसा का रास्ता न अपनाएं। सबसे बेहतर तरीका यह है कि उन्हें समझाया जाए, शांत किया जाए और यह भरोसा दिलाया जाए कि देश की सबसे शक्तिशाली संस्था उनकी बात सुन रही है। इसके बाद पीठ ने इस याचिका को छात्र प्रदर्शनों से जुड़े अन्य लंबित मामलों के साथ टैग कर दिया।जेनरेशन अल्फा बीटा का जिक्र करते हुए सीजेआई ने क्या कहा
याची ने कहा कि कल को जेनरेशन अल्फा, बीटा, डेल्टा भी आएंगी और सुप्रीम कोर्ट को कहा कि जेन-ज़ी (Gen Z) छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों को किसी भी राजनीतिक फैसले के आधार पर वापस नहीं लिया जाना चाहिए। उनका तर्क था कि ऐसा करने से भविष्य में होने वाले आंदोलनों के लिए एक खतरनाक नजीर स्थापित होगी। याचिका में सुप्रीम कोर्ट से केंद्र सरकार और राज्यों को निर्देश देने की मांग की गई है कि हालिया छात्र प्रदर्शनों से जुड़े दंगा मामलों को केवल किसी राजनीतिक समझौते या राजनीतिक सहमति के आधार पर वापस लेने से रोका जाए। इस दौरान चीफ जस्टिस ने कहा कि शक्तिशाली राज्य की ओर से दिखाई गई आक्रामकता स्थिति को और अधिक बिगाड़ सकती है।
स्थिति को सावधानी से संभालने की आवश्यकता
उन्होंने संकेत दिया कि संभव है मामलों को वापस लेने का निर्णय भी इसी भावना से लिया गया हो। चीफ जस्टिस ने कहा कि ये युवा हैं। इन्हें पर्याप्त मार्गदर्शन और परामर्श की आवश्यकता है। शक्तिशाली राज्य के नाम पर दूसरी ओर से किसी भी प्रकार की आक्रामकता स्थिति को अनावश्यक रूप से और बिगाड़ सकती है तथा आगे हिंसा को जन्म दे सकती है। इससे हर हाल में बचा जाना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि इस स्थिति को बेहद सावधानी से संभालने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि युवाओं को उचित परामर्श देने और यह भरोसा दिलाने की जरूरत है कि उनकी बात सुनी जा रही है।पुलिस का अपमान करने वालों की पहचान और सामुदायिक सेवा की मांग
यह जनहित याचिका मनीष कुमार सोलंकी ने अधिवक्ता-ऑन-रिकॉर्ड (AoR) पुलकित अग्रवाल के माध्यम से दाखिल की है। याचिका में केंद्र सरकार और अन्य संबंधित प्राधिकरणों को निर्देश देने की मांग की गई है कि जुलाई 2026 के प्रदर्शनों और मार्च के दौरान पुलिस तथा सुरक्षा बलों के खिलाफ कथित रूप से अपमानजनक, अशोभनीय या मानहानिकारक भाषा का इस्तेमाल करने वाले सभी लोगों की पहचान की जाए। याचिका के अनुसार, वीडियो रिकॉर्डिंग, तस्वीरों और अन्य विश्वसनीय साक्ष्यों के आधार पर विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया का पालन करते हुए नाबालिग और वयस्क सभी आरोपितों की पहचान की जानी चाहिए।धार्मिक और सार्वजनिक स्थलों पर सफाई कार्य कराने का सुझाव
याचिका में मांग की गई है कि जिन लोगों की पहचान हो, उन्हें न्यायिक निगरानी में उपयुक्त सामुदायिक सेवा करने का निर्देश दिया जाए। इसमें धार्मिक स्थलों या अन्य सार्वजनिक स्थानों पर स्वच्छता और सफाई जैसे कार्य शामिल करने का सुझाव दिया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह व्यवस्था उनके खिलाफ कानून के तहत शुरू होने वाली किसी भी आपराधिक कार्रवाई से स्वतंत्र होगी और उससे प्रभावित नहीं होगी।राजनीतिक समझौते के आधार पर केस वापसी पर भी आपत्ति
याचिका में केवल पुलिसकर्मियों के कथित अपमान का मुद्दा ही नहीं उठाया गया है, बल्कि दंगों और प्रदर्शनों से जुड़े मामलों में राजनीतिक समझौते के आधार पर मुकदमा वापस लेने की संभावना पर भी गंभीर चिंता जताई गई है। याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से घोषणा करने की मांग की है कि केंद्र या कोई भी राज्य सरकार केवल राजनीतिक समझौते या सहमति के आधार पर दंगा अथवा हिंसक प्रदर्शन से जुड़े मामलों में सामूहिक माफी (Blanket Pardon), आम माफी (Amnesty) या अभियोजन वापसी का निर्णय नहीं ले सकती। ऐसे किसी भी निर्णय को केवल कानून और आपराधिक अभियोजन वापस लेने से संबंधित वैधानिक प्रावधानों के अनुरूप ही लिया जाना चाहिए।अंतरिम राहत की भी मांग
याचिका में अंतिम निर्णय होने तक अंतरिम आदेश जारी करने का भी अनुरोध किया गया है। इसके तहत केंद्र सरकार, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को जून-जुलाई 2026 के छात्र प्रदर्शनों अथवा इसी प्रकार के दंगा संबंधी मामलों में केवल राजनीतिक समझौते या समझ के आधार पर अभियोजन वापस लेने से रोकने की मांग की गई है। अदालत ने फिलहाल इस पर कोई अंतिम टिप्पणी किए बिना इसे छात्र प्रदर्शन से जुड़े अन्य लंबित मामलों के साथ सुनवाई के लिए सूचीबद्ध कर दिया है
