याचिका में आरोप है कि अप्रैल में FIR दर्ज होने के बावजूद जांच में कोई ठोस प्रगति नहीं हुई।
दिल्ली हाई कोर्ट ने दिए निर्देश
जस्टिस गिरीश कठपालिया की बेंच ने 30 जुलाई को मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की उस दलील पर गौर किया कि सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे डिजिटल अरेस्ट मामलों की जांच के लिए CBI को नोडल एजेंसी बनाया है। हाई कोर्ट ने मामले में नोटिस जारी करते हुए अगली सुनवाई के लिए 13 अगस्त तय की है।क्या था पूरा मामला
याचिका के मुताबिक, 6 से 27 अप्रैल के बीच ठगों ने खुद को CBI और ED का अधिकारी बताकर बुजुर्ग महिला को लगातार विडियो कॉल पर निगरानी में रखा। उन पर मनी लॉन्ड्रिंग में शामिल होने का झूठा आरोप लगाया गया और धमकी दी गई कि सहयोग नहीं करने पर उनके बच्चों को गिरफ्तार कर लिया जाएगा।डर कर भेज दिए लाखों रुपए
लगातार मानसिक दबाव और डर के कारण महिला ने पहले 3 लाख रुपये ट्रांसफर किए। इसके बाद 4.95 लाख का लोन लेने के लिए अपने सोने के गहने गिरवी रख दिए। इतना ही नहीं, उन्होंने वसंत कुंज स्थित अपना मकान बेचने के लिए करीब 2.4 करोड़ रुपये का बिक्री समझौता भी कर लिया। याचिका में दावा
याचिका में दावा किया गया है कि ठगी का तरीका बेहद सुनियोजित था। ठगों ने सुशांत कुमार नाम के एक व्यक्ति को महिला के घर भेजा, जिसने मकान के मूल मालिकाना दस्तावेज अपने कब्जे में ले लिए। इस पूरे घटनाक्रम का खुलासा तब हुआ, जब नीदरलैंड्स में रह रही उनकी बेटी ने विडियो कॉल पर अपनी मां की घबराई हुई हालत देखी और परिवार को इसकी जानकारी दी। याचिकाकर्ताओं की ओर से एडवोकेट कुश शर्मा और निहारिका तंवर ने अदालत को बताया कि यह साइबर ठगी का बेहद संगठित और खतरनाक मामला है, इसलिए इसकी जांच किसी विशेष एजेंसी से कराई जानी चाहिए।