मोतिहारी: बिहार के सीमावर्ती शहर रक्सौल से नेपाल की राजधानी काठमांडू को जोड़ने वाली महत्वाकांक्षी रेल परियोजना अब धरातल पर उतरने के करीब है। वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए विदेश मंत्रालय ने फाइनल लोकेशन सर्वे के लिए रेलवे को 41 करोड़ रुपए का फंड आवंटित किया है।
136 किलोमीटर लंबी इस विद्युतीकृत रेल लाइन के निर्माण पर लगभग 70 हजार करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है। इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य केवल सीमावर्ती क्षेत्रों को जोड़ना नहीं, बल्कि भारतीय राजधानी दिल्ली को सीधे काठमांडू के रेल नेटवर्क से जोड़ना है। वर्ष 2016 में शुरू हुई इस द्विपक्षीय योजना से दोनों देशों के बीच व्यापार और पर्यटन को नई ऊंचाई मिलेगी।
41 करोड़ के फंड से शुरू होगा फाइनल सर्वे
विदेश मंत्रालय की ओर से वित्तीय सहायता मिलने के बाद अब फाइनल लोकेशन सर्वे का काम जल्द शुरू किया जाएगा। वर्तमान में इस परियोजना की डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट (DPR) तैयार की जा रही है। सर्वे का काम पूरा होते ही निर्माण की प्रक्रिया में तेजी आएगी। ये पूरी परियोजना विदेश मंत्रालय के वित्तीय सहयोग से भारतीय रेलवे की ओर से पूरी की जाएगी।- रक्सौल (बिहार) से काठमांडू के बीच कुल 136 किलोमीटर लंबी विद्युतीकृत लाइन।
- इस रूट में कुल 13 स्टेशन होंगे, जिनमें वीरगंज, पिपरा, शिखरपुर और सिसनेरी प्रमुख हैं।
- रेल लाइन रक्सौल से शुरू होकर जीतपुर, निजगढ़ और चोभर होते हुए काठमांडू पहुंचेगी।
- वर्तमान में बस से लगने वाले 6 घंटे (रक्सौल से) के मुकाबले रेल से मात्र दो से ढाई घंटे लगेंगे।
दिल्ली से काठमांडू तक सीधा नेटवर्क
इस प्रोजेक्ट का सबसे महत्वपूर्ण पहलू दिल्ली और काठमांडू के बीच सीधा रेल लिंक स्थापित करना है। इससे न केवल यात्रियों को सुविधा होगी, बल्कि माल ढुलाई में भी भारी कमी आएगी। भारत और नेपाल के बीच हुए 2016 के समझौते के तहत यह दक्षिण एशिया की सबसे महत्वपूर्ण सामरिक और आर्थिक रेल परियोजनाओं में से एक मानी जा रही है। रक्सौल से काठमांडू के बीच 13 रेलवे स्टेशन प्रस्तावित हैं, जिनमें रक्सौल, वीरगंज, बगही, पिपरा, डुमरवाना, चंद्रपुर, शिखरपुर, सिसनेरी, काठमांडू शामिल हैं।नेपाल में विकास के साथ आर्थिक फायदा
नेपाल के पहाड़ी रास्तों और दुर्गम इलाकों से गुजरने वाली यह रेल लाइन वहां के परिवहन बुनियादी ढांचे को बदल देगी। शिखरपुर और सिसनेरी जैसे क्षेत्रों के जुड़ने से स्थानीय व्यापार को गति मिलेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि 70 हजार करोड़ की यह लागत भविष्य में दोनों देशों के बीच होने वाले आयात-निर्यात और मैत्रीपूर्ण संबंधों के लिए एक बड़ा निवेश साबित होगी।
