विवेक शुक्ला: पंजाबी के शिखर कवि शिव कुमार बटालवी दिल्ली आने पर अमृता प्रीतम के हौज खास वाले घर में हाजिरी न दें, अपनी ताजा रचनाएं न सुनाएं- यह संभव नहीं होता था! वह कविता पाठ का आरंभ अपनी कालजयी रचना से ही करते, 'की पुछ दे ओ हाल फकीरां दा, साडा नदियों बिछड़े नीरां दा।
साडा हंज दी जूने आयां दा साडा दिल जलया दिलगीरां दा...।' यानी, हम जैसे फकीरों का हाल आप क्या पूछते हैं? हम तो नदियों से बिछड़े पानी जैसे हैं। जैसे किसी आंसू से निकले हैं...।
रचनाकारों की महफिल: अमृता प्रीतम का घर पंजाबी साहित्य की अनमोल धरोहर था। बटालवी के आगमन पर जमी महफिल में चित्रकार इमरोज, हिंदी-पंजाबी-अंग्रेजी-उर्दू के लेखक करतार सिंह दुग्गल, सरदार नानक सिंह (जिनके उपन्यास पर फिल्म पवित्र पापी बनी), डॉ. हरभजन सिंह, मोहिंदर सिंह सरना अवश्य मौजूद रहते। बटालवी 1967 में साहित्य अकादमी पुरस्कार पाने वाले सबसे कम उम्र के साहित्यकार बने।
खालसा कॉलेज से नाता: शिव कुमार बटालवी की 90वीं जयंती बीती 23 जुलाई को थी, पर दिल्ली में उनकी याद में कोई औपचारिक कार्यक्रम आयोजित नहीं हुआ। यह बेहद अफसोसजनक है। दिल्ली से उनका खास नाता था। शिव बटालवी ने देव नगर के खालसा कॉलेज में कई बार अपनी रचनाएं पढ़ीं। हरमीत सिंह बताते हैं कि जब वह 1970 में खालसा कॉलेज आए तो उनके चाहने वालों का हुजूम कैंपस के बाहर भी लगा हुआ था। छात्रों-शिक्षकों में गजब का उत्साह था। उन्होंने अपना गीत सुनाया, 'मैंनू तेरा शबाब लै बैठा, रंग गोरा गुलाब लै बैठा। किन्नी पीती ते किन्नी बाकी ए, मैनू एहो हिसाब लै बैठा।' उन्होंने कवि-सम्मेलनों के लिए मशहूर सप्रू हाउस में भी कविता पाठ किए। दरअसल, एक दौर में सप्रू हाउस पंजाबी नाटकों और कवि-सम्मेलनों के लिए भी जाना जाता था।
पंजाबी साहित्य को पहचान: दिल्ली को अक्सर पंजाबी समाज के सांस्कृतिक प्रभाव वाला शहर कहा जाता है। यहां पंजाबी मूल के लाखों लोग बसते हैं। ऐसे में बटालवी की जयंती पर साहित्यिक संस्थाओं, पंजाबी अकादमियों और सांस्कृतिक संगठनों की चुप्पी खलती है। बटालवी की कविताएं आज भी दिलों को छूती हैं, पर उनकी स्मृति को जीवित रखने का कर्तव्य समाज ने नहीं निभाया। विरह उनके काव्य का केंद्र था और वह इसे इतनी गहरी संवेदना से प्रस्तुत करते कि श्रोता अपनी ही यादों में खो जाते। दिल्ली जैसे शहर में शिव बटालवी की जयंती को चुपचाप बीत जाने देना वास्तव में दुखद है। हमने एक ऐसे कवि को भुला दिया है, जिसने पंजाबी साहित्य को विश्व स्तर पर पहचान दिलाई।

