नई दिल्ली: संत कबीर का एक दोहा है, निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय, बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय। भारतीय न्यायपालिकाएं भी स्वस्थ निंदा या आलोचना को प्रोत्साहित करती हैं।
लेकिन एक बड़ा सवाल हमेशा सबके जेहन में उठता है, क्या राजनेता हो या अभिनेता, आम नागरिक या हो वकालत के पेश से ही जुड़ा कोई वकील, किसी जज या किसी कोर्ट या उसके फैसलों की आलोचना कर सकते हैं? अगर हाँ, तो उसकी सीमा क्या है? और कब यह आलोचना "कोर्ट की अवमानना" Contempt of Court बन जाती है?
हाल के वर्षों में कई विवादों और फैसलों ने इस बहस को और तेज किया है। सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में भी स्पष्ट किया है कि "फेयर क्रिटिसिज्म यानि निष्पक्ष आलोचना स्वीकार्य है, लेकिन "बेबुनियाद आरोप" न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुंचाते हैं। इस लीगल विश्लेषण में हम विस्तार से समझेंगे कि आलोचना और अवमानना के बीच की बारीक कानूनी रेखा यदि है तो वह क्या है?
कोर्ट की अवमानना और इसके उद्देश्य
सरल भाषा में भारत में "कोर्ट की अवमानना" का अर्थ है-ऐसा व्यवहार या कार्य जो अदालत की गरिमा, अधिकार या न्याय प्रक्रिया को प्रभावित करे। इसे Contempt of Courts Act यानि न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 के कानून के जरिए नियंत्रित करता है। इसके तहत अदालतों को यह अधिकार है कि वे अपने आदेशों की अवहेलना या न्याय में बाधा डालने वाले कार्यों पर सजा दे सकें। इस कानून को प्रावधानों के जरिए जो न्यायालयों को शक्ति दी गई है, उस आधार पर इस कानून के मुख्य उद्देश्य है:- न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाए रखना
- अदालत के आदेशों का पालन सुनिश्चित करना
- न्याय प्रक्रिया में बाधा रोकना
- न्यायपालिका की गरिमा बनाए रखना
- न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाए रखना
- जनता का न्यायपालिका में भरोसा बनाए रखना

अवमानना के प्रकार: सिविल और क्रिमिनल
न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 के प्रावधान अवमानना को दो हिस्सों में बांटता है।- सिविल कंटेम्प्ट: इसमें कोर्ट के आदेशों का जानबूझकर उल्लंघन किया जाए या फिर कोर्ट को दिए गए आश्वासन का उल्लंघन किया जाए तो सिविल अवमानना के केस बनते है।
- क्रिमिनल कंटेम्प्ट: ऐसे मामलों में अदालतों की किसी भी तरीके से छवि खराब करने की कोशिश शामिल होती है। किसी का जबरदस्ती न्याय प्रक्रिया में बाधा डालना या न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप करना भी क्रिमिनल अवमानना का केस बनाती है। इसे यदि एक उदाहरण से समझें तो तो यदि किसी स्थिति में कोई व्यक्ति जज पर बिना सबूत के भ्रष्टाचार का आरोप लगाता है, तो यह क्रिमिनल अवमानना हो सकता है।
सवाल कि क्या जज की आलोचना करना अपराध
इसका सरल और सीधा जवाब है कि हर परिस्थितियों में ऐसा नहीं होता। कई बार मामूली बातों को अदालतें नजरअंदाज कर देती हैं। इसे लेकर न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 साफ कहता है कि अदालती फैसलों की आलोचना की जा सकती है। अदालत के द्वारा संपादित किए जा रहे न्यायिक कार्यों का विश्लेषण किया जा सकता है। ऐसे मामलों में निष्पक्ष और तथ्यात्मक टिप्पणी वैध है। लेकिन शर्त यह है कि आलोचना तथ्यों पर आधारित हो और सभ्य और शालीन भाषा में हो। यह कोशिश होनी चाहिए कि ऐसे मामलों पर टिप्पणी या आलोचना करते वक्त न्यायपालिका की गरिमा को नुकसान न पहुंचाया जाए। ऐसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि "फेयर क्रिटिसिज्म स्वीकार्य है, लेकिन निराधार आरोप नहीं।"आलोचना कब बन जाती है अवमानना?
यदि एक लाइन में लिखना हो तो कह सकते हैं कि अवमानना से जुड़ा कानून कहता है कि केवल वही कार्रवाई दंडनीय है जो "न्याय प्रशासन में वास्तविक हस्तक्षेप" करे। इसको अन्य परिस्थितियों में समझें तो कह सकते हैं कि आलोचना तब "Contempt" बन जाती है जब कोई- बेबुनियाद आरोप लगाए - जैसे-बिना प्रमाण जज को पक्षपाती या भ्रष्ट कहना
- न्याय प्रक्रिया को प्रभावित करे - जैसे-चल रहे केस पर ऐसा बयान देना जिससे न्याय प्रभावित हो
- अदालत की प्रतिष्ठा गिराने का उद्देश्य हो - जैसे-सोशल मीडिया पर अपमानजनक टिप्पणी
- कोर्ट के आदेश का उल्लंघन - जैसे-स्टे ऑर्डर के बावजूद निर्माण करना
सुप्रीम कोर्ट के अहम फैसले व दिशा-निर्देश क्या रहे हैं
- प्रशांत भूषण केस, 2020: सुप्रीम कोर्ट ने वकील प्रशांत भूषण को उनके ट्वीट्स के लिए दोषी ठहराया। इस विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि आलोचना करना गलत नहीं है, लेकिन न्याययिक संस्थाओं की गरिमा गिराने की कोशिश की गलत है । ऐसी कोशिश गलत मानदंड पेश करती है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने प्रशांत भूषण को प्रतीकात्मक रुप से महज ₹1 का जुर्माना लगाया।
- ई.एम.एस. नंबूदरीपाद बनाम टी.एन. नांबियार, 1970: इस मामले को भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में अवमानना कानून से जुड़े मामलों में मानक माना जाता है। 1967 में केरल के तत्कालीन मुख्यमंत्री और प्रमुख मार्क्सवादी नेता ई.एम. शंकरन नंबूदरीपाद ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में भारतीय न्यायपालिका की कड़ी आलोचना की। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, जहां न्यायालय ने उच्च न्यायालय के ई.एम.एस. नंबूदरीपाद पर 1000 रुपयों के जुर्माने के फैसले को बरकरार रखा और कहा कि ऐसे बयान जो न्यायपालिका की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हैं और उसे 'दमन का साधन' बताते हैं, वे अदालत की अवमानना के दायरे में आते हैं। अदालत ने कहा कि न्यायपालिका पर "सामान्य राजनीतिक आलोचना" स्वीकार्य है, लेकिन संस्था को कमजोर करने या संस्था पर सीधे प्रहार करने वाले बयान नहीं स्वीकार्य नहीं है।
- पी.एन. दुदा बनाम वी.पी. शिव शंकर, 1988: का मामला भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिया गया एक महत्वपूर्ण निर्णय है, जो न्यायालय की अवमानना (Contempt of Court) और न्यायपालिका की आलोचना की सीमाओं से संबंधित है। उस वक्त तत्कालीन केंद्रीय कानून और न्याय मंत्री, पी. शिव शंकर ने हैदराबाद में बार काउंसिल के एक कार्यक्रम में भाषण दिया था। उन्होंने आरोप लगाया था कि न्यायपालिका "अभिजात वर्ग" के प्रति झुकाव रखती है और कुछ फैसलों की तीखी आलोचना की थी। इस पर अधिवक्ता पी.एन. दुदा ने याचिका लगाई गई जिसमें कहा गया कि यह भाषण न्यायालय को बदनाम करता है और इसकी गरिमा को ठेस पहुँचाता है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस याचिका को खारिज कर दिया और पी. शिव शंकर को अवमानना का दोषी नहीं माना। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि पूरे भाषण को सुना जाना जरूरी है। पूरे भाषण का उद्देश्य न्यायिक प्रणाली की जवाबदेही पर चर्चा करना था, न कि न्यायालय को बदनाम करना, लोकतंत्र में आलोचना जरूरी है।
- अरुंधति रॉय अवमानना मामला, 2002 - यह मामला नर्मदा बचाओ आंदोलन से जुड़ी अरुंधति रॉय की टिप्पणी और न्यायालय के प्रति हलफनामे में राय के द्वारा तीखी आलोचना के कारण बना था। सर्वोच्च न्यायालय के बाहर एक विरोध प्रदर्शन के बाद, अदालत ने अरुंधति रॉय को आपराधिक अवमानना का नोटिस जारी किया था। न्यायाधीश जी.बी. पट्टानाइक और आर.पी. सेठी की पीठ ने उन्हें दोषी पाया जिसके बाद अदालत ने उन्हें एक दिन की प्रतीकात्मक कारावास और ₹2,000 का जुर्माना लगाया।
कब होगी जेल, कब लगेगा जुर्माना
न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 साफ कहता है कि ऐसे मामलों में अधिकतम 6 महीने की जेल हो सकती है या फिर ₹2000 तक जुर्माना लग सकता है। कई परिस्थियों में अदालत के विवेक पर दोनों एक साथ लगाए जा सकते हैं। लेकिन अमूमन ऐसा होता नहीं। अदालतें कई बार महज केवल चेतावनी दे कर आरोपी को छोड़ देती हैं। कई बार आरोपी व्याकि की माफी को स्वीकार कर लिया जाता है। विशेष परिस्थितियों में प्रतीकात्मक जुर्माना लग सकता है जैसे प्रशांत भूषण के केस में महज 1 रुपये का जुर्माना लगाया गया था।सर्वोपरि कौन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता या न्यायपालिका की गरिमा
इस पूरे विवाद का एक पक्ष यह भी है कि भारत, अपने संविधान के जरिए अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। तो फिर सवाल यह उठेगा तो फिर क्यों न्यायालयों को भला क्यों किसी के बोलने या टिप्णणियों से आपत्ति है? इसी मसले का जवाब, भारतीय संविधान से ही मिलेगा। भारत के संविधान का अनुच्छेद 19(2) नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को असीमित न कर के इस पर "उचित प्रतिबंध" भी लगाता है।जिसमें कोर्ट की अवमानना भी शामिल है। कह सकते हैं कि बोलने पर रोक नहीं हैं, लेकिन उसकी सीमा है। न्यायपालिका पर दुर्भावनाग्रस्त टिप्पणियां करना किसी हाल में सही नहीं।आलोचना का अधिकार है, लेकिन जिम्मेदारी के साथ
भारतीय लोकतंत्र में न्यायपालिका को संविधान का संरक्षक माना जाता है। अदालतों की स्वस्थ परंपरा यह मानती है कि निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय, बहुत जरूरी है। कह सकते हैं कि भारत में जज या कोर्ट की आलोचना करना अपने आप में अपराध नहीं है। बल्कि लोकतंत्र में यह आवश्यक भी है। लेकिन सीमा पार करते ही वही आलोचना "अवमानना" बन सकती है। देश के हर नागरिक को इस लक्ष्मण रेखा को ध्यान में रखना जरूरी है।
