न्याय के देवता शनिदेव मनुष्य को उसके कर्मों के अनुसार ही फल देते हैं। ज्योतिषशास्त्र में शनि ग्रह की महादशा को बहुत ही अहम चरण माना गया है। 19 वर्षों तक चलने वाली इस महादशा में व्यक्ति को अपने कर्मों और कुंडली में शनि की स्थिति के अनुसार शुभ-अशुभ फल प्राप्त होते हैं।
अगर कुंडली में शनि की स्थिति सही न हो, तो यह राजा को भी रंक बना सकती है। वहीं, शनि की अनुकूलता से रंक भी राजा बन सकता है। ऐसे में अगर आप शनि की दशा, महादशा से परेशान हैं और इसके लिए कोई उपाय खोज रहे हैं, तो इस विधि से शनि महाराज की पूजा करके शुभ फल प्राप्त कर सकते हैं। आइए विस्तार से जानें शनिदेव की पूजा विधि मंत्र सहित।
शनिदेव पूजन सामग्री
शनिदेव की पूजा और आराधना के लिए लिए सबसे पहले पूजन सामग्री एकत्रित कर लें।
- आम की लकड़ी से बना काले रंग का सिंहासन या लोहे का सिंहासन
- काला वस्त्र
- यजमान हेतु काले वस्त्र का जोड़ा
- काला अंगोछा
- काले पुष्प
- काला तिल
- उड़द
- सरसों का तेल
- दीपक
- रुई
- काले तिल के लड्डू
- अरबी
- पंचपात्र
- काला कंबल
- शहद
- शक्कर
- दही
- गाय का दूध
- लौंग
- इलायची
- सूखे मेवे
- हवन सामग्री
शनिदेव पूजा विधि
दाहिने हाथ की अंगुलि में थोड़ा सा जल लेकर उसे अपने शरीर पर छिड़कें। इसके बाद, दीपक प्रज्वलित करके उसे शनिदेव की प्रतिमा के सामने रखें और शनि महाराज के स्वरूप का ध्यान करते हुए प्रतिमा के समझ पुष्प, चंदन, बेलपत्र आदि अर्पित करें। इसके बाद, विधिपूर्वक कुशा की पवित्री को धारण करें और माथे पर चंदन का तिलक लगाएं। तिलक को लगाते समय इस मंत्र का जप जरूर करें-
'ओम चन्दनस्य महत्व पुण्यं पवित्र पाप नाशनम् । आपदं हरते नित्यं शनि देवः रितीस्थ सर्वदा।'
तिलक के बाग शनिदेव का आह्वान इस मंत्र के साथ करें-
आह्वान मंत्र
'अष्टम्या रेवती समंविताया सौराष्ट्र जातं कश्यप गोत्रं लोहवर्ण धनुराकृतिं मण्डलात्पश्चिमाशास्थं पश्चिमाभिमुखं गृधवाहन संकर जातिं यमाधि दैवतं प्रजापति प्रत्यधि देवतं शनिमावाहयाम। ओम भूभुर्वः स्वः शनैः इहागच्छ इहातिष्ठ इमं यज्ञमभिरक्ष।'
विनियोग मंत्र
शनिदेव का आह्वान करने के बाद संकल्प आदि करके इस मंत्र का जप करते हुए विनियोग करें-
'ओम शन्नों देवी रिति मंत्रस्य दध्यंडाथर्वण ऋषिः गायत्री छन्दः शनिर्देवता आपो बीजं वर्तमान इति शक्तिः शनैश्चर प्रीत्यर्थे जपे विनियोगः।'
ऋष्यादिन्यास
विनियोग के बाद ऋष्यादिन्यास इस विधि से करें।
'ओम दध्यंडाथर्वण ऋषये नमः।'- शिरसि (सिर का स्पर्श करें)
'ओम गायत्री छन्दसे नमः।'- मुखे (मुख का स्पर्श करें)
'ओम शनैश्चर देवतायै नमः।'- हृदय (हृदय का स्पर्श करें)
'ओम आपोबीजाय नमः।'- गुह्य (गुह्य भाग का स्पर्श करें)
'ओम वर्तमान शक्तयै नमः।'- पादयोः (दोनों पैरों का स्पर्श करें)
करन्यास
'ओम शन्नोदेवी रित्यं गुष्ठाभ्यां नमः।' एक हाथ के अंगूठे से दूसरे अंगूठे का स्पर्श करें।
'ओम अभिष्टये तर्जनीभयां नमः।' दोनों तर्जनी उंगलियों का स्पर्श करें।
'ओम आपो भवन्तु मध्यमाभ्यां नमः।' दोनों मध्यमा उंगली का एक दूसरे से स्पर्श करें।
'ओम पीतये अनामिकाभ्यां नमः।' .
'ओम शंय्योरिति कनिष्ठिकाभ्यां नमः।' कनिष्ठिका उंगली का एक दूसरे से स्पर्श करें।
'ओम अभिस्त्रवन्तु नः करतल कर पृष्ठाभ्यां नमः।' दोनों हाथ का पृष्ठ भाग आपस में जोड़ें।
हृदयादिन्यास
करन्यास करने के बाद हृदयादिन्यास करें-
'ओम शन्नोदेवी रिति हृदयाय नमः।'- हृदय का स्पर्श करें।
'ओम अभिष्ठये शिरसे स्वाहा।'- सिर का स्पर्श करें।
'ओम आपोभवन्तु शिखायै वषट्।'- शिखा का स्पर्श करें।
'ओम पीतये कवचाय हुम्, ओम शंय्यो रिति नेत्र त्रयाय वौषट्।'- दोनों नेत्रों को स्पर्श
'ओम अभिस्त्रवन्तु नः अस्त्राय फट्।'- सीने का स्पर्श करें
शनिदेव ध्यान मंत्र
'नीलद्युतिः शूलधरः किरीटी गृध स्थितस्त्रास करो धनुष्मान ।
चतुर्भुजः सूर्यसुतः प्रशान्तः सदाऽसतु मह्यं वरदो महात्मा।'
अथार्त- जिन्होंने शरीर पर नीले वस्त्र, सिर पर मुकुट, हाथों में धनुष और शूल धारण किया हुआ है, जो गृध्र (गिद्ध) पर विराजमान हैं। वे चार भुजाधारी (चतुर्भुज) महात्मा (शनिदेव) हमारे लिए शांत और शुभवर प्रदायक हों।
ध्यान के बाद वैदिक मंत्रों का पाठ करते हुए शनिदेव को आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान जल, शुध्दोदक स्नान, वस्त्र, यज्ञोपवीत, चंदन लेपन, पुष्प माला , शमी के पत्ते, दूर्वा दल, धूप, दीप, नैवेद्य, पान-सुपारी आदि अर्पित करें। शनिदेव को सभी चीजें अर्पित करने के बाद शनि कवच और शनि स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। साथ ही, शनि चालीसा का पाठ और शनिदेव की आरती विधि-विधान से करें। मान्यता है कि वैदिक पूजन के लिए किसी कुशल ज्योतिषी से परामर्श अवश्य करना चाहिए। साथ ही, जहां तक संभव हो पूजन कार्य किसी विद्वान ब्राह्मण से ही कराना चाहिए।

