बिहार के दरभंगा जिले के रहने वाले चंद्रमणि कुमार ने एक सफल स्टार्टअप खड़ा कर दिया है। इसकी शुरुआत उन्होंने साल 2020 में सिर्फ 50,000 रुपये से की थी। आज इसका टर्नओवर करोड़ों में पहुंच गया है।
आखिर चंद्रमणि ने ऐसा क्या किया?
नई दिल्ली: चंद्रमणि कुमार बिहार के दरभंगा जिले से हैं। उन्होंने एग्रीकल्चर सेक्टर में सफल स्टार्टअप खड़ा करके अलग पहचान बना ली है। IIT-JEE क्रैक करने का सपना टूटने के बाद चंद्रमणि ने कृषि सेक्टर को चुना। साल 2020 में सिर्फ 50,000 रुपये की मामूली रकम से उन्होंने प्रियांशु जैन के साथ इस स्टार्टअप की नींव रखी थी। प्रियांशु बाद में ऑस्ट्रेलिया चले गए। इस स्टार्टअप का नाम एग्रीजॉय (AgriJoy) है। इसका हेड ऑफिस देहरादून में है। यह खेती से जुड़ी सेटअप सेवाएं देता है। इसमें पॉलीहाउस और हाइड्रोपोनिक फार्म बनाना शामिल है। इसके साथ ही, यह ट्रेनिंग, सहायता और पैदावार बेचने में भी मदद करता है। इसका मिशन खेती की अनिश्चितता को दूर करना है। इसने तेजी से तरक्की की है। वित्त वर्ष 2025-26 तक स्टार्टअप का रेवेन्यू बढ़कर 8 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। आइए, यहां चंद्रमणि कुमार की सफलता के सफर के बारे में जानते हैं।50,000 रुपये से शुरुआत
50,000 रुपये से शुरुआत" />देश में एग्री सेक्टर हमेशा से मौसम की मार और अनिश्चितता से जूझता रहा है। इससे युवा पीढ़ी खेती से दूर होती गई। दरभंगा के मध्यमवर्गीय परिवार से आने वाले चंद्रमणि कुमार ने इस समस्या को अवसर के रूप में देखा। आईआईटी में प्रवेश न मिलने के बाद उन्होंने कृषि विज्ञान की पढ़ाई की। साल 2020 में लॉकडाउन के दौरान जब पूरी दुनिया थम गई थी, तब चंद्रमणि ने सिर्फ 50,000 रुपये के बैंक लोन से 500 वर्ग मीटर के किराए के पॉलीहाउस में अपना सफर शुरू किया। उनका टारगेट खेती को असंगठित क्षेत्र से निकालकर फायदेमंद और सस्टेनेबल बिजनेस मॉडल में बदलना था।
किसानों को ऐसे होता है फायदा
किसानों को ऐसे होता है फायदा " />चंद्रमणि का स्टार्टअप किसानों और उद्यमियों को जलवायु-अनुकूल खेती के लिए पूरी तकनीकी सहायता देता है। कंपनी हाई-टेक पॉलीहाउस और हाइड्रोपोनिक सिस्टम बनाती है। साथ ही साइट एनालिसिस, ऑटोमेशन, सरकारी सब्सिडी दिलाने में मदद और फसल की बिक्री के लिए मार्केट लिंकेज भी उपलब्ध कराती है। उनकी तकनीक की खासियत IoT (इंटरनेट ऑफ थिंग्स) बेस्ड ऑटोमेशन है। इसे भारत सरकार के 'भाषिनी' ऐप के साथ जोड़ा गया है। इससे एक अकुशल मजदूर भी सिर्फ वॉयस कमांड देकर सिंचाई और जलवायु नियंत्रण जैसे जटिल कामों को आसानी से कर सकता है।
अब करोड़ों का हो गया है बिजनेस
अब करोड़ों का हो गया है बिजनेस" />शुरुआती दिनों में समाज और परिवार को चंद्रमणि के आइडिया पर कुछ खास भरोसा नहीं था। बिहार जैसे राज्य में सरकारी नौकरी को ही सफलता का पैमाना माना जाता है। हालांकि, चंद्रमणि ने हार नहीं मानी। उन्हें पहली बड़ी सफलता अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में मिली। वहां सुनामी के बाद खारी हो चुकी मिट्टी में उन्होंने सफल फार्म सेटअप किया। आज स्टार्टअप भारत में 42 से अधिक सफल प्रोजेक्ट्स पूरे कर चुका है। युगांडा और मालदीव जैसे देशों में भी अपनी सेवाएं दे रहा है। कंपनी ने वित्त वर्ष 2024-25 में 8 करोड़ रुपये का रेवेन्यू दर्ज किया है। अगले साल इसे 35-40 करोड़ रुपये तक ले जाने का टारगेट है।
बड़ा है आगे का प्लान
बड़ा है आगे का प्लान" />चंद्रमणि का मकसद इस तकनीक को सिर्फ बड़े इन्वेस्टर्स तक सीमित न रखकर छोटे सीमांत किसानों तक पहुंचाना है। इसके लिए वह सरकार के साथ मिलकर क्लस्टर डेवलपमेंट प्रोग्राम और किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) के जरिए काम कर रहे हैं। वह ऐसी विदेशी तकनीक को भारतीय परिस्थितियों के अनुसार ढाल रहे हैं जो कम बिजली और कम लागत में काम कर सके। आने वाले समय में स्टार्टअप बायोफ्यूल और ग्रीन एनर्जी के क्षेत्र में भी कदम रखने की तैयारी में जुटा है। इसका मकसद कृषि क्षेत्र को पूरी तरह से आत्मनिर्भर और आधुनिक बनाना है।

