अब यहां बाघों के लिए और बेहतर हैबिटेट (प्राकृत वास) तैयार किया जा रहा है।
बेहतर प्राकृत वास
महाराजगंज जिले में सोहगीबरवा वन्यजीव प्रभाग 48,820 हेक्टेअर क्षेत्रफल में फैला है। यहां मुख्यतौर पर बेंत का जंगल है। इसके साथ ही ग्रासलैंड भी हैं। वहां से होकर नारायणी नदी भी बहती है। यह बिहार के वाल्मीकि टाइगर रिजर्व और नेपाल के चितवन टाइगर रिजर्व से जुड़ता है। फिलहाल यह नीलगाय, हिरन, जंगली सुअर, खरगोश, भैंस और अन्य छोटे वन्य जीवों का ठिकाना है।कैमरे में ट्रैप हुए बाघ
बाघों के प्रवास की संभावनाएं तलाशने के लिए अप्रैल 2025 में खीरी से लाई गई एक बाघिन और एक शावक को यहां छोड़ा गया था। कुछ दिन बाद ही एक शावक और छोड़ा गया था। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) की अनुमति से यह बाघ यहां छोड़े गए। साथ ही बिहार के वाल्मीकि टाइगर रिजर्व से भी एक बाघ को लाकर यहां छोड़ा गया था। ये सभी बाघ यहां सुरक्षित हैं और शिकार कर रहे हैं। हाल ही में भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) ने बाघ गणना के दौरान इसकी पुष्टि की है। ये सभी बाघ कैमरों में ट्रैप किए गए हैं। जानकारों का कहना है कि यहां उनको भोजन के लिए छोटे वन्यजीव उपलब्ध हैं। वहीं, पीने का पानी भी उपलब्ध है।ग्रासलैंड विस्तार की कवायद
इस बारे में सोहगीबरवा वन्यजीव प्रभाग के डीएफओ सुरवे निरजन कहते है कि बाघों के लिए यहां बेहतर हैबिटेट है। यहां एनटीसीए की अनुमति से छोड़े गए सभी बाघ सुरक्षित माहौल में विचरण कर रहे है। हाल ही में WII ने भी इसकी पुष्टि की है। वहीं प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) अनुराधा वेमुरी ने बताया कि बाघों के लिए प्राकृत वास के विस्तार की भी कोशिश की जा रही है। खासतौर से ग्रासलैंड का विस्तार किया जा रहा है। इससे छोटे वन्य जीव बढ़ेंगे तो बाघों के लिए भी हैबिटेट और बेहतर होगा।