रिपोर्ट में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य, पोषण, टीकाकरण और महिलाओं के सशक्तिकरण से जुड़े कई अहम संकेतकों में सुधार दर्ज किया गया है। हालांकि मोटापा, शुगर जैसी लाइफस्टाइल बीमारियों के बढ़ते मामले चिंता का कारण बने हुए हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक देश में संस्थागत प्रसव बढ़कर 90.6% हो गया है। यानी अब ज्यादा महिलाएं अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्रों में बच्चों को जन्म दे रही हैं। वहीं बच्चों का पूर्ण टीकाकरण कवरेज बढ़कर 87.1% पहुंच गया है। सर्वे में बच्चों के पोषण स्तर में सुधार दिखा है। पांच साल से कम उम्र के बच्चों में उम्र के हिसाब से कम लंबाई यानी स्टंटिंग घटकर 29.3% रह गई है। गंभीर दुबलापन यानी वेस्टिंग भी घटकर 5.2% हो गया। कम वजन वाले बच्चों के आंकड़ों में भी हल्की गिरावट दर्ज की गई है।गर्भवती महिलाओं को एंटीनटल केयर मिलने का प्रतिशत बढ़कर 95.9% हो गया है। पहली तिमाही में जांच कराने वाली महिलाओं की संख्या भी बढ़ी है। जन्म के दो दिन के भीतर नवजात की जांच कराने का प्रतिशत 85.3% तक पहुंच गया है। आयरन और फोलिक एसिड की गोलियां लेने वाली महिलाओं की संख्या में भी सुधार दर्ज किया गया।देश की कुल प्रजनन दर 2.0 पर स्थिर बनी हुई है। गर्भनिरोधक उपयोग दर बढ़कर 69.1% हो गई है। रिपोर्ट के अनुसार परिवार नियोजन सेवाओं की पहुंच पहले से बेहतर हुई है।रिपोर्ट में बताया गया है कि स्वास्थ्य बीमा या हेल्थ फाइनेंसिंग स्कीम का कवरेज 41% से बढ़कर 60.2% हो गया है। सरकार का कहना है कि आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं से गरीब और कमजोर वर्गों को इलाज की सुविधा मिली है।इंटरनेट इस्तेमाल करने वाली महिलाओं की संख्या लगभग दोगुनी होकर 64.3% पहुंच गई है। खुद इस्तेमाल करने वाले बैंक खाते रखने वाली महिलाओं का प्रतिशत 89% हो गया है। मोबाइल फोन इस्तेमाल करने वाली महिलाओं की संख्या में भी इजाफा हुआ है। खुद अपना मोबाइल फोन इस्तेमाल करने वाली महिलाओं की संख्या 53.9 से 63.6 फीसदी हो गई है।रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि बदलती जीवनशैली की वजह से मोटापा, डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर के मामलों में इजाफा हुआ है। विशेषज्ञ इसे आने वाले समय की बड़ी स्वास्थ्य चुनौती मान रहे हैं।