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भारत के किस समाज में एक से ज्यादा पति या पत्नी की प्रथा! तो कहां गलत सोच रहे आप?

भारत के किस समाज में एक से ज्यादा पति या पत्नी की प्रथा! तो कहां गलत सोच रहे आप?

भारत में जब भी एक से ज्यादा शादी यानी बहुविवाह (Polygamy) की बात होती है, तो अक्सर एक खास समुदाय पर उंगली उठती है. लेकिन क्या आंकड़े वाकई यही कहानी बयान करते हैं? राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) के ताजा आंकड़े इस गलतफहमी को तोड़ देते हैं.

इस स्टोरी में हम जानेंगे कि भारत में एक से ज्यादा पत्नी या पति रखने की प्रथा किन समाजों में सबसे ज्यादा है, इसके पीछे क्या वजहें हैं और कैसे यह प्रथा तेज़ी से घट रही है...

भारत में बहुविवाह कितना है?

NFHS-5 (2019-21) के मुताबिक, भारत में बहुविवाह का राष्ट्रीय औसत सिर्फ 1.4% है. मतलब 100 में से सिर्फ 1.4 महिलाएं ऐसी हैं जिनके पति की एक से ज्यादा पत्नियां हैं. सबसे दिलचस्प बात है कि यह आंकड़ा लगातार घट रहा है. 2005-06 में यह 1.9% था, यानी 15 सालों में 26% से ज्यादा की गिरावट आई है. बहुविवाह भारत में बहुत कम है और तेजी से खत्म हो रहा है.

किस धर्म में सबसे ज्यादा बहुविवाह?

आमतौर पर लोग मानते हैं कि मुसलमानों में बहुविवाह सबसे ज्यादा है. लेकिन NFHS-5 के आंकड़े कुछ और ही कहते हैं. धर्म के हिसाब से आंकड़े देखें तो:

  • 'अन्य धर्म' (बौद्ध, जैन, सिख, आदिवासी धर्म): 2.5%
  • ईसाई: 2.1%
  • मुस्लिम: 1.9%
  • हिंदू: 1.3%

यानी मुसलमान बहुविवाह में काफी नीचे है. इसकी वजह पूर्वोत्तर राज्य मेघालय और मिजोरम जैसे राज्यों में जनजातीय परंपराएं हैं और वहां ईसाई आबादी भी ज्यादा है. इस वजह से ईसाइयों का आंकड़ा ज्यादा आता है...

जाति के हिसाब से क्या कहते हैं आंकड़े?

यहां भी एक बड़ा खुलासा होता है. अगर हम जाति के हिसाब से देखें, तो:

  • अनुसूचित जनजाति (ST): 2.4%
  • अनुसूचित जाति (SC): 1.5%
  • OBC: 1.3%
  • सामान्य वर्ग: 1.1%

अनुसूचित जनजातियों में बहुविवाह सबसे ज्यादा है. तो बहुविवाह का आधार धर्म नहीं, बल्कि जनजातीय पहचान ज्यादा है.

किन राज्यों में सबसे ज्यादा बहुविवाह?

अगर राज्यों की बात करें, तो पूर्वोत्तर राज्य सबसे आगे हैं:

  • मेघालय: 6.1%
  • मिजोरम: 4.1%
  • असम: 2.4%
  • त्रिपुरा: 2.0%

पूर्वोत्तर में बहुविवाह ज्यादा है और इसकी वजह जनजातीय परंपराएं हैं. वहीं, जिला स्तर पर सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा मेघालय के पूर्वी जैंतिया हिल्स का है, जहां 20% महिलाएं बहुविवाह में हैं. यानी हर पांच में से एक महिला के एक से ज्यादा पति हैं.

छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु में हिंदुओं में बहुविवाह मुसलमानों से ज्यादा है. बहुविवाह को सिर्फ धर्म से नहीं जोड़ा जा सकता, क्योंकि कुछ राज्यों में हिंदू भी मुसलमानों से आगे हैं.

जब धर्म कारण नहीं, तो बहुविवाह क्यों होता है?

अगर कोई सोचता है कि इसका कारण सिर्फ धर्म है, तो वह गलत है. NFHS डेटा और एक्सपर्ट्स के मुताबिक, असली कारण ये हैं:

  • गरीबी: बहुविवाह सबसे गरीब महिलाओं में सबसे ज्यादा पाया जाता है. यानी आर्थिक तंगी में लोग दूसरी शादी कर लेते हैं.
  • शिक्षा की कमी: जिन महिलाओं ने कभी स्कूल नहीं देखा, उनमें बहुविवाह ज्यादा है. जैसे-जैसे शिक्षा बढ़ी, बहुविवाह घटा.
  • ग्रामीण इलाके: शहरों की तुलना में गांवों में बहुविवाह ज्यादा है.
  • बांझपन: NFHS-5 के मुताबिक, 20-39 साल की 2.3% महिलाएं प्राथमिक बांझपन और 9.7% द्वितीयक बांझपन का सामना करती हैं. बांझपन के कारण भी कई बार दूसरी शादी कर ली जाती है.
  • क्षेत्रीय परंपराएं: पूर्वोत्तर, दक्षिण भारत और पूर्वी राज्यों में जनजातीय परंपराओं की वजह से बहुविवाह ज्यादा है.
  • उम्र: 35 साल से ज्यादा उम्र की महिलाओं में बहुविवाह ज्यादा है, जो दिखाता है कि यह प्रथा पुरानी पीढ़ी में ज्यादा थी और अब खत्म हो रही है.

बहुपतित्व: जब एक महिला के कई पति हों

बहुविवाह के मुकाबले बहुपतित्व (एक महिला के कई पति) बहुत कम और सीमित है. यह मुख्य रूप से हिमालयी इलाकों की कुछ जनजातियों में मिलता है.

सबसे मशहूर उदाहरण है हिमाचल प्रदेश की हाटी जनजाति. यहां 'जोड़ीदारा' नाम की प्रथा है. एक महिला की शादी दो या ज्यादा भाइयों से कर दी जाती है. इसे 'भ्रातृ बहुपतित्व' कहते हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह है जमीन को बंटने से बचाने के लिए. दरअसल पहाड़ी इलाकों में जमीन बहुत कम होती है. अगर चार भाई चार अलग-अलग शादियां करें तो जमीन बंट जाती है और कोई ठीक से गुजारा नहीं कर पाता. 'जोड़ीदारा' से जमीन एक साथ रहती है और परिवार एकजुट रहता है.

स्थानीय लोग इसे 'पांडव विवाह' भी कहते हैं, क्योंकि महाभारत में पांचों पांडवों की एक ही पत्नी द्रौपदी थी. लेकिन यह प्रथा भी तेजी से खत्म हो रही है. पिछले 25 सालों में इस तरह की 50 से भी कम शादियां हुई हैं. इसके अलावा तोदा जनजाति (नीलगिरी, तमिलनाडु), जौनसारी (उत्तराखंड), कोटा (नीलगिरी), किन्नौर और लाहौल-स्पीति के कुछ इलाकों में भी यह प्रथा मशहूर है.

बहुविवाह या बहुपतित्व पर कानून क्या कहता है?

  • हिंदू, बौद्ध, जैन, सिख: हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत बहुविवाह पूरी तरह अवैध है. दूसरी शादी शून्य है और IPC की धारा 494 के तहत सजा भी हो सकती है.
  • ईसाई: भारतीय ईसाई विवाह अधिनियम, 1872 के तहत बहुविवाह प्रतिबंधित है.
  • पारसी: पारसी विवाह और तलाक अधिनियम, 1936 के तहत सिर्फ एक विवाह की अनुमति.
  • मुस्लिम: मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत एक मुस्लिम पुरुष अधिकतम चार पत्नियां रख सकता है, बशर्ते वह सभी के साथ न्याय कर सके.
  • जनजातियां: छठी अनुसूची के तहत आने वाले जनजातीय क्षेत्रों को बहुविवाह कानूनों से छूट है.

31 जुलाई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने मुसलमानों में बहुविवाह पर प्रतिबंध लगाने की याचिका पर केंद्र से जवाब मांगा है. याचिका का कहना है कि बहुविवाह समानता और गैर-भेदभाव के अधिकारों के खिलाफ है. साथ ही, असम सरकार ने असम बहुविवाह निषेध विधेयक, 2025 पारित किया है, जो बहुविवाह को 7 साल तक की कैद और जुर्माने से दंडनीय बनाता है.

तो यह डेटा क्या कहानी बताता है?

इस पूरे सिनेरियो को सामने रखें तो 6 बड़ी बातें पता चलती हैं:

  1. भारत में बहुविवाह सिर्फ 1.4% है, यानी बहुत कम और तेजी से घट रहा है. 15 सालों में 26% से ज्यादा की गिरावट आ चुकी है.
  2. सबसे ज्यादा बहुविवाह ईसाइयों (2.1%) और 'अन्य धर्मों' (2.5%) में है, जबकि मुसलमान (1.9%) चौथे नंबर पर हैं. यानी, आम धारणा के विपरीत, मुसलमानों में बहुविवाह सबसे ज्यादा नहीं है.
  3. जाति के हिसाब से देखें तो अनुसूचित जनजातियों (2.4%) में बहुविवाह सबसे ज्यादा है, यानी जनजातीय समुदाय सबसे आगे हैं.
  4. पूर्वोत्तर राज्य में खासकर मेघालय (6.1%) में बहुविवाह सबसे ज्यादा है और इसकी वजह जनजातीय परंपराएं हैं.
  5. बहुविवाह का असली कारण धर्म नहीं, बल्कि गरीबी, शिक्षा की कमी, ग्रामीण इलाके और जनजातीय परंपराएं हैं.
  6. बहुपतित्व (एक महिला के कई पति) बहुत कम है. यह मुख्य रूप से हिमालयी जनजातियों में जमीन बचाने के लिए किया जाता है. यह भी तेजी से खत्म हो रहा है.

तो अगली बार जब बहुविवाह की बात हो, तो याद रखें आंकड़े वह कहानी नहीं बताते जो आमतौर पर सुनी जाती है. यह कहानी जनजातियों, गरीबी और शिक्षा की कमी की है, न कि किसी एक धर्म की. सबसे अच्छी बात ये है कि यह प्रथा तेजी से खत्म हो रही है, जो यह दिखाता है कि जैसे-जैसे समाज बदल रहा है, पुरानी परंपराएं भी बदल रही हैं.

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