पंचांग गणना के अनुसार, इस वर्ष 'अंगारकी चतुर्थी' का अद्भुत महासंयोग एक या दो नहीं, बल्कि पूरे तीन बार बन रहा है। यह खगोलीय और आध्यात्मिक घटना उन श्रद्धालुओं के लिए किसी वरदान से कम नहीं है जो विघ्नहर्ता गणेश और मंगल देव की उपासना के माध्यम से जीवन के कष्टों को दूर करना चाहते हैं।
भारतीय पंचांग में चतुर्थी तिथि भगवान गणेश को समर्पित है, लेकिन जब कृष्ण पक्ष की 'संकष्टी चतुर्थी' मंगलवार (Tuesday) के दिन पड़ती है, तो उसे 'अंगारकी चतुर्थी' कहा जाता है। शास्त्रों में इस संयोग को अत्यंत प्रभावशाली माना गया है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मंगल देव (अंगारक) ने भगवान गणेश की कठोर तपस्या की थी। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर गणेश जी ने उन्हें वरदान दिया था कि जो भी चतुर्थी मंगलवार के दिन आएगी, वह 'अंगारकी चतुर्थी' कहलाएगी और इस दिन किया गया व्रत पूरे वर्ष की सभी संकष्टी चतुर्थियों के व्रत के बराबर पुण्य प्रदान करेगा।
ज्योतिषीय गणनाओं के मुताबिक, वर्ष 2026 में भक्तों को इस विशेष पर्व को मनाने का तीन बार अवसर प्राप्त होगा। यह तिथियां न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि ग्रह दोष निवारण के लिए भी सटीक मानी जा रही हैं:
- वर्ष की शुरुआत में ही यह शुभ संयोग बन रहा है।
- ग्रीष्म काल में पड़ने वाली यह चतुर्थी विशेष फलदायी होगी।
- वर्ष के उत्तरार्ध में यह अंतिम अंगारकी योग होगा।
धर्म गुरुओं और ज्योतिषाचार्यों का कहना है कि अंगारकी चतुर्थी का व्रत केवल सामान्य पूजा नहीं है, बल्कि यह विशिष्ट समस्याओं के समाधान का काल है।
- वर्तमान समय में कई लोग आर्थिक बोझ और कर्ज (Debt) की समस्या से जूझ रहे हैं। मान्यता है कि इस दिन "ऋणहर्ता गणेश स्तोत्र" का पाठ करने और गणेश जी को लाल फूल अर्पित करने से पुराने से पुराने कर्ज से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
- जिन जातकों की कुंडली में विवाह में विलंब हो रहा है या मंगल दोष की समस्या है, उनके लिए यह व्रत संजीवनी के समान है। मंगल देव और गणेश जी की संयुक्त पूजा से विवाह और दांपत्य जीवन की बाधाएं दूर होती हैं।
- कोर्ट-कचहरी के विवादों और शत्रुओं के भय को समाप्त करने के लिए भी इस दिन विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं।
एक व्रत, साल भर का पुण्य इस संयोग की सबसे बड़ी विशेषता इसकी 'फल श्रुति' है। धर्मग्रंथों के अनुसार, जो भक्त पूरे वर्ष चतुर्थी का व्रत नहीं कर पाते, वे यदि केवल अंगारकी चतुर्थी का व्रत विधि-विधान से करें, तो उन्हें साल भर की 24 चतुर्थियों के बराबर पुण्य प्राप्त होता है। यह व्रत संतान की लंबी आयु और विद्यार्थियों की एकाग्रता बढ़ाने के लिए भी सिद्ध माना गया है।
पूजा का विधान इस पर्व पर सूर्योदय से लेकर चंद्रोदय तक उपवास रखा जाता है। शाम को चंद्रमा के उदय होने पर उन्हें अर्घ्य देने के बाद ही व्रत का पारण किया जाता है। पूजा में गुड़ और तिल का भोग लगाना विशेष रूप से शुभ माना गया है, जो न केवल स्वास्थ्य के लिए हितकर है बल्कि ग्रहों की शांति में भी सहायक है।
वर्ष 2026 में तीन बार आने वाला यह संयोग निश्चित रूप से आध्यात्मिक चेतना और संकट निवारण का एक स्वर्णिम अवसर है, जिसका लाभ उठाने के लिए भक्त अभी से तैयारियों में जुट गए हैं।

