Dailyhunt Logo
  • Light mode
    Follow system
    Dark mode
    • Play Story
    • App Story
नरक के 3 द्वार कौन से हैं? जिससे आत्मा' का भी हो जाता है विनाश, श्रीमद्भगवद्गीता' में है जिक्र'

नरक के 3 द्वार कौन से हैं? जिससे आत्मा' का भी हो जाता है विनाश, श्रीमद्भगवद्गीता' में है जिक्र'

ध्यात्मिक विचारक और श्रीमद्भगवद्गीता के विद्वान प्रशांत मुकुंद दास से विशेष बातचीत में गीता में वर्णित नरक के तीन द्वार की गहन व्याख्या सामने आई. भारत जब अपनी कठिन संघर्ष से मिली राजनीतिक स्वतंत्रता का उत्सव मना रहा है, दास इस बात पर जोर देते हैं कि असली आवश्यकता है आंतरिक स्वतंत्रता की, ऐसी आज़ादी जो काम, क्रोध और लोभ जैसे आंतरिक बंधनों से मुक्ति दिलाए.

प्राचीन शास्त्रों की शिक्षाओं का हवाला देते हुए वे बताते हैं कि ये तीन दोष न केवल मानसिक शांति को नष्ट करते हैं, बल्कि आत्मा के पतन का कारण भी बनते हैं. आज के युवाओं के लिए उनका संदेश स्पष्ट है राष्ट्रीय स्वतंत्रता के साथ-साथ आध्यात्मिक स्वतंत्रता भी उतनी ही ज़रूरी है.

चुनौती बाहरी शत्रु नहीं, बल्कि भीतरी शत्रु हैं. ये हैं-काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर. ये छह शत्रु मन को चुपके से बांध लेते हैं, जिसके कारण व्यक्ति भौतिक सुख-सुविधाओं के बावजूद असंतोष, चिंता और तनाव का शिकार हो जाता है. प्रशांत मुकुंद दास कहते हैं, आज के युवा चिंता, अवसाद और आत्मघाती विचारों से जूझ रहे हैं राष्ट्रीय स्वतंत्रता के बाद भी, जीवन की कठिनाइयों से लड़ने के लिए आध्यात्मिक ज्ञान की आवश्यकता है

श्रीमद्भगवद्गीता के 16वें अध्याय के 21वें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण स्पष्ट रूप से कहते हैं

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।

कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्॥

अर्थात - तीन ऐसे द्वार हैं जो नरक की ओर ले जाते हैं और आत्मा का भी विनाश करते हैं.

काम (अनियंत्रित इच्छाएँ) जब इच्छाएँ नियंत्रण से बाहर हो जाती हैं, तो व्यक्ति सही-गलत की परवाह किए बिना उन्हें पूरा करने में लग जाता है. यह लालच, धोखा, और अंतहीन असंतोष की ओर ले जाता है.

क्रोध (ग़ुस्सा) क्रोध मन की शांति को नष्ट करता है और निर्णय क्षमता को धूमिल कर देता है. यह रिश्तों को तोड़ता है और हिंसा तथा पछतावे की स्थिति पैदा करता है.

लोभ (अत्यधिक लालच) लोभ व्यक्ति को कभी संतुष्ट नहीं होने देता. जितना अधिक मिलता है, उतनी ही और चाहत बढ़ती है, और यह मानसिक तनाव व नैतिक पतन का कारण बनता है.

प्रशांत मुकुंद दास कहते हैं, इन तीनों से बचना ही सच्ची मुक्ति का पहला कदम है. काम, क्रोध और लोभ मनुष्य को न केवल नरक की ओर ले जाते हैं, बल्कि आत्मा को भी बंधनों में जकड़ देते हैं

प्रशांत जी आगे बताते हैं कि माया के तीन गुण सत्त्व, रजस और तमस, हमारी सोच और कर्मों को प्रभावित करते हैं. श्रीमद्भगवद्गीता के 14वें अध्याय के 5वें श्लोक में भगवान कहते हैं.

सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृति-संभवाः।

निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्॥

अर्थात, सत्त्व (ज्ञान), रजस (उत्साह और भोग की इच्छा) और तमस (अज्ञान) ये तीनों गुण प्रकृति से उत्पन्न होते हैं और अविनाशी आत्मा को देह के साथ बांधते हैं. प्रशांत जी कहते हैं, ये गुण आत्मा को जन्म-मृत्यु के चक्र में फंसाए रखते हैं. तमोगुण अज्ञान को बढ़ाता है, रजोगुण भौतिक सुखों की लालसा को प्रज्वलित करता है, और सत्त्वगुण ज्ञान की ओर ले जाता है. लेकिन सच्ची मुक्ति तब मिलती है, जब हम इन तीनों गुणों को पार कर जाते हैं

प्रशांत मुकुंद दास का मानना है कि आज का युवा तभी सच्ची स्वतंत्रता प्राप्त कर सकता है, जब वह आध्यात्मिक मार्ग अपनाएं. सत्संग, साधना और गीता जैसे ग्रंथों का अध्ययन हमें उन बंधनों से मुक्त कर सकता है, जो चिंता, तनाव और अवसाद के रूप में हमें जकड़ते हैं, आध्यात्मिक ज्ञान न केवल मन को शांति देता है, बल्कि आत्मा को सच्चे आनंद की अनुभूति कराता है.

प्रशांत जी युवाओं से आह्वान करते हैं कि वे राष्ट्रीय स्वतंत्रता के साथ-साथ आंतरिक स्वतंत्रता को भी महत्व दें. जब हम राष्ट्रीय ध्वज को गर्व से लहराते हैं, तो यह संकल्प भी लें कि हम अपनी आत्मा को अज्ञान, मोह और पीड़ा से मुक्त करेंगे. सच्ची आजादी तब है, जब हम न केवल बाहरी बंधनों से, बल्कि आंतरिक जंजीरों से भी मुक्त हों प्रशांत मुकुंद दास कहते हैं, आइए, इस स्वतंत्रता दिवस पर हम केवल बाहरी आजादी का उत्सव न मनाएं, बल्कि अपनी आत्मा को भी मुक्त करने का संकल्प लें.

Dailyhunt
Disclaimer: This content has not been generated, created or edited by Dailyhunt. Publisher: News Himachali Hindi