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उत्तराखंड में ब्रेस्ट कैंसर के खिलाफ तकनीक का सहारा, AI से हो रही शुरुआती पहचान'

उत्तराखंड में ब्रेस्ट कैंसर के खिलाफ तकनीक का सहारा, AI से हो रही शुरुआती पहचान'

हाड़ की खामोश वादियों में चुपचाप पांव पसारती ब्रेस्ट कैंसर की गंभीर बीमारी अब उत्तराखंड के सामने एक नई चुनौती बनकर खड़ी है।

पहाड़ों की दूरी और अनकही पीड़ा की यह खाई कई जिंदगियों को चुपचाप छीन लेती है।

ब्रेस्ट कैंसर के खतरे के बीच अर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित मशीन आइ ब्रेस्ट ने उम्मीद जगाई है।

यह मशीन पहाड़ों पर ब्रेस्ट कैंसर को रोकने के लिए उम्मीद की किरण बनकर आई है, जो समय रहते मरीजों को पहचानकर उपचार दिलाने का काम कर रही है।

स्वास्थ्य विभाग ने एआइ आधारित आई ब्रेस्ट स्क्रीनिंग मशीनों के जरिए प्रदेशभर में विशेष जांच अभियान शुरू किया है। करीब 15 लाख रुपये की लागत वाली इन मशीनों की मदद से शुरुआती स्तर पर ही ब्रेस्ट कैंसर की पहचान संभव हो रही है।

फिलहाल तीन मशीनें विभिन्न जिलों में तैनात की गई हैं, जबकि जल्द ही अन्य मशीनें भी मंगाने की तैयारी है। ये मशीन सेंसर के जरिए ब्रेस्ट टिश्यू की कठोरता मापती है, क्योंकि कैंसरग्रस्त गांठ सामान्य ऊतक की तुलना में अधिक सख्त होती है।

यह डेटा एआइ के जरिए तुरंत विश्लेषित होकर रंगीन मैप के रूप में सामने आता है, इससे संदिग्ध हिस्सों की पहचान हो जाती है। पूरी जांच प्रक्रिया पांच से 10 मिनट में पूरी हो जाती है और इसमें न दर्द होता है, न रेडिएशन का कोई खतरा रहता है।

उत्तराखंड में ब्रेस्ट कैंसर के बढ़ते मामलों ने चिंता बढ़ा दी है। वर्ष 2025 में उत्तराखंड में ब्रेस्ट कैंसर के 1602 नए मामले सामने आने की जानकारी है। अभी भी ब्रेस्ट कैंसर की स्क्रीनिंग दर महज 0.4 प्रतिशत है, जो कि राष्ट्रीय औसत से काफी कम है। यही कारण है कि बड़ी संख्या में मरीज तब सामने आते हैं, जब कैंसर पांव पसार चुका होता है।

पहाड़ी जिलों पौड़ी, टिहरी, चमोली और पिथौरागढ़ में यह समस्या और गंभीर है, जहां स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच आज भी चुनौती बनी हुई है। ऐसे में एआइ आधारित यह पोर्टेबल मशीन गांव-गांव पहुंचकर महिलाओं को उनके जांच की सुविधा उपलब्ध करा रही है। मोबाइल हेल्थ कैंप के माध्यम से स्क्रीनिंग दायरे को बढ़ाने की योजना है।

राज्य में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित आइ ब्रेस्ट डिवाइस के जरिये शुरुआती स्तर पर ब्रेस्ट कैंसर के मामलों को चिह्नित किया जा रहा है। दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में यह तकनीक बेहद प्रभावी है, इससे मरीजों की समय पर पहचान कर उन्हें उच्चस्तरीय जांच एवं उपचार के लिए रेफर किया जा रहा है।

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