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कभी पुलिस की नौकरी करते थे मशहूर शायर बशीर बद्र, Exam में उनके शेर का अर्थ उनसे ही पूछा गया और एग्जामिनर ने उत्तर को गलत बता दिया

कभी पुलिस की नौकरी करते थे मशहूर शायर बशीर बद्र, Exam में उनके शेर का अर्थ उनसे ही पूछा गया और एग्जामिनर ने उत्तर को गलत बता दिया

News Tak 4 months ago

अभी उजाला भरपूर था, लेकिन जिंदगी की शाम हो गई! मशहूर शायर बशीर बद्र अपनी यादों के उजाले छोड़कर इस जहाना-ए-फानी को अलविदा कह गए. मुहब्बत का शायर जिसने जिंदगी भर तितली, शहद, इंद्र धनुष बादल बिजली और रोशनी के अशआर पढ़े और उन्हें गजलों में पिरोया गोया कंदीलों वाली पतंगें नफरतों के आसमान पर राज कर रही हों.

बशीर साहब की जिंदगी शुरू से इत्तेफाकों से भरी रही. एक बार उनके कॉलेज के एग्जाम में उनसे एक शे'र का मतलब पूछा गया. इत्तेफाक से वो शे'र बशीर साहब का ही था. गदगद होकर जब उन्होंने उसकी तशरीह की यानी मतलब बताया तो एक्सटर्नल एग्जामिनर ने उसे गलत बताया. इस पर बशीर साहब मुस्कुराये और बोले- हुजूर! यह इसी नाचीज का कहा हुआ है. लेकिन एग्जामिनर ये मानने को कतई तैयार नहीं हुए कि ये नौजवान इतना गहरा शे'र कह सकता है.

सातवीं कक्षा में थे तब छपी थी पहली गजल

बशीर साहब को बचपन से ही लिखने का शौक था. सात साल की उम्र क्या होती है. बच्चे जब ठीक से अपनी निक्कर संभालने लायक होते हैं उस मासूम उम्र में उन्होंने अपनी पहली कविता/शेर लिखा था. जब वे सातवीं कक्षा में आए तब उनकी एक ग़ज़ल उस समय की मशहूर साहित्यिक पत्रिका 'निगार' में छपी थी.

कुछ समय तक पुलिस विभाग में भी की नौकरी

बशीर साहब ने अपनी उच्च शिक्षा के दौरान कुछ समय तक पुलिस विभाग में भी नौकरी की थी. हालांकि, साहित्य के प्रति अपने लगाव और आगे की पढ़ाई (B.A., M.A. और Ph.D.) के लिए उन्होंने 1967 में पुलिस की नौकरी का त्याग कर दिया. बाद में वे अलीगढ़ विश्वविद्यालय और मेरठ कॉलेज में उर्दू के प्रोफेसर रहे.

अपने ही लिखे 87 अशआर को थीसिस में किया शामिल

बशीर साहब ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से उन्होंने उर्दू में पीएचडी की उपाधि ली. लेकिन उसमें भी दिलचस्प वाकया यह है कि उन्होंने उर्दू साहित्य में गजल की समालोचना के क्षेत्र में अपने शोध का विषय आजादी के बाद उर्दू गजल का तनकीदी मुताला यानी स्वतंत्रता के बाद उर्दू ग़ज़ल का अलोचनात्मक अध्ययन था. इस शोध प्रबंध यानी थीसिस में उन्होंने अपने ही लिखे 87 अशआर शामिल किए.

47 साल बाद मिली पीएचडी की मूल डिग्री- देख बच्चों के तरह चहक गए

बशीर साहब ने अपनी थीसिस 1973 में जमा कर दी थी. वो पीएचडी का इम्तिहान पास भी कर गए. इसके बाद वे मुशायरों और अध्यापन में इतने मुब्तिला हो गए कि विश्वविद्यालय के कई साल दर साल कई दीक्षांत समारोह निकल गए और वो अपनी डिग्री का प्रमाणपत्र लेने नहीं आ सके. यानी अपनी मूल डिग्री लेना ही भूल गए. लगभग 46-47 साल बाद साल 2021 में उनकी पत्नी डॉ. राहत बद्र के प्रयासों और एएमयू प्रशासन की मदद से यह डिग्री डाक द्वारा उनके भोपाल स्थित घर पर भेजी गई. पीएचडी की डिग्री हाथ में पाकर वे बच्चों की तरह चहक उठे थे.

मेरठ ने बद्र साहब का घर जला दिया गया

मोहब्बत के इस शायर के हिस्से में बेशुमार शोहरत के साथ फिरकापरस्त लोगों की नफरत भी आई. मेरठ में 1987 में हुए सांप्रदायिक दंगों के दौरान, उपद्रवियों ने उनका घर भी जला दिया था. इस घटना से उनका दिल इतना टूट गया था कि उन्होंने लिखा, "लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में." आधुनिक उर्दू साहित्य में उनके अभूतपूर्व योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें 1999 में 'पद्मश्री' और साहित्य अकादमी पुरस्कार से भी नवाजा.

उनकी गजलों की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 2015 की बहुचर्चित फिल्म 'मसान' में उनके कई शेर सदियों तक सुनाई देते रहेंगे.

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