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Two Heroes: साइकिल मैकेनिक की बेटी अस्मिता पैर गंवाने वाले सोमन की जज्बे  की जीत, कॉमनवेल्थ में रचा इतिहास

Two Heroes: साइकिल मैकेनिक की बेटी अस्मिता पैर गंवाने वाले सोमन की जज्बे की जीत, कॉमनवेल्थ में रचा इतिहास

Golden Story: कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 भारत के लिए कई यादगार पल लेकर आए हैं। इन खेलों में सिर्फ मेडल ही नहीं जीते गए, बल्कि ऐसे संघर्षों की कहानियां भी सामने आईं जिन्होंने पूरे देश को भावुक कर दिया।

इनमें सबसे बड़ी कहानी जूडो खिलाड़ी अस्मिता डे की रही, जिन्होंने भारत को कॉमनवेल्थ गेम्स के इतिहास का पहला जूडो गोल्ड दिलाया। वहीं सेना में सेवा के दौरान विस्फोट में अपना पैर गंवाने वाले सोमन ने भी हार नहीं मानी और पैरा खेलों में शानदार प्रदर्शन कर देश का सिर ऊंचा किया। इन दोनों खिलाड़ियों ने साबित किया कि कठिन हालात भी मजबूत इरादों को नहीं रोक सकते।

त्रिपुरा की रहने वाली 23 वर्षीय अस्मिता डे का बचपन बेहद साधारण परिस्थितियों में बीता। उनके पिता साइकिल मैकेनिक थे और बेहद कम आमदनी में परिवार का पालन-पोषण करते थे। आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने बेटी के सपनों को कभी टूटने नहीं दिया। पिता के निधन के बाद अस्मिता पूरी तरह टूट गई थीं, लेकिन उनकी मां ने उन्हें संभाला और खेल जारी रखने के लिए प्रेरित किया। अस्मिता ने लगातार मेहनत की और ग्लासगो में महिलाओं के 48 किलोग्राम वर्ग के फाइनल में कनाडा की खिलाड़ी को हराकर इतिहास रच दिया। यह भारत का कॉमनवेल्थ गेम्स में पहला जूडो स्वर्ण पदक है।

सोमन की कहानी भी किसी प्रेरणा से कम नहीं है। सेना में सेवा के दौरान हुए विस्फोट में उन्होंने अपना एक पैर गंवा दिया था। यह हादसा किसी भी खिलाड़ी का सपना खत्म कर सकता था, लेकिन सोमन ने हार नहीं मानी। कृत्रिम पैर की मदद से उन्होंने दोबारा अभ्यास शुरू किया और पैरा खेलों में अपनी जगह बनाई। वर्षों की मेहनत और अनुशासन के दम पर उन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्स में शानदार प्रदर्शन कर पदक जीतकर देश का गौरव बढ़ाया। उनका संघर्ष हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा है जो मुश्किलों से जूझ रहा है।

इस बार कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत के कुल 38 पदक विजेताओं ने अलग-अलग खेलों में शानदार प्रदर्शन किया। किसी खिलाड़ी ने गरीबी से लड़ते हुए सफलता हासिल की, तो किसी ने चोट और असफलताओं को पीछे छोड़कर मेडल जीता। कई खिलाड़ियों ने छोटे शहरों और गांवों से निकलकर दुनिया के बड़े मंच पर भारत का तिरंगा लहराया। इन खिलाड़ियों की कहानियां बताती हैं कि प्रतिभा के साथ मेहनत, अनुशासन और परिवार का सहयोग किसी भी लक्ष्य को हासिल करने की ताकत देता है।

अस्मिता डे और सोमन जैसे खिलाड़ियों की सफलता केवल खेल उपलब्धि नहीं, बल्कि हिम्मत, धैर्य और आत्मविश्वास की मिसाल है। इन कहानियों से यह संदेश मिलता है कि हालात चाहे कितने भी कठिन क्यों न हों, अगर लक्ष्य स्पष्ट हो और मेहनत लगातार जारी रहे तो सफलता जरूर मिलती है। कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत के इन खिलाड़ियों ने आने वाली पीढ़ी को बड़े सपने देखने और उन्हें पूरा करने का विश्वास दिया है।

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