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Budget 2021: सरकार से आईटी कंपनियों की बड़ी मांग, नीति-नियमों में अपनाई जाए स्पष्टता

नई दिल्ली: इस बात पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं कि कोविड-19 महामारी की वजह से आई मंदी से निपटने के लिए बजट-2021 कितना कारगर साबित होगा। देश का तकनीकी क्षेत्र भी इस बजट को लेकर सरकार से बड़ी राहत की उम्मीदें लगाए हुए है। गौरतलब है कि दुनियाभर की तरह भारत में भी डिजिटल-मार्केट सबसे तेजी से बढ़ रहे क्षेत्रों में शुमार है। भारत में इस समय 74 करोड़ से ज्यादा लोग इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं जो कि दुनियाभर में दूसरा सबसे बड़ा आंकड़ा है। अनुमान के मुताबिक 2022 तक भारत की 60 प्रतिशत से ज्यादा आबादी इंटरनेट का इस्तेमाल कर रही होगी। माना ये भी जा रहा है कि 2025 तक भारत की डिजिटल इकोनॉमी 1 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच जाएगी।

ऐसे में उम्मीद है कि केंद्र सरकार डिजिटल मार्केट को बढ़ावा देने के लिए कुछ प्रभावशाली और रियायत देने वाली नीतियां बना सकती है। ताकि भारत में तकनीक के क्षेत्र में बेहतर से बेहतर नवाचार किए जा सकें। भारत में डिजिटल मार्केट को मजबूत बनाने के लिए डेटा सेंटर्स और क्लाउड सर्विसेज को बढ़ावा दिए जाने की जरूरत है ताकि डिजिटल इकोनॉमी तेजी से ग्रोथ कर सके। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि डेटा प्रोटेक्शन और साइबर सिक्योरिटी को सुनिश्चित करना बहुत आवश्यक है। और ऐसा विशेष कानून लागू कर के ही किया ज सकता है। साथ ही सरकार को खास तरह का ढांचा भी खड़ा करना होगा जिसमें डेटा सेंटरों को विकसित किया जाना प्रमुखता से शामिल किया जाए ताकि कनेक्टिविटी में बढ़ावा दिया जा सके।

साथ ही भारत में- आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस, मशीन लर्निंग और रोबोटिक्स आदि क्षेत्रों में शोध और विकास किए जाने की आवश्यकता है, ताकि भारत में साइंस और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में कम से कम खर्च में अधिकतम हुनर को बढ़ावा दिया जा सके और इस बढ़ी हुई क्षमता का इस्तेमाल इंडस्ट्रियल रिसर्च और साइटिंफिक रिसर्च में किया जा किया जा सके ताकि ये इकोनॉमी को बूस्ट करने का काम कर सके। इस संदर्भ में डिजिटल इंडस्ट्री की कुछ और भी खास मांगे हैं जिन्हें पूरा किया जाना जरूरी है।

- केंद्र सरकार द्वारा लागू किए गए इक्वलाइजेशन लेवी (ईक्यूएल) टैक्स से डिजिटल इंडस्ट्री से जुड़े विशेषज्ञों को शिकायत है कि ये एकतरफा नियम है। इसकी वजह से इंफोर्मेशन टेक्नोलॉजी (आईटी) और ई-कॉमर्स इंडस्ट्री सबसे ज्यादा प्रभावित हुई है। ऐसे में कुछ मुद्दों पर स्पष्टता आवश्यक है।

- भारत में डिजिटल फेसिलिटी, इलैक्ट्रॉनिक फेसिलिटी, प्लेटफॉर्म जैसी कई डिजिटल टर्म्स चलन में हैं। लेकिन कानून में इनके लिए कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं दी गई है। इसके चलते ईक्यूएल; वन-टू-वन ट्रांजेक्शन और इंट्रा ग्रुप सर्विसेज पर भी लागू हो रहे हैं। ऐसे में ईक्यूएल को लेकर जितनी स्पष्टता रखी जाएगी उतनाृी ही मदद थर्ड पार्टी के माध्यम से रेवेन्यू बढ़ाने में मिलेगी।

- भारत में जो बाहरी कंपनियां ईक्यूएल पे कर रही हैं, उनके लिए ये दोहरी मार देने वाला साबित होता है। क्योंकि ईक्यूएल अभी तक आयकर (इन्कम टैक्स) नहीं माना जाता है। इस के चलते कंपनियों को कई बार दो बार टैक्स देना पड़ जाता है। ऐसे में सुनिश्चित किया जाना जरूरी है कि ईक्यूएल को इन्कम टैक्स का ही एक हिस्सा माना जाए ताकि कंपनियों को दोहरे कर की मार से बचाया जा सके।

- सरकार ने घोषणा की है कि 1 अप्रैल 2021 से जो भी विदेशी कंपनियां भारत में फिजिकल प्रजेंस के बिना ही/ बिना मौजूद हुए अलग-अलग तरीकों से भारतीय यूजर्स से कमाई कर रही हैं और भारतीयों के डेटा को एकत्रित करने का काम कर रही हैं उन्हें सिग्निफिकेंट इकोनॉमिक प्रजेंस (एसईपी) के तहत भारत में कर का भुगतान करना होगा। लेकिन विश्लेषकों के मुताबिक एसईपी की नीतियों में भी कई स्तर पर अस्पष्टता है। ऐसे में सरकार को चाहिए कि अगले बजट में एसईपी से जुड़ी नीतियों को स्पष्ट करे और ये नीतियां स्पष्ट न हो जाएं तब तक इस फैसले को स्थगित किया जाना चाहिए।

- भारत में क्लाउड बेस्ड ट्रांजेक्शन्स (सीबीटी) को लेकर भी अस्पष्टता की स्थिति बनी हुई है। जबकि भारत में क्लाउड सर्विसिंग अभी बहुत मजबूत स्थिति में नहीं पहुंच पाई है। ऐसे में तमाम अनिश्चितताओं के चलते नॉन-रेजिडेंट सर्विस प्रोवाइडर्स पर कानूनी कार्यवाहियों खतरा मंडरा रहा है। ऐसे में सरकार को चाहिए कि सीबीटी को लेकर भी नियमों में स्पष्टता स्थापित की जाए।

- इस साल कोविड-19 महमारी की वजह से अधिकतर आईटी/आईटी इनेबल्ड सर्विस कंपनियों ने अपने कर्मचारियों के लिए वर्क फ्रॉम होम कल्चर को प्राथमिकता दी है। नतीजतन अपने काम को निर्बाध रूप से चलाए रखने के लिए कंपनियों को अपने कर्मचारियों को कई तरह अलाउंस देने पड़े थे। आईटी सेक्टर्स से जुड़े लोगों का मानना है कि सरकार किसी भी तरह इस अतिरिक्त खर्च हुई राशि को कर से मुक्त करे या किसी अन्य तरीके से इस कर में राहत दे तो यह एक स्वागत योग्य कदम होगा।

- मौजूदा दौर में किसी भी ई-कॉमर्स कंपनी को अपने व्यवसाय को बढ़ावा देने के लिए एडवरटाइजमेंट, मार्केटिंग और प्रमोशन (एएमपी) पर बड़ी राशि खर्च करना पड़ती है। लेकिन इससे होने वाले फायदे बहुत ज्यादा स्थायी नहीं होते हैं। लेकिन टैक्स अथोरिटी इसे कैपिटल (मूलधन) की तरह देखती है और इस पर कोई राहत नहीं देती है। ऐसे में एएमपी पर खर्च होने वाली राशि पर भी स्पष्ट नीति बनाकर रियायत दिए जाने की जरूरत बताई जा रही है।

- देश के दूसरे सेक्टर्स की तरह आर्थिक मंदी के दौर में आईटी कंपनियों के लिए भी पुराना लाभ कमा पाना बहुत आसान नहीं रह गया। ऐसे में ये जरूरी है कि आर्म्स लेंथ रेंज (एएलआर) की गणना में राहत दी जाए और इसके लिए किस तरह के डॉक्युमेंटेशन की आवश्यकता पड़ेगी, ये भी कंपनियों के सामने स्पष्ट तौर पर बताया जाए। ताकि इस बुरे वर्ष में हुए घाटे की भरपाई की जा सके।

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