पटना हाईकोर्ट ने अनुकंपा पर नियुक्त शिक्षकों को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद14 का हवाला देते हुए कहा कि सरकारी भेदभाव ठीक नहीं है। समान स्थिति वाले कर्मियों के साथ अलग-अलग व्यवहार नहीं किया जा सकता।
जस्टिस हरीश कुमार की एकलपीठ ने एक साथ तीन रिट याचिका पर सुनवाई के बाद अपने 29 पन्ने के आदेश में कहा कि याचिकाकर्ताओं ने अनुकंपा पर नियुक्ति के लिए 2006 के नियम लागू होने के पूर्व आवेदन दिया था। लेकिन राज्य सरकार ने 17 नवंबर, 2003 और 16 अप्रैल, 2005 को लगाए गए प्रतिबंध के कारण उनके मामलों पर विचार नहीं किया।
बाद में जिला अनुकंपा समिति ने 1 जुलाई, 2006 के बाद इनके नाम की अनुशंसा तृतीय वर्ग पद के लिए की।इसके बाद इन्हें प्रखंड/नगर शिक्षक के पद पर नियत वेतन पर नियुक्त कर दिया गया। याचिकाकर्ताओं ने नियत वेतन को हाईकोर्ट में याचिका दायर कर चुनौती दी। उनका कहना था कि उनके पिता की मृत्यु 1जुलाई, 2006 से पहले हुई थी, इसलिए उनके मामले में उसी समय के लागू नियमों के अनुसार विचार होना चाहिए, न कि अनुशंसा की तारीख के समय लागू नियमों के तहत होना चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि अनुकंपा समिति की अनुशंसा एक प्रशासनिक और आकस्मिक कार्य है। इसमें देरी के लिए मृत कर्मचारी के आश्रितों को दंडित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने राज्य सरकार के 07 मार्च, 2019 के पत्र संख्या-336 को मनमाना, अवैध और भेदभावपूर्ण करार देते हुए उसे रद्द कर दिया। कोर्ट ने हाईकोर्ट के पूर्व के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि कहा कि आवेदकों को इससे वंचित रखना समानता के अधिकार के खिलाफ है।
कोर्ट ने सरकार को आवेदकों को नियमित वेतनमान देने का आदेश दिया। साथ ही शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव और प्राथमिक शिक्षा निदेशक को नियमित वेतनमान सहित अन्य सभी लाभ देने के बारे में तीन माह के भीतर कार्रवाई करें।

