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बिक्रम का ऐतिहासिक गांधी आश्रम:1921 में खुद बापू ने रखी थी नींव, साबरमती बनने की चाह,पर विकास पर लगा 'ग्रहण'

बिक्रम का ऐतिहासिक गांधी आश्रम:1921 में खुद बापू ने रखी थी नींव, साबरमती बनने की चाह,पर विकास पर लगा 'ग्रहण'

टना से सटे बिक्रम प्रखंड में स्थित ऐतिहासिक गांधी आश्रम आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। व्यवस्था के अभाव में यह धरोहर बेहद खराब स्थिति में पहुंच चुकी है। आलम यह है कि यहां स्थापित राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की मूर्ति की देखरेख करने वाला कोई नहीं है और वह किसी आम कलाकृति की तरह उपेक्षित पड़ी है।

स्थानीय लोग इस ऐतिहासिक सार्वजनिक धरोहर को गुजरात के साबरमती आश्रम की तर्ज पर विकसित देखना चाहते हैं, लेकिन आज यह अपनी बदहाली से मुक्ति के लिए विकास की राह ताक रहा है।

इस आश्रम का इतिहास बेहद गौरवशाली और देश की आजादी की लड़ाई से गहराई से जुड़ा हुआ है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान, महान सेनानी पुण्यदेव शर्मा के अथक प्रयासों से साल 1921 में स्वयं महात्मा गांधी यहां आए थे और उन्होंने खुद अपने हाथों से इस आश्रम की नींव रखी थी। बापू के अनुयायियों और महान स्वतंत्रता सेनानियों ने इसी धरती को अपना केंद्र बनाकर अंग्रेजों के खिलाफ बिगुल फूंका था। इसके बाद, देश में फैले सांप्रदायिक दंगों के शांत वातावरण की तलाश में 21 मई 1947 को महात्मा गांधी का यहां दोबारा आगमन हुआ था। सेनानी रामवरण शर्मा ने भी अपनी आत्मकथा में इस आश्रम को देश की स्वतंत्रता के जीवंत गवाह के रूप में दर्ज किया है।

बिक्रम का यह गांधी आश्रम आजादी के मतवालों का मुख्य गढ़ हुआ करता था। इसी आश्रम से रणनीति तैयार कर क्रांतिकारियों की टोली 17 अगस्त 1942 को बिक्रम थाने पर तिरंगा फहराने निकली थी, जिसमें तीन नौजवानों ने अपने प्राणों की आहुति दे दी थी और शहीद हो गए थे। इस पवित्र स्थल पर भूदान आंदोलन के प्रणेता विनोबा भावे ने अपने तीन भाइयों के साथ कई दिनों तक निवास किया था। इतना ही नहीं, पंडित जवाहरलाल नेहरू, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, मौलाना अबुल कलाम आजाद और फ्रंटियर गांधी खान अब्दुल गफ्फार खान जैसे शीर्ष नेताओं ने भी यहां आकर क्रांतिकारियों को स्वतंत्रता की राह दिखाई थी।

एक तरफ जहां सूबे की सरकार गांधी जयंती और विशेष अवसरों पर बापू के विचारों को बढ़ावा देने के लिए कई तरह की योजनाओं और कार्यक्रमों की घोषणाएं करती है, वहीं जमीनी हकीकत इसके उलट है। ऐसा नहीं है कि सरकार की तरफ से इसके विकास की कोई पहल नहीं की गई, लेकिन आज भी यह विकास की रोशनी से कोसों दूर वीरान पड़ा है। वर्तमान में इस ऐतिहासिक सार्वजनिक धरोहर को 'निजी' बताकर इसके जीर्णोद्धार और विकास कार्यों पर ग्रहण लगा दिया गया है। इसके बावजूद स्थानीय नागरिकों का हौसला डगमगाया नहीं है; ग्रामीणों ने संकल्प लिया है कि वे बिक्रम के आम लोगों के साथ मिलकर इस आश्रम को नया जीवन देंगे और इसे साबरमती आश्रम की तरह एक प्रमुख स्थल बनाकर ही दम लेंगे।

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