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Udta Bihar : शराबबंदी के 10 साल बाद 'सूखे नशे' की गिरफ्त में सूबा,आंकड़ों में भयावह तस्वीर!

Udta Bihar : शराबबंदी के 10 साल बाद 'सूखे नशे' की गिरफ्त में सूबा,आंकड़ों में भयावह तस्वीर!

बिहार में साल 2016 में लागू की गई पूर्ण शराबबंदी के एक दशक बाद जमीनी हकीकत चिंताजनक मोड़ पर पहुंच चुकी है। राज्य में न सिर्फ शराब की अवैध तस्करी और जहरीली शराब से मौतें जारी हैं, बल्कि शराब के विकल्प के रूप में 'सूखे नशे' (ड्रग्स) का कारोबार रिकॉर्ड स्तर पर बढ़ गया है।

2015 से 2026 के बीच आए आंकड़े गवाह हैं कि गांजा, स्मैक, चरस, ब्राउन शुगर और नशीली दवाओं का जाल शहरों से लेकर ग्रामीण इलाकों तक फैल चुका है, जो अब बिहार के सामाजिक ताने-बाने के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया है।

अगर शराबबंदी से ठीक पहले यानी साल 2015 के आंकड़ों को देखें, तो राज्य में मात्र 14.37 किलो गांजा और 1.12 किलो हेरोइन जब्त हुई थी। वहीं, साल 2025 में यह आंकड़ा बढ़कर करीब 28,000 किलो गांजा और 60 किलो हेरोइन तक पहुंच गया। वर्तमान साल 2026 की बात करें, तो पुलिस ने सिर्फ मई महीने तक ही 21,024.37 किलो गांजा, 51.9 किलो हेरोइन/स्मैक, करीब 3.45 लाख नशीले इंजेक्शन और 9 लाख से अधिक नशीली टैबलेट जब्त की हैं। यह दस साल का अंतर साफ दिखाता है कि बिहार में नशीले पदार्थों की मांग और आपूर्ति किस कदर पैर पसार चुकी है।

बिहार के सूखे नशे की दलदल में फंसने के पीछे शराबबंदी के बाद बदले समीकरण मुख्य वजह हैं। शराब की तस्करी में पकड़े जाने का खतरा ज्यादा है और ब्लैक मार्केट में इसकी कीमत भी अधिक है। इसके विपरीत, स्मैक की छोटी पुड़िया, नशीली गोलियां और कफ सिरप काफी सस्ते दाम पर मिल जाते हैं। साथ ही, शराब के मुकाबले ड्रग्स की ट्रांसपोर्टिंग बेहद आसान होती है; तस्कर इसकी बड़ी खेप को आसानी से छुपाकर शहरों में डंप कर देते हैं और फिर छोटे सप्लायरों के जरिए इसे स्कूल, कॉलेजों और युवाओं तक पहुंचा दिया जाता है।

बिहार की भौगोलिक स्थिति का फायदा उठाकर ड्रग्स माफियाओं ने राज्य को एक बड़ा ट्रांजिट हब बना दिया है। नेपाल के साथ बिहार की करीब 700 किलोमीटर लंबी खुली सीमा का इस्तेमाल तस्कर धड़ल्ले से कर रहे हैं, जिससे किशनगंज, अररिया, मधुबनी, सीतामढ़ी और सुपौल जैसे सीमावर्ती जिले 'ड्रग्स ट्रांजिट कॉरिडोर' में तब्दील हो चुके हैं। इसके अलावा पश्चिम बंगाल, झारखंड और पूर्वोत्तर राज्यों के बॉर्डर इलाकों से भी हर दिन भारी मात्रा में नशीले पदार्थों की खेप बिहार में धकेली जा रही है, जिस पर काबू पाना सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती है।

इस काले कारोबार का सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि इसकी सीधी पहुंच 18 से 35 वर्ष के युवाओं, स्कूल और कॉलेज के छात्रों तक हो गई है। बेरोजगारी, पलायन और मानसिक तनाव के कारण युवा तेजी से इसकी गिरफ्त में आ रहे हैं। इससे भी गंभीर बात यह है कि इंजेक्शन के जरिए ड्रग्स लेने का चलन बढ़ा है, जिसके कारण राज्य में एड्स (HIV) का खतरा फैल रहा है। एड्स कंट्रोल सोसाइटी के मुताबिक, बिहार के कुल 1.06 लाख एचआईवी मरीजों में से 11,836 लोग ऐसे हैं जो नशे के लिए एक ही संक्रमित सुई (सिरिंज) को आपस में साझा करने के कारण इस जानलेवा बीमारी का शिकार हुए हैं।

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