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₹22,006 करोड़ का कर्ज, चुकाएंगे सिर्फ ₹6.5 करोड़! सुभाष चंद्रा के पर्सनल इंसॉल्वेंसी केस में बड़ा फैसला, LIC को झटका

₹22,006 करोड़ का कर्ज, चुकाएंगे सिर्फ ₹6.5 करोड़! सुभाष चंद्रा के पर्सनल इंसॉल्वेंसी केस में बड़ा फैसला, LIC को झटका

Newstrack 1 week ago

Subhash Chandra NCLT: देश के सबसे बड़े मीडिया घरानों में से एक के पूर्व प्रमोटर सुभाष चंद्रा के लिए एक बेहद राहत भरी खबर सामने आई है। दिवालिया अदालत एनसीएलटी (NCLT) ने उनके व्यक्तिगत दिवालियापन के मामले में पेश की गई एक अनोखी पुनर्भुगतान योजना को अपनी अंतिम मंजूरी दे दी है।

इस ऐतिहासिक और चौंका देने वाले फैसले के तहत सुभाष चंद्रा अब कुल स्वीकार किए गए ₹22,006.57 करोड़ के विशाल कर्ज के बदले सिर्फ ₹6.5 करोड़ का भुगतान करेंगे। इसका सीधा मतलब यह है कि कर्ज देने वाले बैंकों और वित्तीय संस्थानों को अपने दिए गए पैसे पर लगभग 99.97 फीसदी का बहुत बड़ा नुकसान या हेयरकट झेलना पड़ेगा।

स्प्लिट फैसले के बाद तीसरे जज का फैसला

इस मामले में नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल के दो सदस्यों की बेंच ने पहले एक विभाजित या अलग-अलग राय वाला फैसला सुनाया था। इसके बाद मामला तीसरे सदस्य नीलेश शर्मा के पास भेजा गया। मंगलवार को जस्टिस नीलेश शर्मा ने इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) की धारा 114 का सहारा लेते हुए इस योजना को सही ठहराया।

एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस (LIC Housing Finance) की अगुवाई में विरोध कर रहे कर्जदाताओं ने तर्क दिया था कि इतने बड़े कर्ज के सामने महज ₹6.5 करोड़ का भुगतान पूरी तरह से अनुचित और गैरकानूनी है। एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस का खुद का दावा ₹1,322.39 करोड़ का था, जिसके बदले उसे सिर्फ ₹38.09 लाख (महज 0.028 फीसदी) दिए जा रहे थे। हालांकि अदालत ने उनके सभी विरोधों को सिरे से खारिज कर दिया।

नियम के तहत योजना को मिली हरी झंडी

एनसीएलटी ने अपने 144 पन्नों के लंबे आदेश में यह साफ किया कि विरोध करने वाले वित्तीय संस्थानों के पास कुल वोटिंग शेयर का 20 फीसदी से भी कम हिस्सा था। दूसरी तरफ इस पुनर्भुगतान योजना को 80.81 फीसदी वोटिंग शेयर वाले बड़े कर्जदाताओं की मंजूरी पहले ही मिल चुकी थी।

कानून के मुताबिक योजना को पास करने के लिए जरूरी बहुमत हासिल था। अदालत ने टिप्पणी की कि यदि इस योजना को खारिज कर दिया जाता और सुभाष चंद्रा को पूरी तरह दिवालिया घोषित किया जाता, तो कर्जदाताओं को इतने पैसे भी वापस नहीं मिलते, क्योंकि उनकी व्यक्तिगत संपत्ति की वर्तमान कीमत इस प्रस्तावित राशि से भी काफी कम है।

कोर्ट ने कहा: 'बिजनेस के फैसले में दखल देना अदालत का काम नहीं'

ट्रिब्यूनल ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में यह स्पष्ट किया कि कर्जदाताओं का व्यावसायिक फैसला (Commercial Wisdom) सबसे सर्वोपरि होता है। अदालत का काम यह तय करना नहीं है कि दिया जा रहा पैसा कम है या ज्यादा, और न ही वह कर्जदाताओं के फैसले की जगह अपनी समझ थोप सकती है।

एनसीएलटी की भूमिका मुख्य रूप से कानूनी प्रक्रिया की निगरानी करना और यह देखना है कि नियमों का सही पालन हुआ है या नहीं। अदालत ने माना कि यदि बिजनेसमैन फिर से अपने पैरों पर खड़ा होता है, तो आगे चलकर मूल कंपनियों से पैसा वसूलने की संभावना ज्यादा रहेगी।

धारा 115 के तहत सभी पर लागू होगा फैसला

आदेश में स्पष्ट किया गया है कि आईबीसी की धारा 115 के तहत एक बार योजना मंजूर होने के बाद यह उन सभी कर्जदाताओं पर समान रूप से लागू होती है, जिन्होंने इसके पक्ष में वोट दिया हो या फिर इसके खिलाफ। अदालत ने कहा कि विरोध करने वाले बैंकों को अलग से पूरा पैसा वसूलने की छूट नहीं दी जा सकती। अब यह मामला औपचारिक अंतिम आदेश पारित करने के लिए पुरानी दो सदस्यीय बेंच के पास वापस जाएगा, जिससे सुभाष चंद्रा को कानूनी रूप से बहुत बड़ी राहत मिल जाएगी।

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