Lok Sabha Delimitation 2026: भारतीय राजनीति के गलियारों में इस वक्त एक ऐसी हलचल मची है जो आने वाले दशकों तक देश की सत्ता का चेहरा बदल सकती है। लोकसभा में महिला आरक्षण और सांसदों की संख्या को 543 से बढ़ाकर 850 करने के प्रस्ताव पर संसद में तीखी बहस जारी है।
16 और 17 अप्रैल को होने वाली 15 घंटे की इस महा-चर्चा के बाद कल वोटिंग होनी है। लेकिन इस पूरे शोर-शराबे के बीच एक ऐसा शब्द गूंज रहा है जिसने अल्पसंख्यक समाज और सियासी पंडितों की नींद उड़ा दी है-'परिसीमन'। आरोप लग रहे हैं कि सीटों के इस नए बंटवारे में कहीं मुस्लिम प्रतिनिधित्व को हाशिए पर धकेलने की 'अमेरिकी तकनीक' तो इस्तेमाल नहीं हो रही?
क्या है पैकिंग, क्रैकिंग और स्टैकिंग का तिलिस्म?
जब हम चुनाव क्षेत्रों की सीमाओं में हेरफेर की बात करते हैं, तो अमेरिका में मशहूर 'गेरीमैंडरिंग' की तीन तकनीकें सामने आती हैं, जिनका जिक्र अब भारत में भी होने लगा है। सबसे पहले बात करते हैं 'पैकिंग' की। इसमें किसी खास समुदाय के वोटरों को चुन-चुनकर सिर्फ एक या दो सीटों में समेट दिया जाता है। नतीजा यह होता है कि वे वहां तो बड़े अंतर से जीत जाते हैं, लेकिन बाकी दर्जनों सीटों पर उनका प्रभाव शून्य हो जाता है। इसके ठीक उलट 'क्रैकिंग' की तकनीक में मुस्लिम-बहुल इलाकों को छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटकर अलग-अलग सीटों में मिला दिया जाता है, जिससे वे किसी भी सीट पर निर्णायक भूमिका में नहीं रह पाते। वहीं 'स्टैकिंग' के जरिए छोटे हिंदू-बहुल इलाकों को जोड़कर ऐसी नई सीटें तैयार की जाती हैं जहां अल्पसंख्यकों का पलड़ा हल्का हो जाए।
असम मॉडल और सच्चर कमेटी की कड़वी सच्चाई
इन तकनीकों का सबसे ताजा और विवादित उदाहरण असम का 2023 का परिसीमन माना जा रहा है। वहां विधानसभा की कुल सीटें तो नहीं बदलीं, लेकिन मुस्लिम प्रभाव वाली सीटें 35 से घटकर करीब 22 रह गईं। बारपेटा और धुबरी जैसे इलाकों में जिस तरह से विधानसभा क्षेत्रों को इधर-उधर किया गया, उसे विशेषज्ञ 'क्रैकिंग' और 'पैकिंग' का सटीक नमूना बताते हैं। वहीं अगर ऐतिहासिक नजरिए से देखें तो 2006 की सच्चर कमेटी ने भी इन विसंगतियों पर सवाल उठाए थे। रिपोर्ट में इशारा किया गया था कि कई राज्यों में जानबूझकर उन इलाकों को रिजर्व (SC) कर दिया गया जहां मुसलमानों की आबादी ज्यादा थी, ताकि वहां से कोई मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव न लड़ सके।
आंकड़ों का गणित और प्रतिनिधित्व की खाई
भारत में मुसलमानों की आबादी करीब 14 प्रतिशत है, लेकिन संसद में उनकी मौजूदगी का आंकड़ा चौंकाने वाला है। 1952 से लेकर अब तक केवल 541 मुस्लिम सांसद चुने गए हैं। 2024 की लोकसभा में भी यह भागीदारी घटकर महज 4.4 प्रतिशत रह गई है। हालांकि, विशेषज्ञ इसके लिए सिर्फ सीमाओं के हेरफेर को ही जिम्मेदार नहीं मानते, बल्कि राजनीतिक दलों द्वारा टिकट कम देना और वोटर लिस्ट में नाम जुड़ने की समस्याएं भी बड़ी वजहें हैं। नॉर्वेजियन शोधकर्ता जेन्सेनियस की स्टडी हालांकि कहती है कि यह कोई 'सिस्टमैटिक भेदभाव' नहीं है, लेकिन असम के हालिया आंकड़ों ने इस बहस को दोबारा जिंदा कर दिया है।
2029 का मास्टरप्लान और आगे की चुनौती
अब सबकी नजरें 2026 के प्रस्तावित राष्ट्रीय परिसीमन पर हैं। सरकार का इरादा सीटों की संख्या को 50% तक बढ़ाने का है। अगर यह प्रक्रिया सिर्फ जनसंख्या के आधार पर हुई, तो उत्तर भारत की सीटें बढ़ेंगी, लेकिन डर इस बात का है कि क्या मुस्लिम पॉकेट्स को 'पैक' या 'क्रैक' किया जाएगा? विपक्ष का कहना है कि अगर असम जैसी रणनीति पूरे देश में लागू हुई, तो अल्पसंख्यकों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व और भी कम हो सकता है। फिलहाल 850 सीटों वाले इस नए सदन का सपना सच होने के करीब है, लेकिन इसके पीछे छिपे चुनावी भूगोल के पेच सुलझना अभी बाकी हैं। क्या यह परिसीमन 'पूर्ण न्याय' करेगा या नई सियासी जंग की शुरुआत? फैसला कल की वोटिंग और भविष्य की जनगणना पर टिका है।

