
Fake Medicines India: दवा खरीदते समय ज्यादातर लोग पैकेट, ब्रांड का नाम और कीमत देखकर ही भरोसा कर लेते हैं। लेकिन अगर वही ब्रांडेड डिब्बा नकली हो तो मरीज के लिए इसका पता लगाना आसान नहीं होता।
नकली दवाओं और हेल्थकेयर प्रोडक्ट्स की पैकेजिंग अब इतनी असली जैसी बनाई जा रही है कि आम ग्राहक के लिए असली और नकली में अंतर करना मुश्किल हो गया है। इस बीच दिल्ली क्राइम ब्रांच की ओर से नकली और अवैध तरीके से बेची जा रही कैंसर की दवाओं के एक बड़े नेटवर्क का खुलासा इस खतरे की गंभीरता को सामने लाता है।
एएसपीए-क्रिसिल की 'स्टेट ऑफ काउंटरफिटिंग इन इंडिया 2025' रिपोर्ट के मुताबिक, सर्वे में शामिल करीब 33 फीसदी उपभोक्ताओं ने बताया कि पिछले 12 महीनों में उनका सामना किसी न किसी नकली हेल्थकेयर प्रोडक्ट से हुआ। यानी हर तीन में करीब एक उपभोक्ता ने नकली हेल्थकेयर सामान को लेकर अपना अनुभव बताया। दवाओं और मेडिकल प्रोडक्ट्स के मामले में यह आंकड़ा इसलिए ज्यादा चिंताजनक है, क्योंकि यहां नकली सामान का असर सीधे मरीज की सेहत पर पड़ सकता है।
दिल्ली में नकली कैंसर दवाओं का बड़ा नेटवर्क
नकली दवाओं के कारोबार की गंभीरता हाल में दिल्ली में हुई कार्रवाई से भी समझी जा सकती है। दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने नकली और अवैध तरीके से डायवर्ट की गई एंटी-कैंसर दवाओं के एक अंतरराज्यीय नेटवर्क का भंडाफोड़ किया है। इस मामले में 17 लोगों को गिरफ्तार किया गया। पुलिस ने बड़ी मात्रा में संदिग्ध दवाएं, खाली शीशियां, पैकिंग से जुड़ा सामान और नकदी बरामद की है।
जांच में इस नेटवर्क के तार दिल्ली-एनसीआर के अलावा मुंबई, हैदराबाद, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और दूसरे राज्यों से जुड़े होने की बात सामने आई। इससे साफ है कि नकली दवाओं का कारोबार किसी एक दुकान या एक शहर तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका नेटवर्क कई राज्यों तक फैला हो सकता है। खासतौर पर महंगी और जीवनरक्षक दवाएं जालसाजों के निशाने पर रहती हैं, क्योंकि इनकी कीमत ज्यादा होने के कारण मुनाफे की संभावना भी अधिक होती है।
मेडिकल स्टोर से लेकर ऑनलाइन प्लेटफॉर्म तक पहुंच
आम तौर पर लोगों को लगता है कि नकली दवाएं केवल सड़क किनारे की दुकानों या अनधिकृत बाजारों में ही मिलती हैं। लेकिन रिपोर्ट इस धारणा को पूरी तरह सही नहीं मानती। नकली हेल्थकेयर प्रोडक्ट का सामना करने वाले उपभोक्ताओं में बड़ी संख्या ने स्थानीय मेडिकल स्टोर को इसका स्रोत बताया। वहीं ऑनलाइन एग्रीगेटर और दवा डिलीवरी प्लेटफॉर्म भी इस समस्या से पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं।
डिजिटल खरीदारी बढ़ने के साथ नकली सामान बेचने वालों के लिए ग्राहकों तक पहुंच बनाना भी आसान हुआ है। सोशल मीडिया विज्ञापनों और दूसरे ऑनलाइन माध्यमों के जरिए भी ऐसे उत्पादों को असली ब्रांड के नाम पर बेचने की कोशिश की जाती है। ऐसे में केवल ऑनलाइन खरीदी गई दवा को सुरक्षित मान लेना भी पर्याप्त नहीं है।
सस्ती दवा देखकर कहीं आप भी तो नहीं कर रहे गलती?
नकली हेल्थकेयर प्रोडक्ट बेचने के लिए कम कीमत सबसे आसान तरीका हो सकती है। रिपोर्ट के अनुसार, नकली हेल्थकेयर सामान असली उत्पाद की तुलना में औसतन करीब 18 फीसदी सस्ता हो सकता है। महंगी दवाओं के मामले में कीमत में बड़ा अंतर देखकर ग्राहक जल्दी प्रभावित हो सकता है और बिना पूरी जांच किए खरीदारी कर सकता है। वहीं दवा के मामले में सस्ता सौदा हमेशा फायदे का सौदा नहीं होता। नकली दवा में जरूरी सक्रिय घटक सही मात्रा में न होने या गलत पदार्थ शामिल होने की आशंका रहती है। इससे मरीज को इलाज का अपेक्षित फायदा नहीं मिल सकता और गंभीर बीमारी के मामले में स्थिति और बिगड़ सकती है।
चमकदार पैकेजिंग पर भरोसा करना पड़ सकता है भारी
नकली दवा पहचानने में सबसे बड़ी समस्या इसकी पैकेजिंग है। जालसाज अब असली कंपनियों के डिब्बे, लोगो, फॉन्ट, रंग और डिजाइन की हूबहू नकल करने की कोशिश करते हैं। कई उत्पादों पर होलोग्राम और क्यूआर कोड जैसे सुरक्षा संकेत भी दिखाई दे सकते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 48 फीसदी उपभोक्ता होलोग्राम और लगभग 40 फीसदी लोग क्यूआर कोड को असलियत जांचने के संकेत के रूप में देखते हैं।
समस्या यह है कि केवल इन संकेतों की मौजूदगी से दवा को असली नहीं माना जा सकता। नकली पैकेजिंग में भी इनकी नकल की जा सकती है। इसलिए दवा की पैकिंग अच्छी दिख रही है या उस पर ब्रांड का लोगो बना है, इससे उसकी प्रामाणिकता साबित नहीं होती।
2018 से 2025 तक सामने आए 521 मामले
एएसपीए के काउंटरफिट न्यूज रिपॉजिटरी के अनुसार, 2018 से 2025 के बीच हेल्थकेयर क्षेत्र में जालसाजी से जुड़े 521 आधिकारिक मामले सामने आए। कोरोना महामारी के दौरान स्थिति और गंभीर हुई थी। उस समय नकली मास्क, पीपीई किट, दवाओं और यहां तक कि वैक्सीन से जुड़े मामले भी सामने आए।
रिपोर्ट के मुताबिक 2021 में ऐसे मामलों की संख्या 136 तक पहुंच गई थी। इसके बाद भी नकली हेल्थकेयर प्रोडक्ट का खतरा खत्म नहीं हुआ। 2024 और 2025 में 52-52 मामले दर्ज किए गए। यह संख्या बताती है कि महामारी खत्म होने के बाद भी नकली मेडिकल सामान की समस्या बनी हुई है।
ज्यादातर लोग अनजाने में खरीद लेते हैं नकली सामान
नकली दवा के कारोबार को रोकने में एक बड़ी चुनौती यह भी है कि ज्यादातर ग्राहक जानबूझकर नकली सामान नहीं खरीदते। रिपोर्ट के मुताबिक करीब 96 फीसदी उपभोक्ता अनजाने में नकली उत्पाद खरीदते हैं। यानी ग्राहक को यह पता ही नहीं होता कि वह जिस दवा या हेल्थकेयर प्रोडक्ट के लिए पैसे दे रहा है, वह असली नहीं है।
यही वजह है कि केवल ग्राहक को सावधान रहने की सलाह देना काफी नहीं है। दवा बनाने वाली कंपनी से लेकर सप्लाई चेन, डिस्ट्रीब्यूटर, मेडिकल स्टोर और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म तक हर स्तर पर निगरानी मजबूत करने की जरूरत है।
दवा खरीदते समय इन बातों को नजरअंदाज न करें
दवा खरीदते समय पैकेट पर लिखे नाम, बैच नंबर, निर्माण और एक्सपायरी डेट, निर्माता की जानकारी और सील को ध्यान से देखना चाहिए। अगर पैकेजिंग में छेड़छाड़ दिखाई दे, प्रिंटिंग असामान्य लगे या दवा की कीमत सामान्य बाजार भाव से बहुत कम हो तो सावधानी बरतनी चाहिए। दवा हमेशा भरोसेमंद और अधिकृत स्रोत से खरीदना बेहतर है। अगर किसी दवा को लेकर संदेह हो तो उसे खुद से इस्तेमाल करने के बजाय फार्मासिस्ट या डॉक्टर से सलाह लेना सुरक्षित तरीका है। खासतौर पर कैंसर, हृदय रोग और दूसरी गंभीर बीमारियों की दवाओं में थोड़ी सी लापरवाही भी भारी पड़ सकती है।
सिर्फ जागरूकता नहीं, मजबूत डिजिटल सिस्टम की जरूरत
एक्सपर्ट्स के मुताबिक नकली दवाओं की समस्या से निपटने के लिए केवल पैकेजिंग पर होलोग्राम या क्यूआर कोड लगाने से काम नहीं चलेगा। जरूरत ऐसे सिस्टम की है जिससे मरीज या ग्राहक आसानी से दवा की प्रामाणिकता जांच सके और यह पता लगा सके कि उत्पाद किस कंपनी ने बनाया, उसका बैच क्या है और वह सप्लाई चेन में किस रास्ते से होकर बाजार तक पहुंचा।
जब तक ऐसी आसान और भरोसेमंद व्यवस्था बड़े स्तर पर मजबूत नहीं होती, तब तक चमकदार पैकेट के पीछे छिपी नकली दवा का खतरा बना रहेगा।

