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भारत के इस राज्य में ज़बरदस्त तरीके से बना 'शराबी रिकॉर्ड'!  8 दिनों में 771 करोड़ रुपये के पार पहुंचा आंकड़ा

भारत के इस राज्य में ज़बरदस्त तरीके से बना 'शराबी रिकॉर्ड'! 8 दिनों में 771 करोड़ रुपये के पार पहुंचा आंकड़ा

Newstrack 1 week ago

Screen Time Study: नौनिहाल बच्चों के लिए जन्म लेते ही यह दुनिया किसी अजूबे से कम नहीं होती। मां की गोद से बाहर निकलते ही उनकी आंखें हर उस चीज पर ठहरने लगती हैं, जो चटकीले रंगों, अलग-अलग आकारों और तरह-तरह की आवाजों से उनका ध्यान खींचती है।

यही वजह है कि बच्चों के खिलौने भी अक्सर चमकीले रंगों और मधुर ध्वनियों से सजे होते हैं। लेकिन डिजिटल दौर में बच्चों की दुनिया में एक ऐसा 'खिलौना' भी दाखिल हो चुका है, जिसका आकर्षण सिर्फ बच्चे ही नहीं, बड़े भी आसानी से नहीं छोड़ पाते स्मार्टफोन।

स्मार्टफोन बेशक हमारी जिंदगी को आसान बनाने वाला बेहद उपयोगी उपकरण है। पढ़ाई से लेकर मनोरंजन और जानकारी हासिल करने तक, इसकी एक स्क्रीन पर पूरी दुनिया सिमट आई है। मगर यही चमकती स्क्रीन उन मासूम आंखों के लिए कितनी मुफीद है, जिन्होंने अभी-अभी दुनिया को देखना और समझना शुरू किया है? बच्चों को चुप कराने, व्यस्त रखने या पढ़ाई के नाम पर हाथ में थमाया गया स्मार्टफोन अगर उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का बड़ा हिस्सा बन जाए, तो इसके असर को नजरअंदाज करना आसान नहीं है।

एक नई स्टडी ने इसी चिंता को और गंभीर बना दिया है। शोध के मुताबिक, बचपन में कम उम्र से ज्यादा स्क्रीन एक्सपोजर का संबंध आगे चलकर बच्चों की पढ़ने-लिखने की क्षमता और वर्किंग मेमोरी से जुड़ी कमजोर परफॉर्मेंस से हो सकता है। ऐसे में यह सवाल बेहद अहम हो जाता है कि जिस स्मार्टफोन को हम बच्चों के लिए सुविधा और मनोरंजन का साधन समझकर उनके हाथों में सौंप रहे हैं, कहीं वही उनकी सीखने और समझने की प्राकृतिक प्रक्रिया के रास्ते में तो नहीं आ रहा?

इसी सवाल को समझने की कोशिश Inserm और National University of Singapore के वैज्ञानिकों ने की है। शोधकर्ताओं ने सिंगापुर के Growing Up in Singapore Towards healthy Outcomes (GUSTO) बर्थ कोहोर्ट में शामिल 502 बच्चों के आंकड़ों का अध्ययन किया। बच्चों के अलग-अलग उम्र में स्क्रीन इस्तेमाल के समय को रिकॉर्ड किया गया और बाद में उनकी पढ़ने-लिखने की क्षमता तथा याददाश्त से जुड़े कौशल का आकलन किया गया।

एक साल की उम्र पर स्क्रीन टाइम ने खींचा ध्यान

शोध में बच्चों की शुरुआती उम्र के स्क्रीन एक्सपोजर और बाद के विकास के बीच संबंध को देखा गया। इसके लिए करीब 9 साल की उम्र में पढ़ने-लिखने से जुड़ी क्षमता और लगभग 10.5 साल की उम्र में वर्किंग मेमोरी का आकलन किया गया।

वर्किंग मेमोरी का मतलब उस क्षमता से है, जिसकी मदद से बच्चा किसी जानकारी को थोड़े समय तक दिमाग में बनाए रखता है और जरूरत के मुताबिक उसका इस्तेमाल करता है। उदाहरण के लिए, किसी निर्देश को सुनकर उसे याद रखना और उसी के अनुसार अगला काम करना वर्किंग मेमोरी से जुड़ा कौशल है।

World Journal of Pediatrics में प्रकाशित इस शोध में सिर्फ यह नहीं देखा गया कि बच्चे कुल कितने घंटे स्क्रीन देख रहे थे। वैज्ञानिकों ने यह भी समझने की कोशिश की कि किस उम्र में ज्यादा स्क्रीन एक्सपोजर शुरू हुआ, इसका आगे के विकास से क्या संबंध है।

रिसर्च में खास तौर पर करीब एक साल की उम्र में ज्यादा स्क्रीन देखने वाले बच्चों में बाद की पढ़ने-लिखने की क्षमता और वर्किंग मेमोरी से जुड़े परिणाम कमजोर पाए गए। करीब 6 साल की उम्र में ज्यादा स्क्रीन एक्सपोजर वाले बच्चों में भी अपेक्षाकृत खराब परिणाम देखने को मिले।

आखिर स्क्रीन से क्यों पड़ सकता है विकास पर असर?

वैज्ञानिकों का कहना है कि इसका एक संभावित कारण यह हो सकता है कि स्क्रीन बच्चे के समय का वह हिस्सा ले लेती है, जिसमें उसे दूसरे जरूरी अनुभव मिलने चाहिए। बचपन में विकास केवल किताबों या किसी एजुकेशनल ऐप से नहीं होता। बच्चे खेलते हुए, चीजों को छूकर-देखकर, सवाल पूछकर, बातचीत करके और आसपास की दुनिया को समझकर भी लगातार सीखते हैं।

अगर बच्चा लंबे समय तक स्क्रीन में व्यस्त रहता है, तो उसके पास खेलने, किताब देखने, माता-पिता से बातचीत करने और वास्तविक दुनिया में चीजों को समझने के लिए कम समय बच सकता है। यही गतिविधियां भाषा, ध्यान, सोचने और समस्या सुलझाने जैसी क्षमताओं के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इसी के साथ बच्चे का पारिवारिक माहौल, माता-पिता की शिक्षा, नींद, शारीरिक गतिविधि, सामाजिक संपर्क और स्क्रीन पर देखी जाने वाली सामग्री जैसे कई दूसरे कारक भी असर डाल सकते हैं।

सिर्फ स्क्रीन का समय नहीं, उसकी शुरुआत और इस्तेमाल पर भी ध्यान

बच्चों की स्क्रीन आदतों पर चर्चा करते समय अक्सर केवल यह पूछा जाता है कि बच्चा दिन में कितने घंटे मोबाइल देखता है। लेकिन नई स्टडी का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि उम्र और स्क्रीन एक्सपोजर के समय को भी ध्यान में रखा गया।

यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि बच्चा रोज कितनी देर मोबाइल देख रहा है। यह भी मायने रखता है कि स्क्रीन उसके जीवन में कितनी कम उम्र में शामिल हुई, वह स्क्रीन पर क्या देख रहा है और उसके कारण कौन-सी दूसरी गतिविधियां कम हो रही हैं। मिसाल के तौर पर किसी बच्चे का सीमित समय माता-पिता के साथ उम्र के मुताबिक शैक्षणिक कंटेंट देखने में गुजरता है, तो उसका अनुभव अकेले लंबे समय तक वीडियो या गेम देखने से अलग हो सकता है। इसलिए स्क्रीन टाइम को समझने के साथ उसके कंटेंट और इस्तेमाल के तरीके पर भी ध्यान देना जरूरी है।

इससे पहले भी सामने आ चुके हैं ऐसे संकेत

स्क्रीन टाइम और बच्चों के विकास के बीच संबंध को लेकर यह पहली रिसर्च नहीं है। वर्ष 2020 में University of Calgary के शोधकर्ताओं ने बच्चों से जुड़ी 42 स्टडीज और 18,905 बच्चों के आंकड़ों का विश्लेषण किया था। इसमें स्क्रीन इस्तेमाल और बच्चों के भाषा विकास के बीच संबंध को देखा गया था। ये सभी अलग-अलग शोध इस बात की ओर इशारा करते रहे हैं कि बचपन में स्क्रीन का अत्यधिक और असंतुलित इस्तेमाल बच्चों के विकास से जुड़े कई पहलुओं के लिए चिंता का विषय हो सकता है। स्क्रीन पूरी तरह खराब है, ऐसा कहना भी सही नहीं होगा। आज डिजिटल माध्यम शिक्षा और जानकारी का महत्वपूर्ण साधन बन चुके हैं। लेकिन इसकी अधिकता इसके सकारात्मक पहलुओं पर भारी पड़ रही है।

माता-पिता क्या करें?

बच्चों को स्मार्टफोन से पूरी तरह दूर रखना हर परिवार के लिए संभव नहीं है। ऐसे में बेहतर तरीका स्क्रीन के इस्तेमाल को उम्र के हिसाब से सीमित और संतुलित रखना है। छोटे बच्चों को मोबाइल देकर लंबे समय तक अकेला छोड़ने के बजाय माता-पिता उनके साथ रहें और संभव हो तो कंटेंट को खुद भी देखें।

इसके साथ बच्चे के रोजमर्रा के जीवन में खेल, शारीरिक गतिविधि, किताबें, परिवार के साथ बातचीत और पर्याप्त नींद के लिए समय तय होना चाहिए। खास तौर पर यह देखना जरूरी है कि मोबाइल बच्चे के खेलने, सोने या परिवार से बातचीत करने का विकल्प न बन जाए। स्मार्टफोन बच्चों को दुनिया से जोड़ने का माध्यम हो सकता है, लेकिन अगर वही स्क्रीन उन्हें वास्तविक दुनिया से दूर करने लगे तो चिंता की वजह यहीं से शुरू होती है। नई स्टडी का संदेश भी यही है कि सवाल केवल मोबाइल देने या न देने का नहीं, बल्कि यह समझने का है कि बच्चे की जिंदगी में स्क्रीन कितनी जल्दी, कितनी देर और किस तरह प्रवेश कर रही है।

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Disclaimer: This content has not been generated, created or edited by Dailyhunt. Publisher: Newstrack Journalism Hindi