PFBR Nuclear Reactor: भारत ने न्यूक्लियर एनर्जी सेक्टर में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है, लेकिन इस सफलता से पड़ोसी पाकिस्तान को साफ तौर पर परेशानी होती नजर आ रही है। जैसे ही भारत ने अपने प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर यानी PFBR में सफलता की घोषणा की, जिसके बाद पाकिस्तान की ओर से इस पर सवाल और चेतावनी आनी शुरू हो गई है।
क्या है पूरा मामला?
दरअसल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 6 अप्रैल 2026 को जानकारी दी कि तमिलनाडु के कल्पक्कम में स्थित PFBR रिएक्टर ने सफलता हासिल कर ली है। इस खबर के बाद दुनियाभर से भारत को बधाई संदेश मिलने लगे। खास बात यह है कि यह पूरा प्रोजेक्ट पूरी तरह स्वदेशी है, जिसे भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है।
यह उपलब्धि भारत को उन देशों की कतार में खड़ा करती है, जो उन्नत न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी में आगे हैं और इससे भविष्य में भारत की जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम होने की उम्मीद है।
पाकिस्तान ने क्यों जताई चिंता?
वहीं इस सफलता के बाद पाकिस्तान के आर्म्स कंट्रोल एडवाइजर और स्ट्रैटजिक प्लान्स डिवीजन के सदस्य जाहिर काजमी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए भारत के PFBR प्रोजेक्ट पर सवाल उठाए।
उन्होंने अपने पोस्ट में लिखा कि कल्पक्कम में स्थित यह 500 MWe का स्वदेशी सोडियम-कूल्ड फास्ट ब्रीडर रिएक्टर IAEA के सुरक्षा उपायों के दायरे से बाहर है।
PFBR रिएक्टर पर क्या हैं आरोप?
जाहिर काजमी ने अपने बयान में कहा कि यह रिएक्टर मिक्स्ड-ऑक्साइड यानी MOX ईंधन का इस्तेमाल करता है, जिसमें प्लूटोनियम और यूरेनियम शामिल होते हैं। उनका दावा है कि यह रिएक्टर जितना विखंडनीय पदार्थ इस्तेमाल करता है, उससे ज्यादा पैदा करता है, जिससे अतिरिक्त प्लूटोनियम बनता है।
उन्होंने यह भी कहा कि भारत ने अपने फास्ट ब्रीडर रिएक्टरों को कभी भी IAEA की निगरानी में नहीं रखा है, जो 2005 से 2008 के बीच हुई नागरिक-सैन्य अलगाव योजना और 2009 से लागू समझौते के अनुरूप है।
काजमी के मुताबिक, IAEA के पास यह अधिकार नहीं है कि वह जांच सके कि इस रिएक्टर से निकलने वाला पदार्थ भारत के परमाणु हथियार कार्यक्रम की ओर तो नहीं जा रहा है।
क्या है डर की असली वजह?
पाकिस्तान की ओर से असल चिंता इस लिए जताई जा रही है कि क्योंकि यह एक 'ब्रीडर' रिएक्टर है, जो बिजली के साथ-साथ प्लूटोनियम भी बनाता है, इसलिए भारत इसका इस्तेमाल परमाणु हथियार बनाने में कर सकता है।
उनका कहना है कि अगर इस रिएक्टर को खास तरीके से चलाया जाए, तो इसमें हथियार-ग्रेड प्लूटोनियम तैयार किया जा सकता है और चूंकि इस पर अंतरराष्ट्रीय निगरानी नहीं है, इसलिए इसे लेकर शक और बढ़ जाता है।
क्या है भारत का रुख?
वहीं भारत इस पूरे कार्यक्रम को अपनी ऊर्जा आत्मनिर्भरता से जोड़कर देखता है। भारत का लक्ष्य थोरियम के इस्तेमाल से बिजली उत्पादन को बढ़ाना है, जो भविष्य की ऊर्जा जरूरतों के लिए बेहद अहम माना जा रहा है।
भारत सरकार का साफ कहना है कि वह अपने रणनीतिक कार्यक्रमों को किसी अंतरराष्ट्रीय निगरानी में नहीं रखना चाहती, क्योंकि यह सीधे तौर पर देश की सुरक्षा से जुड़ा मामला है।

