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भारत में वामपंथ का पतन: 5 दशकों में पहली बार कोई भी कम्युनिस्ट सरकार नहीं

भारत में वामपंथ का पतन: 5 दशकों में पहली बार कोई भी कम्युनिस्ट सरकार नहीं

Newstrack 1 week ago

Left Politics India: 4 मई 2026 का दिन भारतीय राजनीति के इतिहास में एक बड़े बदलाव के रूप में दर्ज हो गया। केरल में पिनारायी विजयन के नेतृत्व वाली वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) सरकार की हार के साथ ही देश में वामपंथी शासन का आखिरी किला भी ढह गया।

यह पहली बार है जब पिछले लगभग 50 वर्षों में भारत के किसी भी राज्य में कम्युनिस्ट सरकार नहीं बची है।

केरल लंबे समय से वामपंथी राजनीति का सबसे मजबूत केंद्र रहा है। 2016 में सत्ता में आई एलडीएफ सरकार ने 2021 में ऐतिहासिक वापसी की थी। लेकिन इस बार के विधानसभा चुनाव में जनता ने बदलाव का फैसला सुनाया है।

वामपंथी राजनीति की जड़ें

भारत में वामपंथी राजनीति की जड़ें 1960 और 70 के दशक में मजबूत हुई थीं। कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी जैसे दलों ने त्रिपुरा, केरल और पश्चिम बंगाल में लंबे समय तक शासन किया।

पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा ने 1977 से 2011 तक लगातार 34 साल राज किया। त्रिपुरा में भी वाम दलों का प्रभाव 2018 तक कायम रहा। केरल में वाम और कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधनों के बीच सत्ता का अदल-बदल चलता रहा। अब केरल में हार के साथ यह अध्याय पूरी तरह समाप्त हो गया है। इस परिणाम के बाद भारत की राजनीति में वामपंथ का प्रभाव बेहद सीमित हो गया है। संसद और राज्यों में उनकी उपस्थिति पहले ही घट चुकी थी, और अब किसी राज्य में सरकार भी नहीं बची है।

वामपंथ का स्वर्णकाल

भारत में वामपंथी दलों का प्रभाव 1970 से 2000 के दशक तक अपने चरम पर था। बंगाल में 1977 से 2011, लगातार 34 साल वाम मोर्चा सत्ता में रहा। वाम मोर्चा का नेतृत्व ज्योति बसु और बुद्धदेब भट्टाचार्य ने किया।

त्रिपुरा में 1978 से 1988, 1993 से 2018 तक वाम शासन रहा। वहीं केरल में सत्ता का चक्र एलडीएफ़ और यूडीएफ़ के बीच घूमता रहा। लेकिन 2016 और 2021 में एलडीएफ की लगातार जीत हुई।

लोकसभा में प्रदर्शन देखें तो 2004 में वाम दलों के 60+ सांसद थे जो 2009 में घटकर 24 रह गए। 2014 में सिर्फ 12 सीटें, 2019 में 5 सीटें और 2024 में 1-3 सीटों के बीच सीमित उपस्थिति रही।

इस बार हार के मुख्य कारण

विश्लेषकों के अनुसार इस बार के चुनावों में एलडीएफ की हार की सबसे बड़ी वजह सरकार विरोधी लहर थी। इसके अलावा बेरोजगारी, आर्थिक मुद्दे, युवा मतदाताओं का बदलता रुझान और विपक्ष की मजबूत रणनीति भी बड़े कारण थे। हालांकि पी विजयन की व्यक्तिगत छवि और कुछ कल्याणकारी योजनाएं चर्चा में रहीं, लेकिन वे सत्ता बचाने के लिए पर्याप्त नहीं रहीं।

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