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भारत से दुश्मनी करने पर तुले नेपाली PM बालेन शाह? अब तक ले चुके हैं दो विरोधी फैसले, आखिर क्या है मंशा

भारत से दुश्मनी करने पर तुले नेपाली PM बालेन शाह? अब तक ले चुके हैं दो विरोधी फैसले, आखिर क्या है मंशा

Newstrack 1 week ago

Balen Shah anti India decisions: नेपाल की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत करते हुए 27 मार्च 2026 को बालेन्द्र शाह उर्फ बालेन ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। महज 35 साल की उम्र में देश की कमान संभालने वाले बालेन नेपाल के इतिहास के सबसे युवा प्रधानमंत्रियों में से एक बन गए हैं।

भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों और एक सुधारवादी छवि के दम पर सत्ता के शिखर तक पहुंचे बालेन से जनता को काफी उम्मीदें थीं, लेकिन उनके कार्यकाल के शुरुआती एक महीने ने ही पड़ोसी देश भारत के साथ कूटनीतिक रिश्तों में हलचल पैदा कर दी है। बालेन सरकार द्वारा लिए गए दो प्रमुख फैसलों ने न केवल नई दिल्ली की चिंताएं बढ़ाई हैं, बल्कि स्वयं नेपाल के सीमावर्ती इलाकों में विरोध के सुर तेज कर दिए हैं।

बालेन सरकार का पहला कड़ा फैसला भारत से आने वाले सामानों पर लगने वाली कस्टम ड्यूटी से जुड़ा है। सरकार ने एक नया नियम लागू किया है जिसके तहत भारत से आने वाले 100 नेपाली रुपये (लगभग 63 भारतीय रुपये) से अधिक मूल्य के किसी भी सामान पर अनिवार्य सीमा शुल्क देना होगा। यह ड्यूटी सामान की प्रकृति के आधार पर 5 प्रतिशत से लेकर 80 प्रतिशत तक तय की गई है। गौरतलब है कि भारत और नेपाल के बीच की सीमा दुनिया की सबसे खुली अंतरराष्ट्रीय सीमाओं में गिनी जाती है, जहां दशकों से रोटी-बेटी का रिश्ता होने के साथ-साथ व्यापारिक आवाजाही भी बिना किसी बाधा के होती रही है।

इस फैसले का सबसे बुरा असर सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले आम नागरिकों पर पड़ा है। नेपाल के तराई क्षेत्रों में रहने वाले लोग अक्सर रोजमर्रा की जरूरतों जैसे किराने का सामान, दवाइयां, बर्तन और इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए भारतीय बाजारों पर निर्भर रहते हैं, क्योंकि वहां ये चीजें सस्ती मिलती हैं। अब मामूली मूल्य के सामान पर भी भारी टैक्स लगने के कारण स्थानीय लोगों में भारी नाराजगी है और कई इलाकों में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। जानकारों का मानना है कि इस सख्त नीति से न केवल आम जनता की जेब पर बोझ पड़ा है, बल्कि सदियों पुराने सीमा पार व्यापारिक संतुलन को भी तगड़ा झटका लगा है।

सीमा शुल्क विवाद के बीच ही दूसरा बड़ा विवाद 1 मई 2026 को भारत द्वारा कैलाश मानसरोवर यात्रा के ऐलान के बाद खड़ा हुआ। भारत ने घोषणा की थी कि इस वर्ष की यात्रा जून से अगस्त के बीच उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे और सिक्किम के नाथू ला दर्रे से संचालित की जाएगी। इस घोषणा के महज दो दिन बाद यानी 3 मई को बालेन सरकार ने औपचारिक कूटनीतिक विरोध दर्ज कराते हुए इसे नेपाल की संप्रभुता का उल्लंघन बताया। नेपाल के विदेश मंत्रालय ने 1816 की सुगौली संधि का हवाला देते हुए दावा किया कि महाकाली नदी के पूर्व में स्थित लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी नेपाल के अभिन्न हिस्से हैं।

नेपाल के इन दावों को भारत ने सिरे से खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि ये दावे न तो न्यायसंगत हैं और न ही ऐतिहासिक तथ्यों पर टिकते हैं। भारतीय विदेश मंत्रालय ने जोर देकर कहा कि लिपुलेख दर्रा 1954 से ही कैलाश मानसरोवर यात्रा का पारंपरिक मार्ग रहा है। बालेन शाह का यह रुख उनके पुराने राजनीतिक तेवरों से मेल खाता है। काठमांडू के मेयर रहते हुए भी उन्होंने अपने दफ्तर में 'ग्रेटर नेपाल' का नक्शा लगाया था और पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के चीन दौरे के वक्त भी लिपुलेख को लेकर कड़ा रुख अपनाया था। अब प्रधानमंत्री के रूप में उनके इन फैसलों ने संकेत दे दिए हैं कि आने वाले समय में भारत-नेपाल रिश्तों की राह उतनी आसान नहीं रहने वाली जितनी उम्मीद की जा रही थी।

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