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Bollywood Old Movie Pyaasa: वह फ़िल्म जिसमें गुरु दत्त ने प्रेम की असफलता को अमर कर दिया

Bollywood Old Movie Pyaasa: वह फ़िल्म जिसमें गुरु दत्त ने प्रेम की असफलता को अमर कर दिया

Newstrack 1 week ago

Bollywood Old Movie Pyaasa: भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ फ़िल्में केवल देखी नहीं जातीं, महसूस की जाती हैं। 'प्यासा' ऐसी ही फ़िल्म थी। यह एक असफल कवि की कहानी थी, लेकिन भीतर से यह उस समाज की कहानी थी जो संवेदनशील लोगों को अक्सर तब तक नहीं पहचानता जब तक वे टूट न जाएँ।

यही कारण है कि 1957 में रिलीज़ हुई यह फ़िल्म समय के साथ केवल क्लासिक नहीं बनी, बल्कि भारतीय सिनेमा की सबसे गहरी मानवीय अभिव्यक्तियों में शामिल हो गई।

'प्यासा' को केवल प्रेम और असफलता की कहानी समझना अधूरा होगा। यह उस कलाकार की त्रासदी थी जिसे जीवित रहते हुए सम्मान नहीं मिलता, लेकिन मरने की खबर फैलते ही समाज उसे महान घोषित कर देता है। गुरु दत्त इस पाखंड को बहुत गहराई से महसूस करते थे। यही कारण है कि फ़िल्म में हर संवेदनशील दृश्य के पीछे एक निजी आक्रोश दिखाई देता है।

जब 'प्यासा' रिलीज़ हुई तो हिंदी सिनेमा में रोमांटिक मनोरंजन और हल्की-फुल्की कहानियों का दौर था। ऐसे समय में एक उदास, दार्शनिक और सामाजिक आलोचना से भरी फ़िल्म बनाना बहुत बड़ा जोखिम था। लेकिन गुरु दत्त जोखिम से डरने वाले फिल्मकार नहीं थे। वे सिनेमा को केवल मनोरंजन नहीं, आत्मा की अभिव्यक्ति मानते थे।

फ़िल्म की कहानी कवि विजय के इर्द-गिर्द घूमती है। एक ऐसा आदमी जिसकी कविताओं को दुनिया बेकार समझती है। परिवार उसे असफल मानता है। प्रेमिका उसे छोड़ देती है। समाज उसे महत्व नहीं देता। लेकिन वही आदमी मृत्यु की अफवाह के बाद महान कवि घोषित कर दिया जाता है।

'विजय' केवल एक काल्पनिक पात्र नहीं था। उसमें गुरु दत्त का अपना अकेलापन, उनकी संवेदनशीलता और समाज के प्रति उनका गहरा मोहभंग दिखाई देता है। कई फिल्म इतिहासकार मानते हैं कि 'प्यासा' कहीं न कहीं गुरु दत्त की आंतरिक बेचैनी का सिनेमाई रूपांतरण थी। यही कारण है कि फ़िल्म इतनी वास्तविक महसूस होती है।

कहा जाता है कि 'प्यासा' का प्रारंभिक विचार लंबे समय से गुरु दत्त के भीतर था। वे ऐसे कलाकारों को देख रहे थे जिन्हें समाज जीवित रहते हुए सम्मान नहीं देता। साहित्य, संगीत और कला की दुनिया में संघर्ष कर रहे लोगों की पीड़ा उन्हें भीतर तक प्रभावित करती थी। धीरे-धीरे यही अनुभव विजय के किरदार में बदल गया।

फ़िल्म के लेखन में अबरार अल्वी की बड़ी भूमिका थी। गुरु दत्त और अबरार अल्वी घंटों बैठकर संवादों और दृश्यों पर चर्चा करते थे। वे चाहते थे कि फ़िल्म में बनावटी नाटकीयता न हो। दर्द वास्तविक लगे। संवाद साहित्यिक हों, लेकिन जीवन से कटे हुए न महसूस हों।

'प्यासा' के संवादों में कविता जैसी गहराई दिखाई देती है। "ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है" केवल गीत की पंक्ति नहीं थी। वह पूरी फ़िल्म का दार्शनिक निष्कर्ष बन गई। समाज की सफलता, प्रसिद्धि और धन के प्रति मोहभंग इस एक पंक्ति में सिमट जाता है।

फ़िल्म के लिए गुरु दत्त के अलावा किसी और अभिनेता की कल्पना करना कठिन था। उनके चेहरे की थकान, आँखों की उदासी और संवाद बोलने की धीमी शैली विजय को असाधारण वास्तविकता देती थी। कई बार ऐसा लगता था जैसे वे अभिनय नहीं कर रहे, बल्कि अपने भीतर की टूटन को जी रहे हों।

वहीदा रहमान को 'गुलाबो' की भूमिका मिली। यह किरदार हिंदी सिनेमा की पारंपरिक नायिकाओं से अलग था। वह एक वेश्या है, लेकिन वही विजय की कविता और संवेदनशीलता को सबसे पहले पहचानती है। गुरु दत्त चाहते थे कि गुलाबो में करुणा और आत्मीयता दिखाई दे। वहीदा रहमान ने इस भूमिका को अद्भुत गरिमा दी।

'गुलाबो' का किरदार 'प्यासा' की नैतिक आत्मा जैसा है। समाज जिसे गिरा हुआ मानता है, वही सबसे अधिक मानवीय साबित होती है। जबकि सभ्य और सफल लोग संवेदनहीन दिखाई देते हैं। गुरु दत्त ने इस उलटाव के माध्यम से समाज की नैतिक संरचना पर तीखा सवाल उठाया।

माला सिन्हा ने मीना का किरदार निभाया। वह विजय की पुरानी प्रेमिका है जो गरीबी और संघर्ष से डरकर व्यावहारिक जीवन चुन लेती है। यह किरदार बहुत जटिल था क्योंकि वह पूरी तरह नकारात्मक नहीं है। वह उस समाज का चेहरा है जहाँ प्रेम अक्सर आर्थिक सुरक्षा के सामने हार जाता है।

फ़िल्म के निर्माण के दौरान गुरु दत्त का काम करने का तरीका बेहद परफेक्शनिस्ट हो गया था। यदि उन्हें किसी दृश्य में अपेक्षित भावनात्मक गहराई नहीं मिलती थी तो पूरा दृश्य दोबारा फिल्माया जाता था। रोशनी, कैमरा एंगल और मौन-सब पर असाधारण मेहनत होती थी।

'प्यासा' की शूटिंग के दौरान कई दृश्य देर रात फिल्माए जाते थे ताकि रोशनी और छाया का मनचाहा वातावरण तैयार किया जा सके। गुरु दत्त चाहते थे कि फ़िल्म केवल कहानी न लगे। वह भावनात्मक अनुभव महसूस हो। यही कारण है कि फ़िल्म की दृश्य भाषा इतनी काव्यात्मक दिखाई देती है।

सिनेमैटोग्राफर वी. के. मूर्ति के साथ गुरु दत्त की साझेदारी इस फ़िल्म में नई ऊँचाई पर पहुँची। प्रकाश और अंधेरे का इस्तेमाल केवल तकनीकी नहीं था। वह पात्रों की मानसिक स्थिति व्यक्त करता था। कई दृश्यों में विजय भीड़ के बीच भी अकेला दिखाई देता है। यही फ्रेमिंग फ़िल्म के भाव को और गहरा बनाती है।

फ़िल्म का सबसे प्रसिद्ध दृश्य वह माना जाता है जिसमें विजय की 'मौत' के बाद उसकी श्रद्धांजलि सभा आयोजित होती है और वह स्वयं भीड़ के बीच खड़ा होकर यह सब देखता है। यह दृश्य समाज के पाखंड पर तीखी टिप्पणी बन गया।

'श्रद्धांजलि सभा' वाला दृश्य भारतीय सिनेमा के सबसे शक्तिशाली सामाजिक दृश्यों में गिना जाता है। लोग उस कवि की प्रशंसा कर रहे होते हैं जिसे जीवित रहते हुए उन्होंने ठुकरा दिया था। गुरु दत्त यहाँ केवल समाज की आलोचना नहीं करते। वे यह दिखाते हैं कि प्रसिद्धि अक्सर मृत्यु के बाद ही क्यों आती है।

फ़िल्म का संगीत उसकी आत्मा था। संगीतकार एस. डी. बर्मन और गीतकार साहिर लुधियानवी ने ऐसे गीत रचे जो कहानी के भीतर ही साँस लेते हैं। 'जिन्हें नाज़ है हिंद पर', 'सर जो तेरा चकराए', 'हम आपकी आँखों में' और 'ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है' जैसे गीत भारतीय फिल्म संगीत के इतिहास में अमर हो गये।

साहिर लुधियानवी की शायरी ने फ़िल्म को वैचारिक गहराई दी। साहिर स्वयं भी समाज की असमानताओं और पाखंड से गहराई से प्रभावित थे। यही कारण है कि गीतों में केवल प्रेम नहीं, सामाजिक बेचैनी भी दिखाई देती है।

'जिन्हें नाज़ है हिंद पर वो कहाँ हैं' गीत उस दौर के समाज पर बेहद साहसी टिप्पणी थी। वेश्याओं की बस्ती, गरीबी और टूटे हुए इंसानों के बीच फिल्माया गया यह गीत दर्शकों को असहज कर देता है। गुरु दत्त चाहते थे कि दर्शक केवल मनोरंजन न लें, बल्कि समाज की वास्तविकता से भी सामना करें।

'ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है' की शूटिंग तकनीकी और भावनात्मक दोनों स्तरों पर कठिन थी। विशाल सेट, भीड़ और नाटकीय प्रकाश व्यवस्था के बीच गुरु दत्त चाहते थे कि विजय का गुस्सा और टूटन पूरी ताक़त से दिखाई दे।

कहा जाता है कि इस गीत की रिकॉर्डिंग और फिल्मांकन के दौरान सेट पर असामान्य सन्नाटा रहता था। सभी को महसूस होता था कि यह केवल गीत नहीं, कलाकार का आंतरिक विस्फोट है।

'ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है' आज भी भारतीय सिनेमा के सबसे महान फिल्मी गीतों में गिना जाता है। इसमें सफलता और प्रसिद्धि के प्रति गहरा मोहभंग है। विजय जिस समाज से सम्मान चाहता था, अंततः उसी समाज को अस्वीकार कर देता है। यही फ़िल्म का सबसे बड़ा भावनात्मक मोड़ बन जाता है।

फ़िल्म का बजट उस समय के हिसाब से बड़ा माना जाता था। विभिन्न स्रोतों के अनुसार निर्माण लागत लगभग 15 से 20 लाख रुपये के बीच थी। गुरु दत्त जानते थे कि यह फ़िल्म सामान्य मनोरंजन प्रधान सिनेमा नहीं है, लेकिन उन्हें अपने दृष्टिकोण पर पूरा विश्वास था।

रिलीज़ के समय फ़िल्म को आलोचकों की भारी प्रशंसा मिली। हालांकि आम दर्शकों के एक हिस्से को इसकी उदासी और दार्शनिक स्वर भारी लगे, लेकिन धीरे-धीरे फ़िल्म की लोकप्रियता बढ़ती गई।

'प्यासा' की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उसने संवेदनशील सिनेमा को भी व्यावसायिक सम्मान दिलाया। इससे पहले निर्माता अक्सर मानते थे कि गंभीर और आत्मविश्लेषी फ़िल्में बड़े दर्शक वर्ग तक नहीं पहुँच सकतीं। लेकिन 'प्यासा' ने यह धारणा बदल दी।

फ़िल्म ने भारत और विदेशों में उल्लेखनीय सफलता हासिल की। समय के साथ इसे विश्व सिनेमा की महान फिल्मों में गिना जाने लगा। कई अंतरराष्ट्रीय समीक्षकों ने इसकी तुलना यूरोपीय कलात्मक सिनेमा से की। लेकिन 'प्यासा' की सबसे बड़ी ताक़त उसकी मानवीय संवेदना थी। विजय टूटता है, लेकिन पूरी तरह निष्ठुर नहीं बनता। यही कारण है कि दर्शक उसके दर्द से जुड़ जाते हैं।

'प्यासा' का अंत भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। विजय अंततः उस दुनिया को छोड़ देता है जिसने उसे केवल उपयोग की वस्तु समझा। वह प्रसिद्धि, सम्मान और झूठी प्रशंसा को अस्वीकार कर देता है। यह अंत हिंदी सिनेमा के सबसे साहसी निष्कर्षों में गिना जाता है। गुरु दत्त की फिल्मों में अक्सर प्रेम अधूरा रह जाता है। 'प्यासा' में भी प्रेम किसी पारंपरिक सुखांत तक नहीं पहुँचता। लेकिन यही अधूरापन फ़िल्म को वास्तविक बनाता है।

समय के साथ 'प्यासा' केवल सफल फ़िल्म नहीं रही। वह भारतीय सिनेमा में कलाकार की पीड़ा का सबसे गहरा दस्तावेज़ बन गई। 'प्यासा' आज भी इसलिए प्रासंगिक लगती है क्योंकि समाज आज भी संवेदनशील लोगों को संघर्ष करने पर मजबूर करता है। सफलता आज भी अक्सर प्रतिभा से अधिक बाज़ार तय करता है। यही कारण है कि विजय का दर्द आज भी नया महसूस होता है।

विश्व सिनेमा के अध्येता आज भी 'प्यासा' की दृश्य संरचना, संगीत और सामाजिक आलोचना का अध्ययन करते हैं। इसे भारतीय सिनेमा की सबसे प्रभावशाली फिल्मों में गिना जाता है। गुरु दत्त ने इस फ़िल्म में केवल कहानी नहीं सुनाई। उन्होंने अपनी संवेदनशील आत्मा का एक हिस्सा परदे पर रख दिया।

'प्यासा' देखते समय कई बार ऐसा लगता है जैसे कैमरे के पीछे खड़ा कलाकार दुनिया से एक ही सवाल पूछ रहा हो - क्या संवेदनशील आदमी के लिए इस समाज में सचमुच कोई जगह है? यही सवाल फ़िल्म को अमर बना देता है और शायद यही कारण है कि 'प्यासा' आज भी केवल देखी नहीं जाती। उसे महसूस किया जाता है। क्योंकि उसके भीतर हर उस आदमी की बेचैनी छिपी है जिसने दुनिया से थोड़ा अधिक प्रेम किया और बदले में थोड़ा अधिक अकेलापन पाया।

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